अतीत में निफ्टी के शिखर पर पहुंचने के बाद जो करेक्शन आए, वे अलग-अलग रहे हैं। जनवरी 2008 में निफ्टी शिखर पर पहुंचने के बाद सवा साल में 50% तक गिर गया था। यकीनन, अब उतना बड़ा करेक्शन होने की गुंजाइश नहीं दिखती। लेकिन बड़ा करेक्शन तो आ ही सकता है, इस आशंका से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता। हाल का जो करेक्शन अक्टूबर 2021 के शीर्ष के बाद जून 2022 तक आया था, वोऔरऔर भी

क्या निफ्टी 20,000 अंक के स्तर पर ज्यादा टिक पाएगा? जनवरी 2008 से अक्टूबर 2021 में हासिल निफ्टी के पिछले शिखर पर नज़र डालने से इसका पूरा जवाब नहीं तो संकेत ज़रूर मिल सकता है। जनवरी 2008 में निफ्टी 6257 के शिकर पर पहुंचा। लेकिन दो साल नौ महीने बाद अक्टूबर 2010 तक घटकर 6177 पर आ गया। फिर फऱवरी 2015 में 8809 तक पहुंचा और करीब डेढ़ साल बाद भी सितंबर 2016 में 8866 पर अटकाऔरऔर भी

बात बड़ी साफ है कि भारतीय शेयर बाज़ार में अगर निफ्टी के 20,000 अंक तक पहुंचने के बाद भी तेज़ी का नया दौर शुरू होना है तो वैश्विक स्तर पर, खासकर अमेरिका में भी आर्थिक उभार की स्थिति रहनी चाहिए। तब तक मोमेंटम स्टॉक्स के पीछे ज्यादा समय तक भागना घाटे का सौदा बन सकता है। खुद ही देख लीजिए कि एक समय बाज़ार के चहेते रहे ज़ोमैटो, नाइका, कारट्रेड, व पेटीएम जैसे स्टॉक्स का क्या हश्रऔरऔर भी

निफ्टी जब नए शिखर पर पहुंचने के बाद तेज़ी से 20,000 अंक की तरफ बढ़ रहा है, तब सबके दिमाग में एक सवाल तो यह है कि इस मंज़िल के बाद निफ्टी की दशा-दिशा क्या होगी? दूसरा सवाल यह कि जब विश्व अर्थव्यवस्था भारी अनिश्चितता से घिरी हो, अमेरिका से लेकर यूरोप व जापान तक आर्थिक मंदी की आशंका हो, तब भारत कितना अछूता रह सकता है? कॉरपोरेट जगत की मशहूर हस्ती और एचडीएफसी के चेयरमैन दीपकऔरऔर भी

अगर अपना शेयर बाज़ार फटाफट चढ़े और निफ्टी-50 थोड़े समय में ही 20,000 अंक पर पहुंच जाए तो यकीनन ट्रेडरों को अपनी पोजिशन काटकर मुनाफा बटोर लेना चाहिए। असल में कम अवधि में निफ्टी के बढ़ने से कंपनियों की लाभप्रदता तो वही रहेगी और बाज़ार ज्यादा महंगा हो जाएगा। तब उसमें करेक्शन लाज़िमी हो जाएगा। लेकिन अगर बाज़ार लम्बे समय तक सीमित दायरे में चलता हुआ धीरे-धीरे बढ़ता है और तब निफ्टी 20,000 अंक तक पहुंचता है,औरऔर भी

अपने बाज़ार के आशावाद का ठोस आधार है। अभी अर्थव्यवस्था में छिपी अपार संभावनाओं का बाहर आना बाकी है। आम व खास निवेशकों को भी इस बात का विश्वास है। यह म्यूचुअल फंडों के लगातार बढ़ते निवेश से पुष्ट होता है। इधर कई हफ्तों से विदेशी संस्थागत या पोर्टफोलियो निवेशक भी भारतीय बाज़ार में बेचने से ज्यादा खरीद रहे हैं। कुल मिलाकर अपने शेयर बाज़ार का सेंटीमेंट अभी सकारात्मक है। इसलिए लगभग तय है कि निफ्टी-50 बहुतऔरऔर भी

अगर हमारे ही नहीं, दुनिया भर के वित्तीय बाज़ारों में वैश्विक आर्थिक मंदी का डर फैला हुआ है तो यह कतई निराधार नहीं है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अगले साल 2023 में वैश्विक मंदी आ सकती है। इसकी आशंका इसलिए भी बढ़ जाती है कि अमेरिका के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरें बढ़ाने का सिलसिला जा रखा है और आगे भी बढ़ाते रहने की बात कही है ताकि मुद्रास्फीति पर काबू पाया जा सके।औरऔर भी

निफ्टी अगर 20,000 तक पहुंच गया तो उसके बाद वह नई-नई ऊंचाई बनाता रहेगा या उसमें करेक्शन आ सकता है? अभी अपने यहां जो माहौल है तो वो तेज़ी का है। लेकिन उसकी सतह पर सावधानी और डर का भाव भी कहीं न कहीं तैर रहा है। अमेरिका से लेकर ब्रिटेन, यूरोप व जापान तक अर्थव्यवस्था में मंदी छाने की आहट है। सितंबर तिमाही में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जापान अपनी मुद्रा येन की कमज़ोरीऔरऔर भी

अपना शेयर बाज़ार धीरे-धीरे ऐतिहासिक शिखर के करीब पहुंच चुका है। सेंसेक्स और निफ्टी 52 हफ्ते का उच्चतम स्तर छूने लगे हैं। बाज़ार में हर तरफ यही माना जा रहा है कि निफ्टी जल्दी ही 20,000 अंक का मनोवैज्ञानिक स्तर पार कर लेगा। निफ्टी का ऐतिहासिक बंद स्तर 18,477 का है जो उसने अक्टूबर 2021 में हासिल किया था। वहां से अभी वह महज 170 अंक नीचे हैं। मात्र 0.93% का यह फासला कभी भी तय होऔरऔर भी

चुनावों के माहौल में किन उद्योगों की कंपनियों के स्टॉक्स में ट्रेड करना लाभ का सौदा साबित हो सकता है? उपभोक्ता साजोसामान, टू-ह्वीलर, शराब, इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया और टेक्सटाइल उद्योग। लेकिन फिलहाल बैंकिंग और ऑयल मार्केटिंग कंपनियों से दूर रहना चाहिए। एक खास बात हमेशा ध्यान में रखें कि इस दौरान बाज़ार बड़ा चंचल या वोलैटाइल हो जाता है तो पोजिशनल या लम्बे ट्रेड से बचना चाहिए। फटाफट सौदे निपटाना ज्यादा सही रहता है। साथ हीऔरऔर भी