विकास के लक्षण नहीं, बर्बादी की आहट
सरकार विकास कर नहीं रही। विकास का झांसा दे रही है। सरकारी अर्थशास्त्री आपको समझाएंगे कि छोटे किसानों के लिए बजट में भारत-विस्तार की नई योजना है, जिसमें विस्तार का मतलब है वर्चुअली इंटीग्रेटेड सिस्टम टू एक्सेस एग्रीकल्चरल रिसोर्सेज़, ऐसा बहुभाषी एआई टूल जो हमारी कृषि का उद्धार कर देगा। दलाल पत्रकार और भांट भी बताएंगे कि विकसित भारत@2047 नारा नहीं, सचमुच का रोडमैप है। इनके तिलिस्म को तोड़ने के लिए आज हमें इस तंत्र का हिसाबऔरऔर भी
सरकारी कर्ज गले तक, हमारा गर्दन तक
मोदी सरकार भले ही चार्वाक के नाम पर प्रचारित दर्शन ऋणम कृत्वा, घृतम पीवेत पर चल रही है। लेकिन आम भारतीय कभी ऋण के फंदे में नहीं फंसना चाहता। वो बेहद मजबूरी में ही ऋण लेता है। मगर, सरकारी नीतियों का कमाल देखिए कि मोदीराज में आम भारतीय घरों पर चढ़ा ऋण आज भारत सरकार पर चढ़े ऋण की बराबरी करने जा रहा है। केंद्र में बैठी सरकार जितना कर्ज लेना चाहे ले सकती है क्योंकि उसेऔरऔर भी
चारण, भांट, दलाल, बताते देश का हाल
भरोसे का टूटना सबसे खतरनाक होता है। सरकार की बातों पर विश्वास ही न रहे तो वो चाहे जो बकती रही, अवाम के बीच निराशा गहराती जाती है। इस समय देश का यही हाल है। चारण, भांट और दलाल ही देश का हाल बता रहे हैं। सच इस वक्त नक्कारखाने में तूती की आवाज़ बनकर रह गया है। सत्ता के चारण-भांट कड़वी हकीकत को कैसे चमकीला बनाकर पेश करते हैं, इसका एक नमूना पेश है। देश केऔरऔर भी
जो प्रत्यक्ष है, वो अब क्यों नहीं है प्रमाण!
जो जीता, वही सिकंदर। लेकिन क्या चुनावों में जो जीत रहा है, वही सही है? यह भी कि क्या आंकड़ों में जीडीपी का बढ़ जाना ही अर्थव्यवस्था के बढ़ जाने और विकास का प्रमाण है? फिर जो प्रत्यक्ष दिख रहा है, क्या वो सरासर मनगढ़ंत, दुष्प्रचार और झूठ है? पिछले बारह साल से हम 140 करोड़ देशवासियों को बताया जा रहा है कि हेडलाइंस पर भरोसा करो। भारत दुनिया की सबसे तेज़ रफ्तार से बढ़ती अर्थव्यवस्था है।औरऔर भी






