पश्चिम एशिया के संकट से उपजी अनिश्चितता काफी हद तक खत्म हो चुकी है। प्रति बैरल कच्चे तेल के दाम 100 डॉलर के पार जाने के बाद 70 डॉलर के आसपास डोल रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दावा कर रहे हैं कि उन्होंने सदी के सबसे बड़े संकट को रणनीतिक फैसलों और राजनय से निपटा दिया। लेकिन क्या भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सब कुछ सामान्य हो गया है? क्या हमारा शेयर बाज़ार उसी तरह बम-बम करेगा, जैसाऔरऔर भी

भारतीय शेयर बाज़ार में पंजीकृत निवेशकों की संख्या 25 करोड़ के पार जा चुकी है। इनमें से अलग-अलग पैन नंबर वाले निवेशकों की संख्या 13.1 करोड़ के आसपास है। इनमें से कम से कम 12 करोड़ निवेशक आम और 1.1 करोड़ निवेशक खास होने चाहिए। जब आम निवेशक आईपीओ या सीधे बाज़ार से शेयर खरीदते हैं तो सामने से ज्यादातर खास निवेशक बेचते हैं। खास निवेशकों में तमाम विदेशी निवेशक होते हैं जो वेंचर कैपिटल और प्राइवेटऔरऔर भी

स्पेसएक्स के आईपीओ से पहले एलन मस्क की नेटवर्थ 813 से 970 बिलियन डॉलर थी। आईपीओ आने के बाद उनकी नेटवर्थ 1.1 से 1.3 ट्रिलियन डॉलर हो गई और वे दुनिया के पहले ट्रिलियनर बन गए। 11 जून को आईपीओ में स्पेसएक्स के शेयर 135 डॉलर मूल्य पर जारी हुए। हालांकि इसका अंतर्ऩिहित मूल्य 63 डॉलर ही बताया जाता है। 12 जून को आईपीओ बंद होने तक इसमें लाखों छोटे निवेशकों और हज़ारों बड़े संस्थागत निवेशकों नेऔरऔर भी

ईरान युद्ध अंततः खत्म होने जा रहा है। होर्मुज़ स्ट्रैट से कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति जल्दी ही बहाल हो जाएगी। कच्चे तेल के दाम 80-85 डॉलर प्रति बैरल पर आ चुके हैं। शेयर बाजार फिर से उछलने के मुहाने पर है। बाज़ार में उत्साह लौटने लगा है क्योंकि 15 हफ्तों के चल रहा कंटक अब कटने को है। लेकिन इस दौरान जो शेयर बाज़ार से सब बेच-बाचकर निकल लिए, उनके लिए पछताने का दौर है।औरऔर भी

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद बड़ी आशा व उम्मीद के साथ भारतीय शेयर बाज़ार में वित्त वर्ष 2015-16 से 2023-24 तक शुद्ध रूप से 50.5 अरब डॉलर का निवेश किया। इसमें से अकेले 37.03 अरब डॉलर का शुद्ध निवेश उन्होंने कोरोना महामारी के दौरान वित्त वर्ष 2020-21 में किया। उसके बाद धीरे-धीरे उनकी आशा निराशा में बदलती गई। वो भी तब, जब 2022-23 को आधार वर्ष बनाने के बादऔरऔर भी

निवेश हमेशा भविष्य के लिए किया जाता है, अभी के लिए नहीं। यह भविष्य दो-चार साल से लेकर 10-20 साल भी हो सकता है। लेकिन भविष्य में क्या होगा, यह कोई अभी से जान या बता नहीं सकता। ऐसे में पत्र-पत्रिकाएं और ब्रोकर, सब-ब्रोकर और एजेंट टाइप लोग ऐसी कंपनियों के शेयर खरीदने को कहते हैं जो पहले से काफी बढ़े हुए हैं। लोगबाग भी लालच में इनके झांसे में आ जाते हैं। लेकिन सवाल उठता हैऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में जबरदस्त निराशा का आलम है। बहुत सारे बड़े-बड़े निवेशकों को लगता है कि अब भारत की विकासगाथा का अंत हो गया है। इसकी तात्कालिक वजह जहां पश्चिम एशिया में चल रही उथल-पुथल और ऊर्जा सुरक्षा पर छाया संकट है, वहीं स्थाई वजह मोदी सरकार की स्वार्थी व सत्ता केंद्रित राजनीति है। देश की सत्ता पर संघ व भाजपा का शिकंजा कसता जा रहा है। मगर अर्थव्यवस्था की हालत चॉक के टुकड़े जैसी भंगुर होतीऔरऔर भी

अपने शेयर बाज़ार में बड़ों का नाम लेकर छोटों को चरका बढ़ाने का सिलसिला दशकों से चला आ रहा है। किसी ज़माने में कहा जाता था कि फलानां शेयर हर्षद मेहता ने खरीदा है। केतन पारिख से लेकर दामाणी का नाम भी चलता रहा। फिर राकेश झुनझुनवाला का झुनझुना बजने लगा। आज वही सिलसिला एफआईआई और म्यूचुअल फंडों व डीआईआई तक आ गया है। कहा जाता है कि फलानां शेयर एफआईआई खरीद रहे हैं या कोई नामीऔरऔर भी

अपने शेयर बाज़ार में संस्थागत निवेशकों से लेकर व्यक्तिगत निवेशकों में बेचैनी छाई हुई है। इस साल 2026 में जनवरी से अप्रैल तक के चार महीनों में विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) ने 1.92 लाख करोड़ रुपए के शेयर बेचे हैं। यह पूरे कैलेंडर वर्ष 2025 में उनकी कुल ₹1.66 लाख करोड़ की निकासी से भी ज्यादा है। भारतीय कंपनियों में एफपीआई की शेयरधारिता घटकर अभी 16.7% पर आ गई है। यह 2010 के बाद पिछले 16 सालोंऔरऔर भी

भारतीय शेयर बाज़ार इस समय संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। पिछले कुछ सालों का आशावाद ज़मीनी हकीकत से टकराकर निराशा में बदलने लगा है। कंपनियों की लाभप्रदता दबाव में है। सप्लाई में बाधा आने और दुनिया में छाए युद्ध की तनातनी में कच्चे माल व ऊर्जा के दाम बढ़ गए हैं। उपभोक्ता मांग ठंडी पड़ी है तो कंपनियां बढ़ी लागत ग्राहकों पर डालने में हिचकिचा रही हैं। उनका मूल्यांकन ठहरा पड़ा है। पहले विदेशी निवेशकऔरऔर भी