हर देशवासी के लिए जानना ज़रूरी है कि सरकार जो प्रत्यक्ष व परोक्ष टैक्स लेती है और उसके ऊपर देश के नाम पर जो कर्ज लेती है, उसका वो करती क्या है? हर साल बजट में इसकी जानकारी होती है। लेकिन एक तो हम उस पर ध्यान नहीं देते। दूसरे वो इतनी उलझी होती है कि बड़े-बड़े जानकारों के लिए उसे तार-तार कर समझना मुश्किल है। फिर भी हम कोशिश करें तो उलझे तारों को सुलझा सकतेऔरऔर भी

हालात लगातार बदलते हैं। धारणाएं उनका पीछा करती हैं। अगर हम सच्चाई के हिसाब से धारणाएं न बदलें तो समय हमें रौंदकर आगे बढ़ जाता है। इसलिए समय के साथ या उससे आगे चलने के लिए हमें धारणाओं को लगातार अपडेट करते रहना पड़ता है। जैसे, अभी तक माना जाता है कि शेयर बाज़ार में संभावनामय कंपनी चुनकर निवेश करो और 10-15 साल भूल जाओ। इसे ही दीर्घकालिक निवेश माना जाता है। लेकिन पिछले कुछ सालों सेऔरऔर भी

उद्योग-धंधों में लगी कंपनियां पूंजी निवेश करने के बजाय अपने कैश पर कुंडली मारकर बैठी हैं, जबकि केंद्र सरकार हल्ला मचाने के बावजूद ज्यादा खर्च नहीं कर रही तो देश की सरप्लस पूंजी जा कहां रही है? अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की अध्ययन रिपोर्ट में छानबीन करके बताया गया है कि यह सरप्लस पूंजी फाइनेंशियल या वित्तीय बाज़ारों में जा रही है। भारत में वित्तीय सक्रियता कमाई व दौलत का प्राथमिक स्रोत बन गई है और उसने औद्योगिकऔरऔर भी

ऊपर-ऊपर चमकते-दमकते जीडीपी के नंबरों के झाग के नीचे भारतीय अर्थव्यवस्था में ऐसी विसंगतियां पनप रही हैं जो अभी तो नहीं, लेकिन भविष्य में कभी भी देश को विकराल संकट में धकेल सकती है। सारे हो-हल्ले के बावजूद भारत में निजी क्षेत्र का पूंजी निवेश नहीं हो रहा। अर्थव्यवस्था में पूंजी निवेश को दिखाता है सकल स्थाई पूंजी निर्माण (ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन) या जीएफसीएफ। यह वित्त वर्ष 2003-04 से 2007-08 के दौरान जीडीपी का 35.8% हुआऔरऔर भी

अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) ने ताज़ा वर्ल्ड इकनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट में सख्त चेतावनी दी है कि जल्दी ही वैश्विक अर्थव्यवस्था की सहन-शक्ति की परीक्षा हो सकती है। अब तक गंभीर भू-राजनीतिक संकट के बीच भी अनेक सुरक्षा कवच अर्थव्यवस्था को ध्वस्त होने से बचाते रहे। लेकिन अब इनकी भी सामर्थ्य छीझ गई है। इसी के साथ आईएमएफ का अनुमान है कि इस साल 2026 में विश्व अर्थव्यवस्था की विकास दर पिछले साल 2025 के 3.5% से घटकर 3.1%औरऔर भी

इस समय देश की आर्थिक स्थिति बड़ी विचित्र है। अंदर-अंदर मूल अर्थव्यवस्था ठंडी पड़ी है। औद्योगिक निवेश अटका है तो वास्तविक वेतन/मजदूरी भी। असली कमाई नहीं बढ़ रही तो लोगबाग कमाने के लिए म्यूचुअल फंड में एसआईपी कर रहे हैं। जमकर परसनल लोन भी ले रहे हैं। यहां तक कि गाढ़े वक्त के लिए रखा गया सोना तक गिरवी रखकर लोन ले रहे हैं। ठहरी औद्योगिक मांग और बढ़ते कर्ज पर टिकी खपत ने गजब का असंतुलनऔरऔर भी

इस समय राजनीति ही नहीं, देश की अर्थनीति में भी अंधेरगर्दी चल रही है। ऐसा वे प्रशासक कर रहे हैं जो जनता से दूर रहते और सत्ता के गलियारों से होते हुए देश की नियामक संस्थाओं के लाटसाहब बन बैठे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा 1990 बैच के राजस्थान कैडर के आईएएस अफसर हैं। आईआईटी कानपुर से बी-टेक और अमेरिका की प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी से पब्लिक पॉलिसी में मास्टर्स की डिग्री ली है। 11 दिसंबरऔरऔर भी

कमाई कम, खर्च ज्यादा। अंतर को पाटने के लिए अमेरिका उधार लेता है। भारत का बाज़ार हिसाब चुकाता है। अमेरिकी सरकार इस साल मेच्योर हो रहे करीब 10 ट्रिलियन डॉलर के बॉन्डों की रिफाइनेंसिंग कर रही है। इनमें से अधिकांश बॉन्ड कोविड के समय तब जारी किए गए थे, जब ब्याज दर काफी कम थी। फेडरल रिजर्व ब्याज दर की रेंज बढ़ाकर 3.75% से 4.00% कर चुका है। अमेरिकी सरकार ज्यादा ब्याज नहीं देगी तो उसके बॉन्डोंऔरऔर भी

हर देशवासी को जानना ही चाहिए कि देश चला रही मौजूदा भारत सरकार आय-व्यय को लेकर क्या कर रही है। चालू वित्त वर्ष 2026-27 का कुल बजट ₹53.47 लाख करोड़ का है। इसमें से टैक्स व अन्य मदों से उसे कुल ₹35.33 लाख करोड़ का राजस्व मिलेगा। ₹80,000 करोड़ वो आस्तियां बेचकर जुटाएगी। ₹38,397 करोड पुराने ऋणों की वसूली से मिलने हैं। इस तरह उसकी कुल आय ₹36.51 लाख करोड होगी। बाकी ₹16.96 लाख करोड़ रुपए वोऔरऔर भी

देश के ऋण की तुलना जीडीपी के करना सही नहीं क्योंकि स्टॉक की तुलना फ्लो से नही की जा सकती। तुलना के लिए दोनों का स्वरूप फ्लो या प्रवाह का रहना चाहिए। इसलिए तुलना करनी ही है तो ऋण नहीं, ब्याज भुगतान की तुलना जीडीपी से करनी चाहिए। भारत की स्थिति यह है कि वह अकेले ब्याज की अदायगी पर ही जीडीपी का 5.11% खर्च कर देता है। यह वियतनाम (0.89%), इंडोनेशिया (2.21%) और मलयशिया (2.84%) जैसीऔरऔर भी