देश की मौद्रिक संस्था भारतीय रिजर्व बैंक कहने को अब भी स्वायत्त है। हालांकि मोदी सरकार ने पिछले बारह सालों में उसका ऐसा बधियाकरण किया है कि सरकार की हां में हां मिलाना उसकी फितरत बन गई है। मुद्रास्फीति पर नियंत्रण रखना, आर्थिक विकास को सुगम बनाना और इसके अनुरूप नीतियां बनाना उसकी ज़िम्मेदारी है। लेकिन सरकार को खुश रखने के चक्कर में वो इतना असंगत हो गया है कि उसका रुख, अनुमान और फैसला एक दिशाऔरऔर भी

शेयर बाज़ार कभी झूठ नहीं बोलता। कुछ समय के लिए उसे सायास नचाया जा सकता है। लेकिन लंबे समय के लिए नहीं। फिर यह विसंगति या विरोधाभास कैसे कि जब हमारा जीडीपी इतनी तेज़ी से बढ़ रहा है तो शेयर बाज़ार गिरा ही जा रहा है? क्या सरकार का जीडीपी झूठ बोल रहा है? आईएमएफ तक यह कह चुका है। उसके दबाव में भारत सरकार को जीडीपी से लेकर मुद्रास्फीति और औद्योगिक उत्पादन सूचकांक तक को नापनेऔरऔर भी

साल भर से ज्यादा हो गए। शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग के हुनर, सीख व अभ्यास के जुड़े इस कॉलम में सबके लिए खुला लगभग 200 शब्दों का पहला पैराग्राम हमेशा अर्थव्यवस्था पर केंद्रित रहता है। कभी सरकार की नीतियां, कभी रिजर्व बैंक के फैसले तो कभी किसानी, बेरोज़गारी व गरीबी की स्थिति। अर्थव्यवस्था के पूरे स्पेक्ट्रम को पकड़ने की कोशिश रहती है। सब्सक्राइबरों के साथ ही अन्य लोगों ने भी सवाल उठाए हैं कि शेयर बाज़ार कीऔरऔर भी

भारत में शायद ही कोई ऐसा घर होगा जहां कभी न कभी किसी रिश्तेदार, दोस्त या यूट्यूब गुरु ने यह दावा न किया हो कि यह स्टॉक पांच गुना जाएगा, यह अगला मल्टीबैगर है, अभी खरीद लो, वरना ज़िंदगी भर पछताओगे। इन दावों में इतना आत्मविश्वास होता है कि सुनने वाला खुद को अगले कुछ वर्षों में करोड़पति के रूप में देखने लगता है। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि ऐसे सपने सबसे ज़्यादा वही लोगऔरऔर भी

कभी-कभी इतिहास किसी तारीख या घटना से नहीं, बल्कि किसी सवाल से शुरू होता है। कैसे ऐसा हुआ कि समझदार लोग, शिक्षित समाज और सत्ता के गलियारों में बैठी बुद्धि एक साथ भ्रम में डूब गई? ‘साउथ सी बबल’ इसी सवाल की जन्मभूमि है। यह केवल शेयरों के चढ़ने और गिरने की कहानी नहीं है, बल्कि उस क्षण की कथा है जब तर्क ने भीड़ के सामने हथियार डाल दिए, जब भविष्य की चमक ने वर्तमान कीऔरऔर भी

सरकार ने 1 अप्रैल 2023 से शेयर बाज़ार के फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (एफ एंड ओ) सेगमेंट में होनेवाले सौदों पर सिक्यूरिटीज़ ट्रांजैक्शन टैक्स (एसटीटी) 25% बढ़ा दिया है। पहले एक करोड़ रुपए के फ्यूचर्स सौदों पर 1000 रुपए एसटीटी लगता था, जबकि अब यह 1250 रुपए लगेगा। वहीं, ऑप्शंस की बिक्री पर पहले 0.05% एसटीटी लगता था, अब 0.0625% लगेगा। इस तरह इसमें भी 25% वृद्धि की गई है। पहले ऑप्शंस में एक करोड़ रुपए के सौदेऔरऔर भी

अगर आप शेयरों की ट्रेडिंग में दिलचस्पी रखते हैं तो डब्बा ट्रेडिंग का नाम ज़रूर सुना होगा। हर गैर-कानूनी काम की तरह यह भी हल्के-फुल्के मुंगेरीलाल टाइप लोगों को खूब खींचता है। कोई लिखा-पढ़ी नहीं, रिकॉर्ड नहीं, सारा लेनदेन कैश में, सारी कमाई काली। फिर इनकम टैक्स देने या रिटर्न भरने का सवाल ही नहीं। सारे सौदे स्टॉक एक्सचेंज के बाहर होते हैं तो सिक्यूरिटी ट्रांजैक्शन का सवाल ही नहीं उठता। साथ ही कोई दिक्कत आने याऔरऔर भी

निवेश की दुनिया में भारत ही नहीं, समूचे विश्व में सरकारी बांडों को सबसे सुरक्षित व रिस्क-फ्री माना जाता है। आम भारतीयों के बीच सरकारी बैंकों को भी कमोबेश यही दर्जा हासिल है। लोग सरकारी बैंकों में पैसा रखकर निश्चिंत हो जाते हैं। यही वजह है कि आज भी बैंकों की कुल जमाराशि का 70 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा सरकारी बैंकों का है। लेकिन देश के तीसरे और सरकारी क्षेत्र के दूसरे सबसे बड़े बैंक, पंजाब नेशनलऔरऔर भी

पहले जब तक गांव से ज्यादा जुड़ाव था, नौकरीपेशा तबके को जीवन बीमा की जरूरत नहीं लगती थी। भरोसा था कि जमीन-जायदाद के दम पर हारी-बीमारी से लेकर बुढ़ापे तक का इंतजाम हो जाएगा। लेकिन गांव से रिश्ता टूटता गया और ज्यादातर जोतों का आकार घटकर दो-ढाई एकड़ से कम रह गया तो अब हर कोई जीवन बीमा की सोचने लगा है। मगर, आंख पर पट्टी बांधकर। जैसे, मेरे एक हिंदी पत्रकार मित्र हैं। अंग्रेजी-हिंदी दोनों भाषाओंऔरऔर भी

मैंने कहा था कि सेंसेक्स अगले कुछ सत्रों में 500 अंक बढ़ जाएगा। 250 अंक तो वो पहले ही बढ़ चुका था और आज ही एनएवी के चलते 300 से ज्यादा अंकों की बढ़त उसने और ले ली। यह कोई करिश्मा नहीं, पहले से तय था। इसका श्रेय डेरिवेटिव सौदों में कैश सेटलमेंट की व्यवस्था को दिया जाना चाहिए। आईएफसीआई जैसे स्टॉक को पहले तोड़कर 39.5 रुपए तक ले जाया गया और वापस 42.5 रुपए पर पहुंचाऔरऔर भी