भारत का मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र नहीं बढ़ेगा तो यहां के उद्योग-धंधे कैसे बढ़ेगे? उद्योग-धंधे नहीं बढ़ेंगे तो कॉरपोरेट क्षेत्र कैसे बढ़ेगा? कॉरपोरेट क्षेत्र नहीं बढ़ेगा तो शेयर बाज़ार कैसे बढ़ सकता है? भारत की विकासगाथा की इस ज़मीनी हकीकत ने विदेशी निवेशकों को हताश कर दिया है। केवल विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) ही नहीं, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) करनेवाले भी अब भारत से बिदक कर भागने लगे हैं। उन्हें यकीन है कि जो सरकार भ्रष्टाचार के ज़रिए विश्वऔरऔर भी

बीएसई का सेंसेक्स और एनएसई निफ्टी-50 सूचकांक 27 सितंबर 2024 के ऐतिहासिक शिखर से अब तक 15% से ज्यादा गिर चुके हैं। शेयर बाज़ार के इस तरह धड़ाम होने की एकमात्र वजह है कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) का पलायन। वे हमारे शेयर बाज़ार के कैश सेगमेंट ने 27 सितंबर 2024 से कल तक हमारे शेयर बाज़ार के कैश सेगमेंट से ₹2.36 लाख करोड़ निकाल चुके हैं। आखिर दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाऔरऔर भी

सरकार के राष्ट्रीय सांख्यिकी संगठन (एनएसओ) ने चालू वित्त वर्ष 2024-25 में मौजूदा मूल्यों पर जीडीपी का दूसरा अग्रिम अनुमान बढ़ाकर ₹331.03 लाख करोड़ कर दिया है। इसका पहला अग्रिम अनुमान ₹324.11 लाख करोड़ का था। इस समय डॉलर 87.36 रुपए का चल रहा है तो मुद्रास्फीति को जोड़कर हमारा जीडीपी मार्च 2025 तक 3.79 ट्रिलियन डॉलर का होगा। इस बीच पिछले तीन साल से प्रधानमंत्री देश की अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन डॉलर और उत्तर प्रदेश वऔरऔर भी

जीवन बड़ा जिद्दी होता है। वो कहीं भी प्रतिकूल से प्रतिकूल हालात में भी पनप जाता है। पेड़ सूख जाए और उसकी लकड़ी सड़ने लग जाए तो उस पर भांति-भांति के कुकुरमुत्ते उग आते हैं। इसी तरह उद्यमी और उद्योग-धंधे अपने उभरने की ज़मीन खुद बना लेते हैं। कुछ न हो, तब भी वे कुछ न कुछ करने का रास्ता खोज ही निकालते हैं। अभी उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में 45 दिनों तक महाकुम्भ चला। कहने कोऔरऔर भी

उत्तर प्रदेश प्रति व्यक्ति आय में झारखंड और दुनिया के सब-सहारा अफ्रीकी देशों से भी गरीब है। वहां लोगों की कमाई से ₹3,00,000 करोड़ खर्च करवा देने से अर्थव्यवस्था में मूल्य का सृजन होगा या नाश होगा? योगी सरकार को तो ₹7500 करोड़ के खर्च पर ₹9000 करोड़ का टैक्स वगैरह मिल गया। स्थानीय लोगों की कमाई हो गई। रेलवे से लेकर एयरलाइंस ने जमकर कमाया। लेकिन आस्था में डूबे श्रद्धालुओं को क्या मिला? उन्हें कोई शक्तिऔरऔर भी

आज के दौर में दुनिया में शायद ही कहीं धर्म के आधार पर राजनीति होती है। लेकिन भारत में धर्म के आधार पर राजनीति ही नहीं हो रही, बल्कि धंधा भी हो रहा है। वो भी उस धर्म के नाम पर जो इतिहास में कहीं दर्ज ही नहीं है। उसे कभी हिंदू तो कभी सनातन कहने लगते हैं। भारत में प्रचलित जो धर्म इतना व्यापक है कि उसकी कोई एक किताब नहीं, कोई एक आराध्य देव नहीं,औरऔर भी

विश्व बैंक ने आगाह किया है कि भारत का विदेशी ऋण इस साल 2025 में 100 अरब डॉलर और बढ़ सकता है। यह सितंबर 2024 तक 711.8 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर था। ऊपर से देश का विदेशी मुद्रा भंडार 27 सितंबर 2024 को हासिल 704.89 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर से गिरते-गिरते 14 फरवरी 2025को 635.72 अरब डॉलर पर आ चुका है। अंदर की कमज़ोरी और बाहर के बोझ के दो पाटों के बीच भारतऔरऔर भी

देश की अर्थव्यवस्था के इर्द-गिर्द मोदी सरकार द्वारा दस सालों से बनाया गया तिलिस्म धीर-धीरे टूट रहा है। यह तिलिस्म अचानक चिंदी-चिंदी न बिखर जाए, इसकी हरचंद कोशिश की जा रही है। फिर भी चादर हाथ से सरकती जा रही है। विश्व बैंक ने कुछ महीनों पहले कहा था कि अभी जो रफ्तार है, उससे अमेरिका की प्रति व्यक्ति आय एक चौथाई हिस्से तक भी पहुंचने में चीन को दस साल से ज्यादा, इंडोनेशिया को लगभग 70औरऔर भी

शेयर बाज़ार के संजीदा निवेशकों को हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि वे यहां ट्रेडिंग पर दांव लगाने नहीं, बल्कि धैर्य से दौलत बनाने आए हैं। ट्रेडिंग का टेम्परामेंट अलग होता है और निवेश का अलग। दोनों का घालमेल नहीं करना चाहिए। किसी भी शेयर को अपना अंतर्निहित मूल्य हासिल करने के लिए दो-तीन साल देने ही पड़ते हैं। दूसरे, शेयर बाज़ार में दौलत सटीक व शानदार अनुमान से नहीं, बल्कि बड़ी गलतियों से बचकर समझदार फैसले करनेऔरऔर भी

मोदीराज के दस साल में सरकार का बजट जीडीपी की गति से ज्यादा बढ़ा है। मतलब कि सरकार ने अपने तंत्र और स्कीमों पर जितना खर्च किया, उसका लाभ देश की अर्थव्यवस्था को उतना नहीं मिला। इसमें भी देखना ज़रूरी है कि सरकार ने अपना बजट किस-किस मद में ज्यादा बढ़ाया है। लेकिन पहले यह जान लें कि जिन दस सालों में जीडीपी 10.02% की नॉमिनल दर से बढ़ा, उसी दौरान औसत भारतीय की कमाई 8.90% औरऔरऔर भी