सच्चाई बड़ी बेरहम होती है। वो किसी पर कोई दया-माया नहीं दिखाती। मोदी सरकार ने बारह साल में अपने कर्मों से भारतीय अर्थव्यवस्था को जिस मुकाम पर ला पटका है, वो बेहद दुखद व खतरनाक है। आगे क्या होगा, यह सोचकर ही दिलो-दिमाग सिहर जाता है। भारत की जिस विकासगाथा की चर्चा 1991 से शुरू उदारीकरण के बाद से ही की जा रही थी, वो अब धराशाई हो चुकी है। मोदी सकार भले ही 2047 तक भारतऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में जबरदस्त निराशा का आलम है। बहुत सारे बड़े-बड़े निवेशकों को लगता है कि अब भारत की विकासगाथा का अंत हो गया है। इसकी तात्कालिक वजह जहां पश्चिम एशिया में चल रही उथल-पुथल और ऊर्जा सुरक्षा पर छाया संकट है, वहीं स्थाई वजह मोदी सरकार की स्वार्थी व सत्ता केंद्रित राजनीति है। देश की सत्ता पर संघ व भाजपा का शिकंजा कसता जा रहा है। मगर अर्थव्यवस्था की हालत चॉक के टुकड़े जैसी भंगुर होतीऔरऔर भी

चीन ही नहीं, दुनिया का कोई भी देश भारत के मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में निवेश करने को तैयार नहीं है। इसके बाहरी और आंतरिक दोनों ही कारण है। सरकार को लगता है कि टैक्स में रियायत देकर विदेशी निवेश खींचा जा सकता है। लेकिन ईडी और सीबीआई के जरिए जिस तरह कंपनियों को परेशान करके वसूली की जाती है, वो सारी दुनिया को पता लग चुका है तो कोई भी कंपनी लफड़े में नहीं पड़ना चाहती। हां, चीनऔरऔर भी

यह कैसा स्वदेशी और आत्मनिर्भर भारत है कि हमें 30.8% औद्योगिक माल चीन से आयात करना पड़ रहा है। भारत हर साल चीन से 50 अरब डॉलर के इलेक्ट्रॉनिक्स व इलेक्ट्रिक उपकरण, 27 अरब डॉलर की मशीनरी और 13 अरब डॉलर के कार्बनिक रसायन, प्लास्टिक व स्टील मेडिकल उपकरण जैसे उत्पाद आयात करता हैं। ये ऐसे आवश्यक उत्पाद हैं जिनके बिना भारतीय अर्थव्यवस्था चल नहीं पाएगी। दुनिया में इनके वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध हैं, लेकिन काफी महंगे। ऊपरऔरऔर भी

भारत का व्यापक जनमत चीन के खिलाफ है। फिर भी मोदी सरकार ने इसकी कोई परवाह न करते हुए 10 मार्च को सीमा से सटे देशों से आनेवाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के नियमों में ढील दे दी। बता दें कि इसी सरकार ने अप्रैल 2020 में जारी प्रेसनोट-3 के तहत चीन द्वारा मौका ताड़कर भारतीय कंपनियों के अधिग्रहण को रोकने के लिए कठोर नियम बनाए थे। अब चीन की कंपनियों को भारतीय कंपनियों में 10% तकऔरऔर भी