अच्छा निवेश वो है जिसमें मूलधन सुरक्षित रहे और इतना संतोषजनक रिटर्न मिले जो महंगाई को बेअसर कर सके। निवेश के गुरु बेन ग्राहम ने निवेश की एक और परिभाषा दी है। निवेश वो है जिसे मात्रा और गुणवत्ता, दोनों पैमानों पर खरा पाया जाए। कंपनी में निवेश संबंधी मात्रात्मक पहलुओं में उसके धंधे व लाभ की वृद्धि दर, ऋण-इक्विटी अनुपात, इक्विटी व नियोजित पूंजी पर रिटर्न, लाभ मार्जिन और लाभांश रिकॉर्ड वगैरह आते हैं। इन परऔरऔर भी

आईटी और बैंकिंग व फाइनेंस क्षेत्र में लाखों नौकरियों का बड़ा हल्ला होता है। लेकिन यह हकीकत कोई गले नहीं उतारता कि हमारे कृषि क्षेत्र ने अर्थव्यवस्था में बमुश्किल 15% हिस्सा रखने के बावजूद देश के 50% से ज्यादा लोगों को रोज़गार दे रखा है। दरअसल, भारतीय कृषि क्षेत्र सचमुच भगवान शिव की तरह नीलकंठ बना हुआ है। वह बेरोजगारी से लेकर भयंकर गरीबी तक का विष अगर गले से नीचे उतर जाने दे तो पूरा देशऔरऔर भी

रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि; जहां काम आवे सुई, कहा करे तलवारि। जीवन में छोटी-छोटी चीजों की बड़ी अहमियत है। हमारी अर्थव्यवस्था में भी लघु उद्योगों का भारी योगदान है। लघु समय के साथ बड़ा हो जाता है। सरकार ने हाल ही में लघु कंपनियों की परिभाषा बदल दी है। उसने तय किया है कि अब 4 करोड़ रुपए तक की चुकता पूंजी वाली कंपनियों को लघु माना जाएगा। इससे पहले 2013 में यहऔरऔर भी

दुनिया की अर्थव्यवस्था में इस समय एकदम अलग तरह का बदलाव हो रहा है। वैश्विक कंपनियां अपने माल के लिए चीन से बाहर का कोई ठौर खोज रही हैं। इस मांग का छोटा-सा हिस्सा भी भारत को मिल गया तो हमारी बहुत सारी कंपनियों की चांदी हो सकती है। लेकिन इस अवसर का फायदा उठाने के लिए क्षमता बढ़ाने की ज़रूरत होगी और इसके लिए पूंजी निवेश चाहिए। पूंजी निवेश वही कंपनियां कर सकती हैं जिन परऔरऔर भी

भारत में यूरोपीय देशों जैसी सामाजिक सुरक्षा होती तो आम लोगों को बचत के लिए मगज़मारी नहीं करनी पड़ती। ऊपर से वहां की सरकारें टैक्स का धन अवाम को संकट से बचाने के लिए खर्च करती हैं, जबकि अपने यहां सरकार हर आपदा में टैक्स बढ़ाने के अवसर खोजती है। कच्चे तेल के दाम पिछले आठ साल में बराबर घटते रहे। इधर बढ़ने के बावजूद 2014 से कम हैं। फिर भी हमारी सरकार ने पेट्रोल-डीज़ल व रसोईऔरऔर भी

हमारे शेयर बाजार में देशी-विदेशी बड़ा धन कभी ऑटो शेयरों को फर्श से अर्श तक पहुंचा देता है तो कभी आईटी स्टॉक्स की मिट्टी पलीद कर देता है, जमी-जमाई फाइनेंस कंपनियों को ज़मींदोज़ कर देता है तो सरकारी बैंकों को सिर चढ़ा लेता है। लेकिन अंततः उन उद्योग-धंधों के शेयर बढ़ते ज़रूर हैं, जहां संभावनाएं व्यापक होती हैं। ऐसा ही एक क्षेत्र है कृषि। भारत की आबादी दुनिया की लगभग 18% हो चुकी है। संयुक्त राष्ट्र कीऔरऔर भी

रिस्क बहुत ज्यादा हो तो इंसान को निराशावादी हो जाना चाहिए और रिस्क काफी कम हो तो आशावादी। जबरदस्त रिस्क के माहौल में आशावाद हमारी नैया डुबा सकता है, जबकि निराशावाद से घिरे होने के कारण हम बहुत-बहुत फूंक-फूंककर सावधानी से चलेंगे तो बचने की गुंजाइश भरपूर रहेगी। वहीं, रिस्क बहुत कम हो तो आशावाद से लबालब होकर हम सुरक्षित फैसले ले सकते हैं, जबकि निराशावाद में डूबने पर अच्छे-खासे सुरक्षित मौके भी हमारे हाथ से निकलऔरऔर भी

अपने शेयर बाज़ार की कड़वी हकीकत यह है कि यहां कमाते कम और गंवाते ज्यादा हैं। जो शेयर बाज़ार के धंधे से सीधे जुड़े हैं, ब्रोकर या किसी अन्य बिचौलिये के रूप में, वे ज़रूर सदाबहार कमाई करते हैं। लेकिन बाकियों की हालत अक्सर खराब ही रहती है चाहे वो लम्बे समय के निवेशक हों या छोटी अवधि के ट्रेडर। ऐसे में सहज स्वाभाविक सवाल उठता है कि हमेशा ऊंच-नीच से गुजरते शेयर बाज़ार से कमाने कीऔरऔर भी

झोंक में खरीदना और झोंक में बेच देना यह हमारे शेयर बाज़ार के नए-नवेले निवेशकों की बड़ी पुरानी आदत है। पिछले कुछ दिनों से जब से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की खरीद लौटी है और बाज़ार बढ़ने लगा है, आम निवेशक फिर से बावले होने लगे हैं। वे समझने को तैयार नहीं कि निवेश में भावों को गिरने-उठने के कहीं ज्यादा मायने-मतलब रखती है कंपनी की मूलभूत ताकत। कंपनी अगर मजबूत है, उसका धंधा चलना ही चलना हैऔरऔर भी

हम शेयर बाज़ार में लिस्टेड कंपनी के शेयर इसीलिए खरीदते हैं ताकि कुछ साल बाद उन्हें बेचकर मुनाफा कमा सकें, अपनी ज़रूरत पूरी कर सकें। इसके लिए शेयर को कम से कम भाव पर खरीदना ज़रूरी है। मान लें कि झोंक में आकर या किसी के कहने पर हमने किसी कंपनी का शेयर बढ़े भाव पर खरीद लिये तो वह आखिर कितना बढ़ेगा! अगर उसने बचत खाते या एफडी के बराबर रिटर्न दिया तो क्या फायदा? शेयरोंऔरऔर भी