निवेश करते वक्त अपना स्वतंत्र विवेक विकसित करना बहुत ज़रूरी है। अन्यथा, शेयर बाज़ार ही नहीं, हमारा समूचा वित्तीय बाज़ार ऐसे शिकारियों भरा पड़ा है जो कभी भी हमें निपटा सकते हैं। यहां का कोई भी एक्सपर्ट भरोसा करने लायक नहीं है। आपको याद होगा कि जब मार्च-अप्रैल 2020 के दौरान कोरोना की पहली लहर में शेयर बाज़ार ऐतिहासिक तलहटी पकड़ चुका था, तब तथाकथित बाज़ार ‘विशेषज्ञ’ कह रहे थे कि अभी तो कयामत आनी बाकी हैऔरऔर भी

शेयर बाज़ार गिरता ही जा रहा है। पिछले तीन महीनों में रूस-यूक्रेन युद्ध, चीन में आर्थिक सुस्ती, अमेरिका से लेकर अपने यहां मुद्रास्फीति और ब्याज दरों के बढ़ते जाने जैसे नकारात्मक कारकों ने निवेशकों को अंदर से हिलाकर रख दिया है। इस दौरान बिजली और ऑयल एंड गैस छोड़कर बाकी सभी क्षेत्रों के शेयर सूचकांक गिरे हैं। अच्छी-खासी कंपनियों के शेयर डूबे जा रहे हैं। रुपए इतना कमज़ोर हो गया है कि 77.5 रुपए में एक डॉलरऔरऔर भी

जिस तरह देश से लेकर विदेश तक मुद्रास्फीति बढ़ रही है, उसमें इससे निपटने का सबसे अच्छा माध्यम शेयरों में निवेश है। लेकिन अभी शेयर बाज़ार की ही हालत खस्ता है। कभी भी बहुत ज्यादा गिर सकता है और हमारी पूंजी व बचत को डुबा सकता है। फिर कोई निवेशक करे तो क्या करे? उसकी बचत महंगाई के चलते वैसे भी काफी घट चुकी है। इसलिए उसे निवेश में काफी सावधानी बरतनी होगी। एक हिस्सा सुरक्षित रिटर्नऔरऔर भी

बेंजामिन ग्राहम शेयर बाज़ार में निवेश के पितामह हैं। 1949 में छपी उनकी किताब ‘इंटेलिजेंट इनवेस्टर’ निवेश की समझ का मूलाधार है। संभावनामय कंपनियों के शेयर तब खरीदो, जब कोई उन्हें पूछ नहीं रहा हो। फिर इंतजार करो और अंततः वे शेयर आपके लिए दौलत का ढेर लगा देंगे। वॉरेन बफेट से चार्ली मुंगेर तक इसी रास्ते पर चलकर दुनिया के सबसे अमीर लोगों में शुमार हो गए। लेकिन क्या निवेश की यह शैली अब भी कारगरऔरऔर भी

अगर आप मानव शरीर को नहीं समझते तो अच्छे डॉक्टर नहीं बन सकते। मशीनों और जटिल समीकरणों को नहीं समझते तो अच्छे इंजीनियर नहीं बन सकते। इसी तरह अगर आप कंपनी के बिजनेस को नहीं समझते तो अच्छे निवेशक नहीं बन सकते। निवेश का मतलब कुछ संख्याओं पर दांव लगाना नहीं। इसका मतलब है उस कंपनी में स्वामित्व हासिल करना जिसमें आप अपनी रिस्क पूंजी लगाते हैं। भले ही वह छोटी रकम हो, 100-200 शेयर हों। मगरऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में निवेश करना विज्ञान है और कला भी। हमारी काबिलियत जानकारी व अनुभव के साथ बढ़ती जाती है। फिर भी अच्छे निवेश के साथ बुरे निवेश से भी हर किसी का साबका पड़ता है। वॉरेन बफेट जैसे धुरंधर निवेशक भी इससे नहीं बच पाए। 1993 मे उन्होंने डेक्सटर शू कंपनी में 44.30 करोड़ डॉलर का निवेश किया जिसे बाद में उन्होंने जीवन की सबसे बड़ी गलती माना। इसमें उनका सारा निवेश डूब गया था। सवालऔरऔर भी

शेयर बाज़ार स्वभाव से ही अधीर है। लेकिन इसमें लम्बे समय के लिए निवेश करनेवालों को बड़ा धैर्यवान होना पड़ता है। उन्होंने अधीरता दिखाई तो यहां से कभी कमा नहीं सकते। अधीर स्वभाव वाले निवेशकों को सरकारी बॉन्डो, पीपीएफ या बैंक डिपॉजिट का ही आसरा लेना चाहिए। नहीं तो शेयर बाज़ार के निवेश को लेकर वे ताज़िंदगी रोते ही रहेंगे कि मार डाला, हाय! मारा डाला। संभावनामय बिजनेस वाली कंपनी चुनो और भूल जाओ। कंपनी के कामकाजऔरऔर भी

शेयर बाज़ार आशा और निराशा की अतियों के बीच झूलता है। अनिश्चितता के मौजूदा दौर में कुल लोग कह रहे हैं कि सेंसेक्स 1,50,000 तक चला जाएगा तो कुछ का मानना है कि वो 40,000 तक गिर सकता है। यह भी सच है कि बाज़ार को सामान्य या अनुमानित घटनाएं नहीं, बल्कि अचानक होनेवाला अचम्भा बड़ा झटका देता है। लेकिन अच्छी कंपनियों का धंधा बाज़ार को लगनेवाले झटके के बीच भी शांत व सहज गति से बढ़ताऔरऔर भी

विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) भले ही भारत की विकासगाथा को लेकर फिलहाल निराशा दिखा रहे हों। लेकिन हकीकत यह है कि हमारे आर्थिक विकास की संभावना अभी खत्म नहीं हुई है। इसकी मूल वजह है कि भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में शुमार है। यहां की 54 प्रतिशत आबादी 25 साल से कम उम्र की है और यह स्थिति 2035 से 2040 तक बनी रहेगी। काम करनेवाले ज्यादा, उनके ऊपर निर्भर लोग कम। भारत का यहऔरऔर भी

बाज़ार जब तेज़ी पर था तो जिस भी कंपनी का शेयर खरीदो, अमूमन बढ़ ही जाता था। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। इसलिए हमें अपनी रणनीति बदलनी होगी. निवेश प्रकिया में बेहद सावधानी व अनुशासन बरतना होगा। मूलभूत नियम यह है कि उभरती व मजबूत बिजनेस आधार वाली कंपनी के शेयर जितना हो सके, उतने कम भाव पर खरीदें। बाज़ार में आई गिरावट से अच्छी कंपनियों के शेयर सस्ते में उपलब्ध करा दिए हैं। लेकिन इसऔरऔर भी