भारत देश, उसके जन-जन, पेड़-पालव, सारी वनस्तियां, पशु-पक्षी, जल, जंगल, ज़मीन और अर्थव्यवस्था या जीडीपी सब हमारे अपने हैं, सगे हैं। लेकिन बारह साल से प्रधानमंत्री के पद पर बैठे नरेंद्र मोदी का इनमें से कोई भी सगा नहीं। यहां तक कि न वे अपने परिवार के हैं और न ही उनका परिवार उन्हें सगा मानता है। 76 साल की उम्र में भी उनकी वासना केवल अपनी अय्याशी और अपनों के साम्राज्य को बढ़ाते जाना है। इसकेऔरऔर भी

बाज़ार अपना चार महीनों से कदमताल किए जा रहा है। इस साल 29 अप्रैल को निफ्टी-50 सूचकांक 24,177.65 पर बंद हुआ था और अभी 28 अगस्त को 24,175.65 पर है। वहीं, साल के दूसरे दिन 2 जनवरी को यह 26,328.55 पर था, जहां से अब तक 8.18% गिर चुका है। निराशा और पस्ती का आलम है। देशी निवेशक संस्थाएं खासकर म्यूचुअल फंड और बीमा कंपनियां ज्यादा खरीद रही हैं, जबकि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक उनसे कम बेच रहेऔरऔर भी

बांस फट चुका है या फाड़ा जा चुका है। फिर भी फटा बांस बजने से बाज़ नहीं आ रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगातार चौथी बार लालकिले की प्राचीर से 2047 तक भारत को विकसित बनाने की बात कही। हालांकि बताया नहीं कि इस दिशा में अब तक क्या किया है। इतना ज़रूर कहा कि, “विकसित भारत का सबसे बड़ा लाभार्थी मेरे देश का युवा है और इसलिए हमें विकसित भारत के लक्ष्य को युवाओं के साथऔरऔर भी

भारत तमाम गलत व खोखली नीतियों के बावजूद अगर कई सालों से दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है तो मूल वजह इसकी अंतर्निहित सामर्थ्य है। इसलिए यहां शेयर बाज़ार में लम्बे समय का निवेश आनेवाले कई दशकों तक लाभदायी होगा। लेकिन निवेश का पूरा फल पाने के लिए हमें पांच अहम पहलुओं पर गौर करना होता है। पहला, बढ़ती अर्थव्यवस्था में कौन-से उद्योग व सेवा क्षेत्र हैं जो अधिक तेज़ी से बढ़औरऔर भी

यह भारत देश है, दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश। यहां बात लाखों में नहीं, करोड़ों में होती है। यहां करोड़ों किसान खेती-बाड़ी से फसल उगा रहे हैं। करोड़ों मजदूर व कर्मचारी अटक से कटक, कश्मीर से कन्याकुमारी तक खेत-खलिहानों, फैक्ट्रियों, होटलों व ऑफिसों में मेहनत-मशक्कत से सरप्लस पैदा कर रहे हैं। करोड़ों छात्र-छात्राएं और युवा सुरक्षित भविष्य के लिए मगजमारी से लेकर डग्गेमारी तक कर रहे हैं। करोड़ों छोटे-छोटे उद्यम कठिन-कठोर प्रतिकूल हालात में भीऔरऔर भी

बेचनवाले तो गंजे को भी कंघी बेच देते हैं। इस समय शेयरों के निवेश में एआई के कमाल की ऐसी ही बिक्री चल रही है। वॉरेन बफेट, मेरिल लिंच के साथ राकेश झुनझुनवाला की बुद्धि व शैली से कंपनियों का चयन। ऊपर से फंडामेंटल और टेक्निकल एनालिसिस के मेल ‘कैनस्लिम’ का तड़का। देश में लिस्टेड करीब 6000 कपनियों के वित्तीय ही नहीं, गर्वनेंस तक का सारा डेटाबेस। दावा कि राजेश एक्सपोर्ट्स के घोटाले का संकेत एक सालऔरऔर भी

हल्ला है कि देश की अर्थव्यवस्था बड़ी तेज़ी से बढ़ रही है। इसका सबूत है कि लोगबाग जमकर टैक्स दे रहे हैं और सरकार भी दिल खोलकर खर्च कर रही है। पश्चिम एशिया का संकट भारत का बाल बांका भी नहीं कर सका। वित्त मंत्रालय के अधीन करनेवाले महालेखा नियंत्रक (सीजीए) ने 31 जुलाई को डेटा जारी किया कि चालू वित्त वर्ष 2025-26 में अप्रैल से जून की पहली तिमाही में भारत सरकार ने 13.57 लाख करोड़औरऔर भी

पुरुष बली नहिं होत है, समय होत बलवान। भीलन छीनी गोपियां, वही अर्जुन वही बाण। निवेश की दुनिया में भी समय की बड़ी महत्ता है। शर्त इतनी है कि जो कंपनी चुन रहे हैं, उसमें विकास की संभावनाएं भरपूर होनी चाहिए। फिर समय के साथ आपका निवेश पांच-दस साल में पांच-दस नहीं, बल्कि बीस-तीस गुना हो सकता है। मसलन, हमने इसी कॉलम में करीब दस साल पहले 11 सितंबर 2016 को अपार इंडस्ट्रीज़ को चुना था औरऔरऔर भी

देश में पहले मुद्रास्फीति की दो ही दरें हुआ करती थीं। थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) पर आधारित थोक मुद्रास्फीति और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) पर आधारित रिटेल मुद्रास्फीति। अब इसमें एक तीसरी भी जुड़ गई है उत्पादकों के मूल्य सूचकांक (पीपीआई) पर आधारित मुद्रास्फीति। लेकिन ये सभी बैंकिंग, कॉरपोरेट क्षेत्र और वित्तीय तंत्र के लिए मायने रखती हैं, जबकि देश के आमजन के लिए इनका कोई खास मतलब नहीं। उसके लिए तो सालों-साल से ‘महंगाई डायन खायेऔरऔर भी