मोदी सरकार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के बाद झूठ व स्वांग के तीसरे सरदार हैं कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान। अमेरिका-भारत व्यापार पर अंतरिम सहमति से पहले फ्रेमवर्क की एकतरफा घोषणा के बाद ही चौहान ने कह डाला, “कृषि मंत्री के तौर पर मैं गर्व से कह सकता हूं कि हमारे किसानों के हितों की पूरी तरह सुरक्षित हैं। किसानों के हितों की पूरी सुरक्षा के लिए प्रधानमंत्री का धन्यवाद। उनके नेतृत्वऔरऔर भी

इतिहास गवाह है कि दुनिया का कोई भी देश मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र को बढ़ाए बिना समृद्ध नहीं बन सका है। चाहे वो अमेरिका हो, जापान हो, दक्षिण कोरिया हो या चीन। भारत इसका अपवाद नहीं हो सकता। लेकिन मोदी सरकार मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र को बढ़ाने के लिए केवल जुबानी जमाखर्च कर रही है। देश के जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र का योगदान बारह सालों से 15-16% पर अटका हुआ है। पहले यूरोपीय संघ के साथ हुई संधि को वाणिज्य मंत्रीऔरऔर भी

देश के सीने पर बारह साल से चढ़कर बैठी मोदी सरकार में हांकने वालों की कोई कमी नहीं। वैसे, लम्बी फेंकने व हांकने में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कोई सानी नहीं। लेकिन उनको किनारे रख दें, तब भी इनके मंत्री परिषद में एक से एक नमूने भरे पड़े हैं। वाणिज्य व उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ऐसे ही एक नगीना हैं। उनका दावा है कि यूरोपीय संघ के साथ की गई व्यापार संधि व्यापार ही नहीं, भारतऔरऔर भी

ऐसा नहीं है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण एकदम बौडम और महामूर्ख हैं। ऐसा भी नहीं कि देश-विदेश में विशेषज्ञों की कोई कमी है। लेकिन असली समस्या यह है कि सरकार की नीयत में भयंकर खोट है। बजट में कहा गया है कि किसानों की आमदनी बढ़ाने का लक्ष्य उत्पादकता और उद्यमशीलता बढ़ाकर हासिल किया जाएगा। लघु व सीमांत (2.5 एकड़ से पांच एकड़ जोत वाले) किसानों पर खास ध्यान दिया जाएगा। सरकार ने इसके लिए भारत-विस्तारऔरऔर भी

हम एक ऐसे दौर में रह रहे हैं, जब हर देशवासी को हमारे राष्ट्रीय हितों को ठीक से जानना व समझना ज़रूरी है। नहीं तो केंद्र की सत्ता में बैठी सरकार कभी भी राष्ट्रीय हितों का नाम लेकर देश को भारी नुकसान पहुंचा सकती है। बजट में बड़ी मासूमियत से कहा गया कि डेटा केंद्रों में निवेश बढ़ाने और ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर की ज़रूरत को देखते हुए भारत में डेटा सेंटर की सेवाओं को इस्तेमाल करते हुए दुनियाऔरऔर भी

कितनी विडम्बना है कि इस सरकार को अपने और अपनों के अलावा किसी का स्वार्थ नहीं दिखता। इन्हीं निजी स्वार्थों को वो देश का हित बनाकर प्रोजेक्ट कर रही है। इसका एक छोटा-सा प्रमाण है मुंबई का इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिएटिव टेक्नोलॉजीज। इसे फिक्की और सीआईआई जैसे देश के शीर्ष उद्योग संगठनों ने भारत सरकार के सूचना व प्रसारण मंत्रालय और महाराष्ट्र सरकार के साथ मिलकर प्रमोट किया है। इसे देश में एनिमेशन, विजुअल इफेक्ट, गेमिंग वऔरऔर भी

बजट में एक तरफ वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने दावा किया कि उनकी सरकार ने एक दशक तक चले सतत व सुधार-उन्मुख प्रयासों से लगभग 25 करोड़ लोगों को बहु-आयामी गरीबी से बाहर निकाल लिया। दूसरी तरफ देश के 81.35 करोड़ गरीबों को महीने में पांच किलो मुफ्त राशन देने की प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के लिए बजट प्रावधान ₹2.03 लाख करोड़ से बढ़ाकर ₹2.27 लाख करोड़ कर दिया गया। साथ ही उर्वर भूमि को जहरीली बनाऔरऔर भी

नारों व घोषणाओं की विकट भूल-भुलैया में उलझे देशवासियों को बजट से ज्यादा नहीं तो थोड़े सार्थक समाधान की उम्मीद ज़रूर थी। लेकिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने नए वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में ऐसे समाधान पेश किए हैं, जिन पर केवल रोया सकता है। जैसे, देश से विदेशी निवेशकों का पलायन बड़ी समस्या है। इससे हमारा रुपया भी डॉलर के मुकाबले तलहटी पकड़ता जा रहा है, वो भी तब, जब डॉलर खुद दुनिया की प्रमुखऔरऔर भी

बजट से उद्योगों से लेकर आम लोगों और शेयर बाज़ार तक को बड़ी उम्मीदें हैं। सबको रियायत या टैक्स में छूट की आस। हालांकि समस्याएं विकट हैं। मैन्यूफैक्चरिंग पस्त है। जीडीपी में जो 12-14% मैन्यूफैक्चरिंग है, उसका बड़ा हिस्सा चीन को आउटसोर्स कर दिया गया है। फिर भी बजट में मैन्यूफैक्चरिंग को बढ़ाने का शोर तो होगा ही। लेकिन हर स्तर पर फैले भ्रष्टाचार का जिक्र तक करना वित्त मंत्री उचित नहीं समझेंगी। उनके लिए तो हरऔरऔर भी

मोदी सरकार एक डरी हुई सरकार है। यह येनकेन प्रकारेण ऊपर से लेकर नीचे तक सत्ता के समूचे तंत्र पर कब्जा करना चाहती है। इसलिए नहीं कि इसे देश का विकास करना है, बल्कि इसलिए कि इसे अपने यारों का भला और जनधन की अबाध लूट से अपनी पार्टी व संघी तंत्र का खजाना भरते रहना है। हर खास-ओ-आम को फिर भी उम्मीद है कि सरकार बजट में आर्थिक विकास, रोज़गार सृजन और उपभोक्ता मांग बढ़ाने केऔरऔर भी