हमारा रुपया हाथ से निकल चुका है। अब इसे भारतीय रिजर्व बैंक का कोई हस्तक्षेप ज्यादा गिरने से नहीं रोक सकता। वैसे रिजर्व बैंक खुद कहता रहा है कि वो विदेशी मुद्रा बाज़ार में तभी हस्तक्षेप करता है, जब रुपया ज्यादा ही चपल व चंचल हो जाता है। वो इसकी इस वोलैटिलिटी को रोकने के लिए विदेशी मुद्रा के स्पॉट और फॉरवर्ड बाज़ार, दोनों में डॉलर बेचता है। लेकिन न तो वो देश से विदेशी निवेशकों के पलायन को रोक सकता है और न ही अनिवासी भारतीय व अन्य माध्यमों से विदेशी मुद्रा खींच सकता है। वो न तो चालू खाते का घाटा कम कर सकता है और न ही पूंजी खाते का सरप्लस बढ़ा सकता है। इसलिए देश का भुगतान संतुलन बिगड़ा ही रहेगा। उस पर रिजर्व बैंक का कोई कंट्रोल नहीं है। आखिर देश की यह हालत हुई कैसे? बाज़ी हाथ से फिसली कैसे? हमारा रुपया दशकों से अनेक झटके खाकर गिरता ही रहा है। ज्यादातर मामलों में मूल वजह बाहरी रही है। 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट, 2013 में अमेरिका में फेडरल रिजर्व द्वारा सरकारी बॉन्डों की खरीद से हाथ खींच लेना, फरवरी 2022 से जारी रूस-यूक्रेन का युद्ध और उसके चार साल बाद फरवरी 2026 में अमेरिका व इज़रायल का ईरान पर हमला। बाहरी कारकों के साथ ही घरेलू मुद्रास्फीति और चालू खाते का घाटा भी असर डालता है। लेकिन इस बार कई दूसरे कारक भी काम कर रहे हैं। अब सोमवार का व्योम…
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