भारतीय परिवार रोजमर्रा की खपत के लिए ज्यादा ऋण ले रहे हैं तो परसनल लोन देने और दिलाने वाली कंपनियां बड़ी खुश हैं। दुनिया के 50 से ज्यादा देशों में सक्रिय स्विटज़रलैंड की बहुराष्ट्रीय फाइनेंस व निवेश कंपनी यूबीएस के हिसाब से वित्त वर्ष 2025-26 में भारतीय परिवारों पर चढ़े ऋण का 34% हिस्सा परसनल लोन का था, जबकि 2019-20 में यह 29% हुआ करता था। उनका आकलन है कि आगे गैर-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों (एनबीएफसी) द्वारा दियाऔरऔर भी

भारतीय रिजर्व बैंक के मुताबिक मार्च 2026 तक भारतीय परिवारों पर चढ़ा ऋण देश के जीडीपी का 45.9% है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय संस्था बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट (बीआईएस) के मुताबिक यह ऋण मार्च 2026 की तिमाही में जीडीपी का 49.10% हो चुका है, जबकि दिसंबर 2025 की तिमाही में यह 47.80% और 2016 की सितंबर तिमाही में 33.10% ही हुआ करता था। भारतीय परिवारों के ऋण का इस तरह बढ़ना चिंता की बात है। लेकिन इससे भी बड़ीऔरऔर भी

देश के जीडीपी के बढ़ते दावों के बीच भारतीय परिवारों की बैलेंस शीट बिगड़ती जा रही है। जीडीपी के अनुपात में उनकी देनदारियां बढ़ती ही जा रही हैं। भारतीय रिजर्व बैंक की सितंबर माह की बुलेटिन के मुताबिक जून 2022 में भारतीय परिवारों की वित्तीय आस्तियां ₹328.94 लाख करोड़ थीं जो तब के नॉमिनल जीडीपी की 134.3% यानी 1.34 गुना थीं। भारतीय परिवारों की वित्तीय आस्तियां मार्च 2026 में ₹490.24 लाख करोड़ हैं जो तब के नॉमिनलऔरऔर भी

यह आभास नहीं, जिसका कोई विरोधाभास हो। यह एक साथ मौजूद सच्चाई भी नहीं कि उसे विडम्बना कह दिया जाए। यह कोई अद्भुत, अकल्पनीय व अनदेखी स्थिति भी नहीं, जिसमें कबीर की उलटबांसियों की तरह कोई सत्य या गूढ़ रहस्य छिपा हो। इसे अधिक से अधिक मोदी-जाल कहा जा सकता है कि एक तरफ भारत दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है, दूसरी तरफ अपना काम-धंधा या नौकरी करने वाले 80% भारतीयों की वास्तविकऔरऔर भी

दुनिया को दिखाना है ताकि भारत को हर कोण से बेचने का चौकस माहौल बना रहे। मोदी सरकार ने दलाली के साध्य के लिए जीडीपी को देश बेचने का साधन बना दिया है। बाकी देश व अवाम जाए भाड़ में। बस जीडीपी चमकता दिखना चाहिए। उसे फर्क नहीं पड़ता कि देश के लगभग 80% स्वरोजगार में लगे व नौकरीपेशा लोगों की वास्तविक आय पिछले कुछ सालों में घट गई है, जबकि इसी दौरान स्टॉक एक्सचेंजों में लिस्टेडऔरऔर भी

मोदी सरकार झूठ के तपते तवे पर कैसे राजनीति की रोटियां सेंक रही है, इसका प्रमाण है पारिवारिक उपभोग व्यय सर्वेक्षण (एचसीईएस)। एक तो उसने 2017-18 के सर्वे की रिपोर्ट अभी तक छिपा रखी है क्योंकि उसमें प्रति व्यक्ति व्यय 2011-12 की तुलना में घट गया था। दूसरे, उसने छह साल बाद अगस्त 2023 से जुलाई 2024 तक 2023-24 के पारिवारिक उपभोग व्यय का नया सर्वे किया। इस बीच दौरान कोरोना महामारी के बीच देश भर मेंऔरऔर भी

सरकार देश के जीडीपी में आम लोगों की खपत का योगदान सायास कम करने में लगी है। वित्त वर्ष 2021-22 के दौरान जीडीपी में निजी अंतिम खपत व्यय (पीएफसीई) का हिस्सा 61.3% हुआ करता था, जबकि निर्यात का हिस्सा 18.7% और आयात का हिस्सा 19.1% हुआ करता था। वित्त वर्ष 2022-23 में निजी खपत का हिस्सा घटकर 60.6% और निर्यात का हिस्सा बढ़कर 22.8% व आयात का 26.4% हो गया। वित्त वर्ष 2025-26 तक जीडीपी में निजीऔरऔर भी

भारत में खपत की असलियत को क्यों छिपाने में लगी है मोदी सरकार? यह अभी नहीं, बल्कि 2014 से 2019 तक के अपने पहले कार्यकाल से ही कर रही है। यह मोदी सरकार की नीयत है या फितरत? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य रह चुके जानेमाने अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने खुलासा किया है कि 2011-12 के बाद देश में 2017-18 में रोज़गार के साथ ही घरेलू खपत खर्च का भी सर्वे हुआ था।औरऔर भी

कालिदास परम मूर्ख थे कि जिस डाल पर बैठे थे, उसे ही काट रहे थे। लेकिन मोदी सरकार तो चरम धूर्त है कि जिस विकसित भारत का सपना दिखाकर देश पर राज करते रहना चाहती है, उसी के मूलाधार को खोखला किए जा रही है। भारत से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) दोनों ही भाग रहे हैं क्योंकि सरकार की नीतियां विश्वास करने लायक नहीं हैं और भारत की विकासगाथा का अंत करीबऔरऔर भी

मोदी सरकार की जीडीपी चमत्कार गाथा में जितना गहरे उतरते जाइए, आपका माथा उतना ही चकराता जाता है। ऊपर-ऊपर 7.8% या 2.6% की विकास दर और डबल डिफ्लेटर के खेल को किनारे रख दें तो एक नया चौंकानेवाला रहस्य कूदकर सामने आ खड़ा होता है। नई सीराज की गणना में 2022-23 से लेकर 2025-26 तक का जीडीपी पुरानी सीरीज़ से पूरे ₹42.1 लाख करोड़ घटा दिया गया है। मतलब उक्त तीन सालों में पहले बताया गया जीडीपीऔरऔर भी