गुत्थी ऋण बाजार की

1. ऋण बाज़ार क्या है?

ऋण बाज़ार वह बाज़ार है जहां निश्चित आय या ब्याज वाली तरह-तरह की प्रतिभूतियां जारी की जाती हैं और खरीदी-बेची जाती है। ये प्रतिभूतियां अमूमन केंद्र व राज्य सरकार, नगर निगम अन्य सरकारी निकायों व वाणिज्यिक इकाइयों, जैसे वित्तीय संस्थाओं, बैंकों, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां, पब्लिक लिमिटेड कंपनियों  की तरफ से जारी की जाती हैं। इनमें सबसे अहम होते हैं केंद्र व राज्य सरकारों के बांड। सरकारें अपनी उधारी की व्यवस्था इन्हीं बांडों से करती हैं।

2. मुद्रा बाज़ार क्या है?

मुद्रा बाज़ार मूलत: छोटी अवधि वाली प्रतिभूतियों व प्रपत्रों के जारी करने व खरीद-बिक्री से संबंधित है। मुद्रा बाज़ार में ट्रेजरी बिल, कमर्शियल पेपर, बिल आफ एक्सचेंज और कम समय की परिपक्वता वाले दूसरे प्रपत्रों की खरीद बिक्री होती है। यहां छोटी या कम समय की प्रतिभूतियों का मतलब उन प्रपत्रों से हैं जिनकी परिपक्वता अवधि एक साल से कम होती है।
3. निश्चित आय वाली प्रतिभूतियों में निवेश क्यों?

निश्चित आय वाली प्रतिभूतियां ब्याज मिलने के चलते परिपक्व होने पर मूलधन से ज्यादा रकम देती हैं। ऋण प्रतिभूतियां एक तरह का उधार हैं जो इन्हें जारी करनेवाली संस्थाएं या कंपनियां निवेशकों से जुटाती हैं। इसलिए ऋण प्रतिभूतियों पर संस्था की संपत्ति के आधार पर निश्चित प्रभार रहता है। कंपनी की चल व अचल संपत्तियों की प्रतिभूति के कारण आमतौर पर ये सुरक्षित मानी जाती है।

निश्चित आय वाली प्रतिभूतियों में निवेश से निवेशकों को पक्का लाभ होता है क्योंकि इससे उनकी पूंजी सुरक्षित तरीके से बढ़ती रहती है। साथ ही उन्हें ब्याज के रूप में नियमित आय भी होती है। निवेशक सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश कर जोखिम से पूरी तरह बच सकते हैं। ऋण प्रतिभूतियां अन्य वित्तीय प्रतिभूतियों की अपेक्षा कम अस्थिरता दर्शाती है। इस कारण ज्यादा सुरक्षा का वादा करती हैं। इन्हें अपने पोर्टफोलियो में एक निश्चित अनुपात में रखना समझदारी का काम होता है।

4. सरकारी प्रतिभतियों में निवेश के क्या फायदे हैं?

सरकारी प्रतिभतियों का सबसे बड़ा फायदा है शून्य जोखिम। ये सबसे ज्यादा सुरक्षित है। इनमें बराबर ट्रेडिंग होती है। इसलिए इन्हें कभी भी बेचकर निकला जा सकता है। इनसे मिलनेवाले ब्याज पर कोई टीडीएस नहीं  कटता। इनके एवज में आसानी से उधार लिया जा सकता है। सरकारी सेक्टर की प्रतिभूतियों पर करों में छूट मिलती है।

5. निश्चित आय वाली प्रतिभूतियों कौन जारी कर सकता है?

केंद्र व राज्य सरकारें, सावर्जिनक निकाय, बैंक व संस्थाएं, कानूनी रूप से बनी कॉरपोरेट या दूसरी इकाइयां निश्चित आय वाली प्रतिभूतियां जारी कर सकती है। उनकी प्रतिभूतियों का रूप कानून और नियंत्रण संबंधी नियमों से प्रभावी होगा।

6. अर्थव्यवस्था के लिए ऋण बाजार का क्या महत्व है?

सबसे खास बात है कि ऋण बाजार के अच्छी तरह विकसित हुए बगैर इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए लंबी अवधि के वित्तीय संसाधन जुटाना मुश्किल होता है। दूसरे यह लोगों की बचत को बेहतर व सुरक्षित रिटर्न देकर उन्हें विकास में भागीदार बनाता है। यह बाजार अभी अपने यहां ठीक से विकसित नहीं है, इसलिए रिजर्व बैंक की तरफ से उठाए गए मौद्रिक नीति संबंधी कदम नीचे तक नहीं पहुंचते। पहुंचते भी हैं तो बहुत देर से।

इससे लंबी और छोटी अवधि के उद्देश्यों का ध्यान में रखते हुए तरलता प्रबंधन को बनाए रखने में मदद मिलती है। चूंकि सरकार अपनी प्रतिभतियां या बांडों को लंबी और छोटी अवधि के उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए जारी करती हैं इसलिए इनका इस्तेमाल न सिर्फ कर्ज उठाने में किया जाता है बल्कि आंतरिक ऋण प्रबंधन, वित्तीय प्रबंधन और छोटी अवधि के तरलता प्रबंधन में इसका अहम रोल सामने आया है। सरकारी प्रतिभूतियों (दस साल की अवधि वाले सरकारी बांडों) पर आए रिटर्न को बेंचमार्क रिटर्न माना के जाता है और वित्तीय नियमों में इसे रिस्क फ्री रिटर्न माना जाता है।

7. एक कुशल ऋण बाजार का वित्तीय तंत्र और अर्थव्यवस्था में क्या महत्व है?

