भारतीय निवेशक समझदार होता जा रहा है। वह सीधे खुद स्टॉक्स में निवेश करने के बजाय म्यूचुअल फंड का रास्ता अपनाने लगा है और इसमें भी ज्यादा निवेश सिस्टमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसआईपी) के जरिए। वह समझ चुका है कि बाज़ार की चाल को पकड़ पाना मुश्किल है तो निश्चित रकम नियमित अंतराल पर लगाते रहो ताकि अपनी निवेश लागत संतुलित बनती जाए। निवेशकों ने जून में एसआईपी के ज़रिए म्यूचुअल फंड में 9155.84 करोड़ रुपए लगाए हैंऔरऔर भी

अपना शेयर बाज़ार इस समय दो अतियों में खिंचा हुआ है। स्टॉक्स जो चढ़ चुके हैं और उतरने का नाम नहीं ले रहे। साथ ही स्टॉक्स जो गिरे हैं और उठने का नाम नहीं ले रहे। चढ़े हुए शेयर खरीद भी लें तो हो सकता है कि 10-12 साल में कंपनी के धंधे के बल पर अच्छा-खासा लाभ दे जाएं। लेकिन दो-तीन साल में उनसे कुछ खास नहीं मिलने जा रहा। वहीं, गिरे हुए शेयर हो सकताऔरऔर भी

सालोंसाल से कहा जाता रहा है कि शेयर बाज़ार का उन्माद जब चरम पर रहता है, तब रिटेल निवेशकों की एंट्री होती है। लेकिन इस बार ऐसा नहीं है। टेक्नोलॉज़ी व डिजिटल मीडिया के प्रसार ने रिटेल निवेशकों की वित्तीय साक्षरता व पहल बढ़ा दी है। ऊपर से कोरोनाकाल में ‘वर्क फ्रॉम होम’ के चलते मिली फुरसत ने नौकरी कर रही युवा पीढ़ी को समझदार निवेशक बना दिया। एक सर्वे के मुताबिक बीते सवा साल में ब्रोकरोंऔरऔर भी

अमेरिका के मशहूर हेज फंड मैनेजर माइकेल बरी कहते हैं कि इस वक्त दुनिया के शेयर बाज़ारों से लेकर बिट कॉयन जैसी क्रिप्टो करेंसी तक में इतिहास का सबसे भयंकर बुलबुला बन गया है जो कभी भी फट सकता है और करोड़ों निवेशकों के खरबों-खरब डूब सकते हैं। न तो यह आशंका निराधार है और न ही भारत दुनिया से अगल-थलग कोई द्वीप है। ऐसे में अपनी गाढ़ी बचत शेयरों में लगानेवाले निवेशकों के लिए बेहतर यहीऔरऔर भी

दस रुपए कहीं गिरे हुए मिल जाएं तो जितनी खुशी मिलती है, उससे कहीं ज्यादा गम हमें ऑटो या दुकानवाले के एक रुपए ज्यादा लेने पर होता है। यह सामान्य मनोविज्ञान है। लेकिन शेयर बाज़ार में निवेश करते समय मानकर चलना होता है कि वो सारा धन डूब गया। बाज़ार में वही धन लगाएं जो आपकी अभी और बाद, यहां तक कि आकस्मिक ज़रूरतों का इंतज़ाम कर लेने के बाद बचता है। नहीं बचता तो पहले रोज़ी-रोज़गारऔरऔर भी

हमारे-आप जैसे सामान्य निवेशक के पोर्टफोलियो में कुल कितने स्टॉक्स होने चाहिए? कम से कम बीस और ज्यादा से ज्यादा तीस। इससे ज्यादा हो जाएं तो बेचकर टोकरी छोटी कर लें। आमतौर पर लालच में आकर कभी ज्यादा महंगे शेयर नहीं खरीदने चाहिए। बड़ी व जमी-जमाई कंपनियों के लिए 20-22 और मध्यम व छोटी कंपनियों के लिए 12-13 तक पी/ई का ठीक रहता है। अगर कोई स्टॉक दो-तीन साल में 50-100% का रिटर्न दे रहा हो तोऔरऔर भी

भारत का जीडीपी बीते वित्त वर्ष 2020-21 में 145.69 लाख करोड़ रुपए से 7.3% घटकर 135.13 लाख करोड़ रुपए पर आ गया। पिछले सौ सालों में हमारी अर्थव्यवस्था पहली बार बढ़ने के बजाय सिकुड़ी है। लेकिन इसी दौरान हमारा शेयर बाज़ार 68% बढ़कर ऐतिहासिक चोटी पर पहुंच गया। बीएसई में लिस्टेड लगभग 3500 कंपनियों का मूल्य या बाज़ार पूंजीकरण इस वक्त भारत के जीडीपी के डेढ़ गुना से ज्यादा 227.20 लाख करोड़ रुपए है। ऐसे में रिजर्वऔरऔर भी

देश में 30 अप्रैल 2021 तक शेयर बाज़ार में निवेश के लिए ज़रूरी 5.69 करोड़ डीमैट एकाउंट खुल चुके हैं। इनमें से करीब 1.40 करोड़ एकाउंट बीते वित्त वर्ष 2020-21 के दौरान खुले, जब देश कोरोना की पहली लहर की चपेट में था। जब सब कुछ सामान्य था, तब पिछले वित्त वर्ष 2019-20 में लगभग 49 लाख और उससे पहले 2018-19 में करीब 40 लाख डीमैट एकाउंट ही खुले थे। आर्थिक सुस्ती व लॉकडाउन के दौरान डीमैटऔरऔर भी

कंपनी का बिजनेस अच्छा चल रहा है या नहीं, इसका बड़ा साफ पैमाना होता है उसका लाभांश देने का ट्रैक रिकॉर्ड। लाभ बढ़ाकर दिखाने में कंपनियां उलटफेर कर सकती हैं। इसलिए इस पर पक्का भरोसा नहीं किया जा सकता है। लेकिन लाभांश देने में वे कलाकारी नहीं कर सकतीं। इससे शेयरधारकों के प्रति कंपनी की संवेदनशीलता और प्रबंधन की प्रतिबद्धता का भी पता चलता है। शेयर बाज़ार दबा हो, कंपनी को कम भाव मिल रहा हो तोऔरऔर भी

लम्बे निवेश के बारे में तरह-तरह की धारणाएं हैं। कुछ विशेषज्ञ पांच-दस साल तो कुछ ‘खरीदो व भूल जाओ’ की बात करते हैं। लेकिन हर धारणा समय से बंधी है। समय के साथ उसकी मार या उपयोगिता मिटती रहती है। मसलन, आज के दौर में जब अमेरिका, यूरोप व जापान जैसे विकसित देशों का बेहद सस्ता धन भारत जैसे उभरते देशों के शेयर बाज़ार की तरफ अंधाधुंध बह रहा है, तब बड़ी से लेकर छोटी कंपनियों तकऔरऔर भी