रुपए का गिरना, रोज़गार का घटना, भ्रष्टाचार का बढ़ना, अमीरों का और ज्यादा अमीर और गरीबों का और ज्यादा गरीब होते जाना। यह सारा कुछ हमारी अर्थव्यवस्था में पनपते भयंकर असंतुलन के लक्षण हैं। फिर भी अर्थव्यवस्था की बीमारी अभी असाध्य नहीं हुई है। इस बीमारी के स्वरूप को ऊपरी तौर पर तीन विकासक्रमों से समझा जा सकता है। एक, महंगे फोन और कंप्यूटर बेचनेवाली कंपनी एप्पल इंडिया की आय रोजमर्रा के आम उपभोक्ता सामान बेचनेवाली देशऔरऔर भी

सरकारी दावों और मंत्रियों-सलाहकारों के मंत्रों से इतर देश में रोज़गार की असल स्थिति क्या है? लगभग 2.80 करोड़ बेरोज़गार शिक्षित युवा नौकरियों की तलाश में लगे हैं, जबकि करीब 10 करोड़ लोगों ने थककर नौकरी की तलाश ही बंद कर दी है जिसमें से ज्यादातर महिलाएं हैं। रोज़गार पर विश्वसनीय डेटा देनेवाली इकलौती निजी संस्था सीएमआईई के मुताबिक भारत में मार्च 2017 के अंत तक 15 साल से 64 साल की कामकाज़ी उम्र के 42.7% लोगोंऔरऔर भी

मोदी सरकार रोज़गार देने के नाम पर कैसा छल कर रही है, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है प्रधानमंत्री विकसित भारत रोज़गार योजना। 19 जून को बड़े-बड़े विज्ञापन निकाले गए कि शाम 5 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 15 लाख लाभार्थियों को रोज़गार देते हुए ₹2400 करोड़ रुपए की प्रोत्साहन राशि वितरित करेंगे। इस बाबत आयोजित भव्य समारोह में मोदी ने खुद भाषण दिया कि 1 अगस्त 2025 से शुरू इस योजना के समर्थन से अब तक करीब 70 लाखऔरऔर भी

करीब 146 करोड़ आबादी वाले जिस देश में केंद्र व राज्य सरकारों के साथ ही सेना, पुलिस और अर्धसैनिक बलों को मिलाकर बमुश्किल ढाई करोड़ लोगों को सामाजिक सुरक्षा मिल रही हो, जिसे देखकर हर युवा इन्हीं नौकरियों की तरफ भागता हो और आरक्षण को लेकर मारा-मारी होती है, वहां केद्रीय श्रम व रोज़गार मंत्री मनसुख मंडाविया का दावा है कि मोदी सरकार ने 94 करोड़ लोगों या 64.3% आबादी को मजबूत सामाजिक सुरक्षा दे रखी है।औरऔर भी

देश-दुनिया के लिए भारत की 65% युवा आबादी उसकी ऐसेट या आस्ति है। लेकिन सरकार ऐसा नहीं मानती क्योंकि मान लें तो उसे इसकी ज़िमेमदारी उठानी पड़ेगी, इसे अपना मानकर संभालना पड़ेगा। कोई एक भी युवा रोज़गार में नहीं लगा तो सरकार को इस राष्ट्रीय नुकसान की भरपाई उस खजाने से करनी पड़ेगी जिसे वो इनकम टैक्स, कॉरपोरेट टैक्स, कैपिट गेन्स टैक्स, सिक्यूरिटीज़ ट्रांजैक्शन टैक्स व प्रॉपर्टी टैक्स जैसे प्रत्यक्ष और कस्टम, एक्साइज़ व जीएसटी जैसे परोक्षऔरऔर भी

धूमिल की मशहूर पंक्ति है कि लोहे का स्वाद लोहार से मत पूछो, उस घोड़े से पूछो जिसके मुंह में लगाम है। इसी तरह 12 साल के मोदीराज में भारत की विकासगाथा कहां तक पहुंची है, इसका जवाब सरकार के बड़े-बड़े विज्ञापनों और जीपीपी के डेटा, भुगतान संतुलन की स्थिति या शेयर बाज़ार की उठापटक में नहीं, बल्कि करोड़ों छात्र-छात्राओं और युवक-युवतियों की घुटन व कुंठा में ढूंढा जाना चाहिए। कभी पेपरलीक तो कभी परीक्षा रद्द। कोईऔरऔर भी

मोदी सरकार ने विकास का जो मॉडल देश पर थोपा, उसके केंद्र में किसान, मजदूर, नौजवान या छोटे उद्योग-धंधे नहीं, बल्कि देशी-विदेशी कॉरपोरेट क्षेत्र था। उसके मेक-इन इंडिया का नारा था देश में बनाओ, विदेश में बेचो। लेकिन देशी-विदेशी कॉरपोरेट क्षेत्र को लग गया कि उसने पूंजी लगाकर बड़े उद्योग खड़े भी कर दिए तो मोदी सरकार उन्हें अदाणी और अम्बानी जैसे यारों को सौंप देगी। सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार रह चुके अरविंद सुब्रह्मणियन तक ‘डबल-ए’औरऔर भी

देश का भुगतान संतुलन विदेशी मुद्रा का प्रवाह बढ़ने से तभी दुरुस्त होगा, जब शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) बढ़ेगा। स्थिति यह है कि मार्च 2026 में खत्म वित्त वर्ष 2025-26 में देश में आया शुद्ध एफडीआई मात्र 7.65 अरब डॉलर रहा है, जबकि इसी दौरान एफपीआई ने भारत से (इक्विटी व बॉन्ड मिलाकर) कुल 16.59 अरब डॉलर निकाले हैं। इसके बाद चालू वित्त वर्ष 2025-26 के ढाई महीनों में ही वेऔरऔर भी

पश्चिम एशिया संकट का आना-जाना महज एक बहाना है। मोदी सरकार ने 12 सालों में देश की अर्थव्यवस्था को जो जख्म दिए हैं, वे महज मरहम-पट्टी से नहीं भरेंगे। उसकी नीतियों के चलते वित्त वर्ष 2025-26 में देश का भुगतान संतुलन 30.8 अरब डॉलर के घाटे में चला गया। यह घाटा चालू वित्त वर्ष 2026-27 में 50-75 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। सरकार ने इससे बचने के लिए विदेशी निवेशकों को 10 ही नहीं, 15, 30औरऔर भी

देश में जितनी विदेशी मुद्रा आ रही है, उससे कहीं ज्यादा निकल रही है। रिजर्व बैंक के ताज़ा डेटा के मुताबिक इस साल मार्च अंत से 12 जून तक हमारा विदेशी मुद्रा भंडार 19.483 अरब डॉलर घटकर 671.625 अरब डॉलर रह गया। इसी साल 27 फरवरी को विदेशी मुद्रा भंडार 728.49 अरब डॉलर के रिकॉड स्तर पर पहुंच गया था। उसके बाद से बराबर गिर रहा है। ऐसे में सरकार को देश में विदेशी मुद्रा खींचने केऔरऔर भी