हमारे शेयर बाज़ार में दो करोड़ भारतीयों के ऊपर म्यूचुअल फंडों, बैंकों व बीमा कंपनियों के कुल धन पर भी भारी पड़ता है एफपीआई या एफआईआई के रूप में आ रहा विदेशियों का धन। विदेशी निवेशक इस साल जनवरी से लेकर अब तक भारतीय बाज़ार में शुद्ध रूप से लगभग 80,000 करोड़ रुपए लगा चुके हैं। उनके लिए भारतीय शेयर बाज़ार सोने का अंडा देनेवाली मुर्गी है। मुनाफा कमाने के लिए भारत जैसे बाज़ार में आए हैंऔरऔर भी

शेयर बाज़ार हर तर्क को धता बताते हुए बढ़ता ही जा रहा है क्योंकि धन के प्रवाह का तर्क उसके साथ है। देश में 80% लोगों के पास खाने को अनाज नहीं है तो सरकार को उन्हें हमारे टैक्स से हर माह पांच किलो राशन मुफ्त देना पड़ रहा है। कोविड में कम से कम ढाई-तीन करोड़ लोगों को रोज़ी-रोज़गार से हाथ धोना पड़ा है। अब बचते हैं करीब 25 करोड़ लोग। इसमें से भी करीब 15औरऔर भी

साफ है कि ये रिटेल श्रेणी के ट्रेडर और निवेशक ही हो सकते हैं जो फटाफट कमाने की लालच में खरीद रहे हैं जिससे बाज़ार कम वोल्यूम में भी चढ़ा जा रहा है। उसी तरह जैसे छिछले पानी में जमकर छपाक-छपाक होता है। सवाल उठता है कि जब कोरोना काल के डेढ़ साल में करोड़ों लोगों का रोज़ी-रोज़गार चौपट हो गया, तब कौन-से ‘रिटेल’ लोग हैं जिनके पास इतना इफरात धन आ गया है? गौतम अडानी कीऔरऔर भी

आखिर कौन-से ट्रेडर या निवेशक हैं जो इतना ज्यादा फूले बाज़ार में भी खरीदे जा रहे हैं? समझदार या स्मार्ट ट्रेडर व निवेशक तो ऐसा कर नहीं सकते। प्रोफेशनल ट्रेडरों से भी ऐसा उम्मीद नहीं की जा सकती। ये सभी न्यूनतम रिस्क में अधिकतम रिटर्न हासिल करना चाहते हैं। वे अधिकतम रिस्क में न्यूनतम रिटर्न का दांव नहीं लगा सकते क्योंकि ऐसा करने पर उनका वजूद, उनकी सारी ट्रेडिंग पूंजी ही डूब सकती है। देशी-विदेशी संस्थाएं औरऔरऔर भी

किसी भी दिन शेयर बाज़ार में खरीदे और बेचे गए शेयरों की संख्या बराबर होती है। तभी हर सौदा पूरा होता है। शेयरों के भाव तब बढ़ते हैं, जब उन्हें खरीदने की आतुरता ज्यादा होती है। लोग उसे पाने के लिए ज्यादा दाम देने को तैयार होते हैं। वहीं, शेयर तब गिरते हैं, जबकि उन्हें बेचने की व्यग्रता ज्यादा होती है। इधर कुछ महीनों से हो यह रहा है कि जो शेयर पहले से बढ़े हुए हैं,औरऔर भी

सितंबर के दूसरे हिस्से में एनएवी बढ़ाने के लिए म्यूचुअल फंड अमूमन खरीदते हैं तो इससे निफ्टी व सेंसेक्स में शामिल लार्जकैप कंपनियों के शेयर बढ़ जाते हैं। साथ-साथ बाज़ार के माहौल से स्मॉल व मिडकैप कंपनियों के शेयर भी चढ़ जाते हैं। ऐसे में रिटेल ट्रेडर की रणनीति यह हो सकती है कि वे इस दौरान लार्जकैप कंपनियों में खरीद करें, जबकि पहले किसी वजह से स्मॉल व मिडकैप स्टॉक्स से नहीं निकल पाए हैं तोऔरऔर भी

म्यूचुअल फंडों के पास 35.32 लाख करोड़ रुपए के फंड हैं। उनकी चपल चाल से होता यह है कि आधे सितंबर तक भले ही शेयर बाज़ार दबा-दबा चले। लेकिन आखिरी हिस्से में उनकी खरीद से बढ़ जाता है। यह सालों-साल का पैटर्न है। खासकर सितंबर का आखिरी हफ्ता तो हमेशा तेज़ी या बढ़त का रहता है। इस दौरान विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) भी बेचने से कहीं ज्यादा खरीदते हैं। तो, आम ट्रेडरों के लिए सबक यह हैऔरऔर भी

म्यूचुअल फंड दम भरना चाहते हैं कि उन्होंने पिछली तिमाही व पहली छमाही में निवेश के इतने सही फैसले लिए कि उनकी तमाम स्कीमों का शुद्ध आस्ति मूल्य (एनएवी) बढ़ गया है। इसके लिए सितंबर के दूसरे में उन कंपनियों के शेयर खरीदते जाते हैं जो पहले से बढ़ रहे होते हैं। उनकी इस खरीद से सेंसेक्स और निफ्टी या दूसरे शब्दों में कहें तो बाजार बढ़ जाता है। पलटकर इसका सीधा असर म्यूचुअल फंडों की यूनिटोंऔरऔर भी

सितंबर का महीना चालू है। इसी के साथ चालू वित्त वर्ष 2021-22 की दूसरी तिमाही और पहली छमाही समाप्त होगी। शेयर बाज़ार में निवेश व ट्रेडिंग की दुनिया में इसका अपना अलग महत्व है, म्यूचुअल फंडों के लिए खासतौर पर। आप जानते ही होंगे कि दुनिया भर में ही नहीं, भारत में भी आम निवेशकों का अधिकांश धन म्यूचुअल फंडों के ज़रिए ही शेयर बाज़ार में लगता है। रिटेल निवेशकों की धमक इन्हीं फंडों के माध्यम सेऔरऔर भी

शेयर बाज़ार के मूल स्वभाव के बारे में हमेशा याद रखें कि आज व अभी का भाव भविष्य में कंपनी के साथ जो होगा, उसका जो नफा-नुकसान हो सकता है, उसे जज़्ब या डिस्काउंट किए रहता है। लिस्टेड कपनी के शेयर के भाव में अभी तक सारी उपलब्ध और अनुमानित जानकारियों व सूचनाओं का समावेश होता है। बड़े-बड़े दिग्गजों, उन्नत सॉफ्टवेयर की गणनाओं और कंपनी व उद्योग के पारखी लोगों की सम्मिलित अपेक्षाओं को दर्शाता है उसकेऔरऔर भी