आशा पर छा गई निराशा, निवेशक पस्त

भारतीय शेयर बाज़ार इस समय संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। पिछले कुछ सालों का आशावाद ज़मीनी हकीकत से टकराकर निराशा में बदलने लगा है। कंपनियों की लाभप्रदता दबाव में है। सप्लाई में बाधा आने और दुनिया में छाए युद्ध की तनातनी में कच्चे माल व ऊर्जा के दाम बढ़ गए हैं। उपभोक्ता मांग ठंडी पड़ी है तो कंपनियां बढ़ी लागत ग्राहकों पर डालने में हिचकिचा रही हैं। उनका मूल्यांकन ठहरा पड़ा है। पहले विदेशी निवेशक ही निकल रहे थे। अब देश के निवेशक भी बाज़ार से हाथ खींच रहे हैं और मुनाफा निकालने की तरफ बढ़ रहे हैं। साल 2020 के बाद पहली बार आम व्यक्तिगत या रिटेल निवेशकों में पस्ती दिख रही है। बीते वित्त वर्ष 2025-26 में उन्होंने शेयर बाज़ार में खरीदने से ज्यादा बेचा है। यह ईरान युद्ध से पहले की स्थिति है। युद्ध ने बाज़ार में निराशा और बढ़ा दी है। माहौल पहले से ज्यादा खराब हो गया है। निवेशक बराबर अपने पोर्टफोलियो का मूल्य घटते देखकर परेशान हैं। ऊपर से रुपया साल भर से जिस तरह गिर रहा है, उससे विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की वापसी मुश्किल है। ब्राज़ील व दक्षिण अफ्रीका तक की मुद्राएं डॉलर से सापेक्ष मजबूत हुई है, जबकि रुपया गिरता ही चला जा रहा है। अब तथास्तु में आज की कंपनी…

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