मई में अपने यहां थोक महंगाई की दर 30 साल के उच्चतम स्तर 15.88% पर रही है, जबकि रिटेल मुद्रास्फीति 7.04% है। अमेरिका में इसी दौरान मुख्य मुद्रास्फीति की दर 8.6% रही है। अमेरिका इस पर काबू पाने के लिए इस साल ब्याज दर तीन बार में 1.50% बढ़ा चुका है। लेकिन अपने यहां अब भी सरकार अवाम को दुहने में लगी है। गैस सिलिंडर के दाम पहले से बढ़े हुए हैं। उन्हें थोड़ा घटाना मजबूरी थीऔरऔर भी

भारतीय शेयर बाज़ार जिस तरह झांकी पर चल रहा है, उसी तरह भारतीय अर्थव्यवस्था भी झांकी पर चल रही है। कहने को हमारा जीडीपी बीते वित्त वर्ष 2021-22 में 8.7% बढ़ा है। लेकिन हकीकत में देखें तो यह 2020-21 नहीं, बल्कि उससे भी एक साल पहले 2019-20 से मात्र 1.5% ज्यादा है। 2019-20 में हमारा जीडीपी 1,45,15,958 करोड़ रुपए था, जबकि 2021-22 के ताज़ा अनुमान के मुताबिक 1,47,35,515 करोड़ रुपए है। फिर भी तीन साल बाद 2024-25औरऔर भी

रिजर्व बैंक ने रेपो दर बढ़ाकर बैंकों के लिए अतिरिक्त धन जुटाना महंगा कर दिया। लेकिन सवाल उठता है कि जब बैंकों के पास पहले से अतिरिक्त धन है तो रिजर्व बैंक से ज्यादा ब्याज पर क्यों उधार लेंगे? हां, रिजर्व बैंक के इस तरह ब्याज बढ़ाने से आम लोगों ही नहीं, उद्योग-धंधों के लिए धन महंगा हो जाएगा। इससे उनका पूंजी निवेश घट सकता है और देश की आर्थिक विकास दर पर नकारात्मक असर पड़ेगा। रिजर्वऔरऔर भी

वित्तीय बाज़ार में धन का केंद्रीय स्रोत हैं बैंक और बैंकों से हर पल का रिश्ता होता है केंद्रीय बैंक का। अमेरिका में यह केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व है तो अपने यहां भारतीय रिजर्व बैंक। रिजर्व बैंक रेपो और रिवर्स रेपो दर पर बैंकों से लेन-देन करता है। इसके लिए वह एसडीएफ (स्टैंडिंग डिपजिट फैसिलिटी) और एलएएफ (लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी) जैसी सुविधाएं देता है। इनके बीच कसे तारों से बनता है कॉल मनी मार्केट और तय होतीऔरऔर भी

रेपो दर वह ब्याज दर है जिस पर रिजर्व बैंक हमारे बैंकों को एकाध दिन के लिए धन उपलब्ध कराता है, जबकि रिवर्स रेपो वह ब्याज दर है जो रिजर्व बैंक अपने पास बैंकों द्वारा रखे गए अतिरिक्त धन पर अदा करता है। जब सिस्टम में नकदी का प्रवाह ज्यादा रहता है तो रिजर्व बैंक ब्याज दर बढ़ाकर उसे घटाता है और जब कम रहता है तो ब्याज दर घटाकर उसे बढ़ाता है। माना जाता है किऔरऔर भी

इस समय दुनिया भर के शेयर बाज़ारों के लिए मुद्रास्फीति या महंगाई सबसे विकट समस्या बनी हुई है। अमेरिका, कनाडा, जर्मनी, ब्रिटेन, इटली, नीदरलैंड, न्यूज़ीलैंड, दक्षिण अफ्रीका, ब्राज़ील, भारत व मेक्सिको जैसे 11 प्रमुख देशों में मुद्रास्फीति की दर 6% से ज्यादा चल रही है। इससे निपटने के लिए तमाम देशों के केंद्रीय बैंकों को ब्याज दरें बढ़ानी पड़ रही हैं। अपने रिजर्व बैंक ने तो दो महीने के भीतर दो बार ब्याज दर बढ़ा दी। पहलीऔरऔर भी

अक्टूबर-नवंबर में जब अपना शेयर बाज़ार कुलांचे भर रहा था, तब डेरिवेटिव सेगमेंट में मार्केट वाइड पोजिशन लिमिट (MWPL) 32-34% चल रही थी। दिसंबर में यह घटकर 28-29% पर आ गई और अभी 17-18% पर है। जाहिर है कि इस वक्त ट्रेडरों में रिस्क लेने का दम नहीं दिख रहा। अब इस लिमिट से जुड़े दो सैद्धांतिक सवाल। क्या समूचे बाज़ार की MWPL बढ़ते-बढ़ते 100% तक पहुंच सकती है? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि 3-4% पहलेऔरऔर भी

मार्केट वाइड पोजिशन लिमिट (MWPL) कहां तक पहुंच जाए तो माना जा सकता है कि शेयर बाज़ार अब तलहटी पकड़ चुका है और अब तेज़ी का रुख वापस आ रहा है? जानकार बताते हैं कि यह सीमा कम से कम 30-32% तक पहुंच जाए और कुछ दिनों तक बराबर इसके आसपास या इससे ऊपर बनी रहे, तब माना जा सकता है कि तेज़ी का सूरज अब उगने जा रहा है। अभी तो स्थिति यह है कि बीतेऔरऔर भी

शेयर बाज़ार के रुख को भांपनेवाला तीसरा अहम संकेतक है मार्केट वाइड पोजिशन लिमिट (MWPL)। इसका भी वास्ता डेरिविटिव्स सेगमेंट से है। इसका डेटा हर दिन एनएसई की वेबसाइट पर डेली मार्केट रिपोर्ट्स के डेरिवेटिव्स वाले हिस्से में मिलता है। इससे पता चलता है कि सेबी और एनएसई ने जितने डेरिवेटिव एक्सपोज़र की इजाज़त दे रखी है, उसमें से बाज़ार ने कितना इस्तेमाल किया है। मान लीजिए कि किसी स्टॉक के फ्यूचर्स व ऑप्शंस में एक करोड़औरऔर भी

शेयर बाज़ार की अभी जो स्थिति चल रही है, उससे कभी-कभी तो दिन की ट्रेडिंग के दौरान निफ्टी का बेसिस ऋणात्मक हो जाता है। मतलब तब निफ्टी फ्यूचर्स का भाव निफ्टी के कैश बाज़ार के भाव से कम या डिस्काउंट पर रहता है। इस तरह शेयर बाज़ार में निराशा की भंवर से निकल कर तेज़ी की राह दिखानेवाला ‘बेसिस’ नाम का दूसरा संकेतक फिलहाल निराश कर रहा है। मंदड़ियों में शॉर्ट करने का जबरदस्त माद्दा है औरऔरऔर भी