राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) ने चालू वित्त वर्ष 2020-21 में देश का जीडीपी कितना रह सकता है, इसका पहला अग्रिम अनुमान पेश कर दिया है। उसका कहना है कि मौजूदा मूल्य पर हमारी अर्थव्यवस्था का आकार पिछले साल के 203.40 लाख करोड़ रुपए से घटकर इस बार 194.82 करोड़ रुपए रह सकता है, जबकि बजट अनुमान 224.89 लाख करोड़ रुपए का था। यानी, पिछले साल से 8.58 लाख करोड़ रुपए और इस साल के बजट अनुमान सेऔरऔर भी

रिजर्व बैंक ने दिसंबर की मौद्रिक नीति समीक्षा में अनुमान लगाया है कि चालू वित्त वर्ष 2020-21 में हमारी अर्थव्यवस्था में 7.5% ही गिरावट आएगी, जबकि उसका पिछला अनुमान 9.5% की गिरावट का था। अगर ऐसा होता है कि इसका श्रेय भारतीय अवाम और उद्योग क्षेत्र को जाएगा, सरकार को नहीं। कारण, अब तक सरकार के सारे घोषित पैकेज ज़मीनी धरातल पर नाकाम और महज दिखावा साबित हुए हैं। जहां सरकार को जीडीपी बढ़ाने के लिए अपनाऔरऔर भी

देश में कोरोना शहरों ही नहीं, गांवों तक फैला है। एसबीआई की रिसर्च रिपोर्ट तो यहां तक कहती है कि अब ग्रामीण जिले कोविड-19 के नए हॉटस्पॉट बन गए हैं और नए संक्रमण में उनका हिस्सा 50 प्रतिशत से ज्यादा हो गया है। फिर भी चालू वित्त वर्ष 2020-21 की जून या पहली तिमाही में कृषि व संबंधित क्षेत्र के आर्थिक विकास की गति 3.4 प्रतिशत रही है, जबकि हमारी पूरी अर्थव्यवस्था इस दौरान 23.9 प्रतिशत घटऔरऔर भी

जब बजट के एक दिन पहले आई आर्थिक समीक्षा में सितंबर 2014 में ज़ोर-शोर से शुरू की गई ‘मेक इन इंडिया’ योजना में संशोधन कर ‘असेम्बल इन इंडिया’ जोड़ दिया गया, तभी सकेत मिल गया था कि सरकार का मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र को मजबूत बनाने का इरादा अब ढीला पड़ गया है। सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’ योजना शुरू करते वक्त लक्ष्य रखा था कि देश के जीडीपी में इसका योगदान 16 प्रतिशत से बढ़ाकर 2022 तक 25औरऔर भी

जब देश की 55 प्रतिशत खेती मानसून के भरोसे हो तो किसान आसमान ही नहीं, सरकार की तरफ भी बड़ी उम्मीद से देखता है। इस बार अभी तक मानसून की बारिश औसत से काफी कम रही है तो सरकार से उम्मीदें कुछ ज्यादा ही बढ़ गई हैं। वैसे भी पांच साल कदमताल करने के बाद पहले से ज्यादा प्रचंड बहुमत से दोबारा सत्ता में आई सरकार से किसान ही नहीं, सारा देश बेहद ठोस कामों की अपेक्षाऔरऔर भी

पंजाब व हरियाणा के गांवों-कस्बों में लोग जुगाड़ से गाड़ियां बनाकर चला लेते हैं। लेकिन अमृतसर से लोकसभा चुनाव जीतने में नाकाम रहे वित्त मंत्री अरुण जेटली तो देश का बजट घाटा तक जुगाड़ से ठीक करने जा रहे हैं। इस जुगाड़ के बल पर वे नए वित्त वर्ष 2018-19 का बजट पेश करते वक्त बड़े आराम से दावा करेंगे कि उन्होंने 2017-18 के लिए राजकोषीय घाटे को जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) के 3.2 प्रतिशत तक सीमितऔरऔर भी

कहते हैं कि शेयर बाज़ार अर्थव्यवस्था के बारे में भविष्य की वाणी बोलता है और उसकी मानें तो हमारी अर्थव्यवस्था बम-बम करती जा रही है। साल 2017 के पहले से लेकर आखिरी ट्रेडिंग सत्र तक शेयर बाज़ार का प्रमुख सूचकांक, सेंसेक्स 28.1 प्रतिशत बढ़ा है। अगर इस रफ्तार से किसानों की आय बढ़ जाए तो वह पांच साल नहीं, 2.8 साल में ही दोगुनी हो जाएगी। लेकिन बाज़ार की आदर्श स्थितियों के लिए बनाए गए पैमाने अक्सरऔरऔर भी

हमारे वित्तीय जगत में ठगी का बोलबाला है। इसीलिए शेयरों से लेकर म्यूचुअल फंड जैसे वित्तीय माध्यमों में निवेश करने वालों की आबादी 2.5% के आसपास ठहरी हुई है और लोग अपना अधिकांश निवेश सोने व प्रॉपर्टी में करते हैं। सरकार, सेबी व रिजर्व बैंक की तरफ से वित्तीय साक्षरता की बात की जाती है। पर देश का वित्त मंत्री ही जब लोगों के वित्तीय अज्ञान का फायदा उठाकर छल करने में लगा हो तो हम कैसेऔरऔर भी

कालेधन को साफ करने की जिस वैतरणी के लिए सरकार ने देश के 26 करोड़ परिवारों को तकलीफ की भंवर में धकेल दिया, वह दुनिया में सबसे तेज़ी से बढ़ती हमारी अर्थव्यवस्था के लिए कर्मनाशा बनती दिख रही है। आईएमएफ जैसे प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय संगठन तक ने भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास का अनुमान 7.6 प्रतिशत से घटाकर 6.6 प्रतिशत कर दिया है, जबकि चीन का अनुमान 6.5 प्रतिशत से बढ़ाकर 6.7 प्रतिशत कर दिया है। यह केंद्र सरकारऔरऔर भी

इसे माल व सेवा कर कहिए या वस्तु एवं सेवा कर, अंततः इसे जीएसटी (गुड्स एंड सर्विसेज़ टैक्स) के रूप में ही बोला, जाना और कहा जानेवाला है। देश में 1986 से ही इसकी अवधारणा पर काम चल रहा है। लेकिन इसके अमल में बराबर कोई न कोई दिक्कत आ जाती है। यह आज़ादी के बाद देश में परोक्ष या अप्रत्यक्ष करों का सबसे बड़ा व महत्वपूर्ण सुधार है। असल में, इसके लागू होने से देश मेंऔरऔर भी