सरकार की उधारी लागतों में कमी करना और किफायती कीमतों पर वित्तीय संसाधन जुटाना। सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के प्रोजेक्ट की फंडिंग और संस्थागत फाइनेंसिंग पर बोझ कम करना । फिर इनसे आम निवेशकों को एफडी या सोने व जमीन जैसे पुराने माध्यमों के अलावा एक नया वे सुरक्षित माध्यम मिलेगा। इससे बाजार भागीदारों में विविधता आती है।

8. ऋण प्रतिभूतियों से जुड़े हुए अलगअलग जोखिम क्या है?

ऋण प्रतिभूतियों से कई तरह के जोखिम जुड़े हुए हैं।

डिफॉल्ट रिस्क: इस तरह के जोखिम में बांड को जारी करने वाला समय पर ब्याज दरों का भुगतान नहीं कर पाता है या प्रतिभूति पर मूलधन का भी भुगतान नहीं कर पाता है। इसे क्रेडिट रिस्क के तौर भी जानते हैं।

ब्याज दर जोखिम: बाजार में ब्याज दरों में आए अचानक बदलाव से पैदा हुए जोखिम, जिसका असर अंतिम रिटर्न पर पड़ता हैं। अच्छी बात तब होगी कि जब निवेशक ने ऐसे समय में निवेश किया हो जब ब्याज दरें कम हो और उसने इंतजार किया हो और ब्याज दरों में बढोतरी हुई हो। ऐसे में उसे बढ़ी हुई ब्याज दरों का फायदा मिलेगा।

पुर्निवेश दर जोखिम: ब्याज दरों के गिरने की संभावना के बीच निवेश के ज्यादा विकल्प होने की वजह से नियमित अंतराल में बाजार की तुलना में ऊंची प्रतिभूतियों में निवेश करना।

ऋण प्रतिभूतियों के कारोबार में भी कई सारे जोखिम हैं…

काउंटर पार्टी रिस्क: किसी भी लेन देन से जुड़ा सामान्य जोखिम। दूसरी पार्टी का सेटलमेंट के समय किए गए अनुबंद्ध या वादों का पूरा न कर पाना।

प्राइस रिस्क: कीमतों में अचानक बदलाव आने या की गई आशा के अनुसार कीमतें न मिलने की सम्भावना से संबधित जोखिम

9. निश्चित आय वाले इस ऋण बाजार का नियामक कौन है?

निश्चित आय प्रतिभूतियों के हर इश्यू और कारोबार का नियमन अलग–अलग सरकारी संस्थाएं करती है। जैसे बैंक द्वारा जारी किए गए बांडों और अन्य प्रतिभूतियों का नियंत्रण भारतीय रिजर्व बैंक करता है। गैर सरकारी प्रतिभूतियों के नियमन की जिम्मेदारी सेबी के पास है।
10. भारत में सरकारी प्रतिभूतियों और ट्रेजरी बिल के प्रमुख लक्षण क्या हैं?

भारत में सभी सरकारी प्रतिभूतियां इस समय में भारत सरकार की ओर से रिजर्व बैंक द्वारा जारी की जाती है। इनका अंकित मूल्य 100 रुपए होता है। ये प्रतिभूतियां कूपन (ब्याज दर) आधारित होती है और इन पर अर्धवार्षिक या 5 से 30 साल की अविध पर ब्याज की अदायगी होती है। प्रपत्र के अनुसार इसमें बदलाव हो सकता है।
ट्रेजरी बिल छोटे समय के धन की व्यवस्था के लिए रिजर्व बैंक द्वारा जारी किए जाने वाले अल्पावधि प्रपत्र है। इनकी परिपक्वता अवधि 91 से 364 दिन की होती है। इनका अंकित मूल्य 100 रुपए होता है, लेकिन कोई कूपन रेट नही होता है। इसके बदले ये अंकित मूल्य से कम मूल्य पर जारी किए जाते हैं। जैसे, 100 का ट्रेजरी बिल 95 रूपये में निवेशक को जारी किया जा सकता है। यही 5 रुपये का अंतर निवेशक का रिटर्न होता है, जो उसे परिपक्वता के बाद मिल जाता है। राज्य सरकारों की प्रतिभूतियां भी रिजर्व बैंक द्वारा संबंधित राज्य सरकारों की ओर से जारी की जाती हैं।

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