भारतीय शेयर बाज़ार इस समय संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। पिछले कुछ सालों का आशावाद ज़मीनी हकीकत से टकराकर निराशा में बदलने लगा है। कंपनियों की लाभप्रदता दबाव में है। सप्लाई में बाधा आने और दुनिया में छाए युद्ध की तनातनी में कच्चे माल व ऊर्जा के दाम बढ़ गए हैं। उपभोक्ता मांग ठंडी पड़ी है तो कंपनियां बढ़ी लागत ग्राहकों पर डालने में हिचकिचा रही हैं। उनका मूल्यांकन ठहरा पड़ा है। पहले विदेशी निवेशकऔरऔर भी

शेयर वही खरीदने चाहिए जिनमें बढ़ने की भरपूर संभावना हो, जो हर ऊंच-नीच से उबरकर अंततः फायदा दिला सकें। हर कोई तो यही चाहता है। लेकिन फंस जाता है। खुद ऐसे शेयर निकालने की न तो सामर्थ्य होती है और न ही फुरसत। इसलिए अक्सर सलाहकारों के चंगुल में फंस जाता है। चंगुल इसलिए कहा क्योंकि ज्यादातर सलाहकार निवेशक नहीं, बल्कि अपना भला करने का मिशन लेकर चलते हैं। अपने यहां समूचा वित्तीय बाज़ार शिकारियों से भराऔरऔर भी

शेयर बाज़ार निवेशकों के बल पर चलता है, चाहे वे देशी हों या विदेशी। विदेशी निवेशक लगातार देश से भागे जा रहे हैं। इस साल ही वे जनवरी से अब तक ₹1.75 लाख करोड़ निकाल चुके हैं। इनके निकलने की भरपाई देशी निवेशक संस्थाएं, खासकर म्यूचुअल फंड करते हैं। उनके पास धन का मुख्य प्रवाह एसआईपी का है। देश में एसआईपी खातों की संख्या मार्च में 9.72 करोड़ पर पहुंच गई, जिनमें मार्च महीने में ₹32,087 करोड़औरऔर भी

मध्य-पूर्व में तात्कालिक युद्ध-विराम से शेयर बाज़ार की सांस थोड़ी सामान्य हो गई। लेकिन मार्च महीने में जिस तरह एनएसई का निफ्टी-50 सूचकांक 11.31% और बीएसई का सेंसेक्स-30 सूचकांक 11.49% टूटा है, उससे इन सूचकांकों में शामिल ब्लूचिप कंपनियों के शेयर सस्ते हो गए तो सहज लालच का भाव जागा कि क्यों न ऐसी कंपनियों को लपक लिया जाए। म्यूचुअल फंड स्कीमों के मैनेजर भी सूचकांकों को बेंचमार्क बनाकर चलते हैं। उनकी सफलता का पैमाना यही हैऔरऔर भी

आम लोगों के लिए शेय़र बाज़ार में अल्पकालिक ट्रेडिंग और दीर्घकालिक निवेश की रणनीति अलग-अलग होती है क्योंकि उन्हें अपना जोखिम संभालकर चलना होता है। रिटेल ट्रेडर के लिए उसकी सीमित पूंजी बहुत मायने रखती है क्योंकि ट्रेडिंग पूंजी डूबी तो उसका सारा आधार डूब जाएगा। उसे ट्रेडिंग तभी करनी चाहिए, जबकि न्यूनतम रिस्क में अधिकतम रिटर्न की गुंजाइश हो। उसे युद्ध जैसी अनिश्चितता के माहौल में बाज़ार का तमाशा दूर खड़े रहकर देखना चाहिए और हमेशाऔरऔर भी

कोई कुछ भी कहे, लेकिन शेयर बाज़ार का भविष्य बांचने का कोई तरीका नहीं है। अगर ऐसा होता तो हर कोई इस शेर पर सवार होकर शिकार कर रहा होता। तब निवेश की किसी भी रणनीति का कोई मतलब नहीं होता। एक बात समझ लें कि शेयर बाज़ार बड़ा जटिल और पल-पल बदल रहा तंत्र है जिसमें सब कुछ के ऊपर लाखों-लाख लोगों की भावनाएं निर्णायक होती हैं। यह कोई प्रकृति के नियमों पर चलनेवाला सामान्य तंत्रऔरऔर भी

युद्ध से मध्य-पूर्व ही नहीं, पूरी दुनिया में अफरातफरी मची है। कच्चे तेल का दाम प्रति बैरल 110 डॉलर को पार कर रहा है। भारत अपनी ज़रूरत का 88% कच्चा तेल आयात करता है। डॉलर 94 रुपए तक पहुंच गया है तो हमारा आयात बिल बढ़ता जा रहा है। ऊपर से खाड़ी के देशों में रह रहे करीब 90 लाख भारतीयों द्वारा देश में हर साल भेजे जा रहे 51 अरब डॉलर से ज्यादा की विदेशी मुद्राऔरऔर भी

मध्य-पूर्व में युद्ध का कोहराम। शेयर बाज़ार में अफरातफरी का आलम। हर दिन और हफ्ते निवेशकों की भीड़ हांकनेवाले दिग्गज कह रहे हैं कि यह मंदी का बाज़ार है और सब कुछ बेच-बांचकर निकल लो। लम्बे निवेश की सोच व दृष्टि रखनेवाले निवेशकों को इस भेड़चाल से मुक्ति पानी होगी। यह सच है कि अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर थोपे गए युद्ध की क्रिया-प्रतिक्रिया में कच्चे तेल के दाम करीब 25% बढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचऔरऔर भी

आम जीवन की तरह निवेश की दुनिया में भी धारणाए व मान्यताएं हकीकत से टकराकर बराबर टूटती रहती हैं। इसलिए धारणाओं और मान्यताओं से चिपके रहना गलत है। 28 फरवरी को अमेरिका-इज़राइल ने ईरान पर हमला किया तो शुरू में जानी-समझी प्रतिक्रिया हुई। शेयर बाज़ार गिर गए, मुद्राएं कमज़ोर पड़ गई और जिंसों के दाम बढ़ गए। सोने के दाम खटाक से 2.15% और चांदी के दाम 1.63% बढ़ गए। कहा जाने लगा कि देश में सोनाऔरऔर भी

बदलाव ही शाश्वत व स्थाई है। बाकी सब बराबर बदलता ही रहता है। देश में बचत का स्वरूप भी बदल रहा है। वित्त वर्ष 2011-12 में घरों की वित्तीय बचत का 58% हिस्सा बैंक एफडी में जाता था। यह हिस्सा 2024-25 तक घटकर 35% पर आ गया। लोग अब शेयर बाज़ार में म्यूचुअल फंड के जरिए परोक्ष या स्टॉक्स के जरिए प्रत्यक्ष निवेश ज्यादा करने लगे हैं। 2013-14 में उनकी वित्तीय बचत का 11% हिस्सा शेयर बाज़ारऔरऔर भी