अर्थव्यवस्था से बेगाना नहीं शेयर बाजार

साल भर से ज्यादा हो गए। शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग के हुनर, सीख व अभ्यास के जुड़े इस कॉलम में सबके लिए खुला लगभग 200 शब्दों का पहला पैराग्राम हमेशा अर्थव्यवस्था पर केंद्रित रहता है। कभी सरकार की नीतियां, कभी रिजर्व बैंक के फैसले तो कभी किसानी, बेरोज़गारी व गरीबी की स्थिति। अर्थव्यवस्था के पूरे स्पेक्ट्रम को पकड़ने की कोशिश रहती है। सब्सक्राइबरों के साथ ही अन्य लोगों ने भी सवाल उठाए हैं कि शेयर बाज़ार की स्वतंत्र गति है। उससे जुड़े कॉलम को अर्थव्यवस्था की टोपी पहना देने का क्या तुक है? दोस्तों, अर्थव्यवस्था और शेयर बाज़ार को संजीदगी से देखते, समझते और इनके बारे में लिखते हुए मुझे तीस साल हो चुके हैं। यह सिलसिला अमर उजाला कारोबार के लॉन्च के साथ 1996 में शुरू हुआ था। फिर भी मैं खुद को अर्थव्यवस्था व शेयर बाज़ार का विशेषज्ञ नहीं, बल्कि एक नौसिखिया छात्र ही मानता हूं। कुछ सफल विशेषज्ञों ने झाड़ पिलाई कि जब शेयर बाज़ार पर लिखते हो तो सरकार की आर्थिक नीतियों की आलोचन मत किया करो। सफल होना चाहते हो तो क्या लिखना है, इससे ज्यादा ज़रूरी है यह तय करना कि क्या नहीं लिखना है। सब बचकर चलते हैं तो तुम भी बचकर चलो। फटे में क्यों टांग अड़ाते हो! लेकिन सत्य के आग्रह को पिघलाकर यूं टेढ़ा करना कतई आसान नहीं। झूठ नहीं, अर्धसत्य भी नहीं, केवल अर्थसत्य।

अर्थव्यवस्था और शेयर बाज़ार का रिश्ता तीन विमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें समय की चौथी विमा अहम भूमिका निभाती है। इस रिश्ते को अपने जेहन में बैठाए बिना शेयर बाज़ार का कोई भी ट्रेडर शांत भाव से सफलता की मंज़िल नहीं हासिल कर सकता। इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए हमने तय किया है कि अगले करीब डेढ़ महीने हम इस रिश्ते को समझने के साथ ही अपनी अर्थव्यवस्था के बुनियादी पहलुओं को जानने-समझने की कोशिश करेंगे। यह समझ जितनी गहरी होगी, शेयर बाज़ार में निवेश और ट्रेडिंग के फैसले उतने ही संजीदा और समझदारी भरे होंगे। यह समझ बढ़ाने में भेड़चाल नहीं, बल्कि महाजनों की चाल हमारी मार्गदर्शक बन सकती है। अपने शेयर बाज़ार में म्यूचुअल फंड भेड़चाल और एलआईसी जैसी सबसे बड़ी बीमा कंपनी सरकारी चाल पर चलती है, जबकि महाजन हैं तो केवल विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक या एफपीआई।

एफपीआई हमारे शेयर बाज़ार के लिए महाजन इस मायने में हैं कि वे किसी सरकारी झांसे या जोड़तोड़ में नहीं फंसते, बल्कि शुद्ध रूप से अपने विवेक और वित्तीय समझ से फैसले करते हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में उनकी जो भी समझ बनी, उसके आधार पर वे वित्त वर्ष 2021-22 से ही हमारे शेयर बाज़ार से भागने लग गए। उन्होंने 2021-22 में हमारे शेयर बाज़ार से 18.47 अरब डॉलर, 2022-23 में 5.11 अरब डॉलर, 2024-25 में 14.63 अरब डॉलर और 2025-26 में 19.69 अरब डॉलर निकाले हैं। बीच में 2023-24 के दौरान ज़रूर उन्होंने 25.27 अरब डॉलर की शुद्ध खरीद की थी। चालू वित्त वर्ष 2026-27 में वे 10 जुलाई तक 13.49 अरब डॉलर निकाल चुके हैं। पूरा हिसाब लगाएं तो 2021-22 से अब तक एफपीआई ने हमारे शेयर बाज़ार से शुद्ध रूप से 46.12 अरब डॉलर निकाले हैं।

ऐसा तब हो रहा है, जब कोरोना महामारी के साल 2021-22 के बाद भारत लगातार दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बना हुआ है। भारत का जीडीपी 2022-23 में 7%, 2023-24 में 7.2%, 2024-25 में 7.1% और 2025-26 में 7.7% बढ़ा है। इस दौरान 27 सितंबर 2024 को बीएसई सेंसेक्स 85,978.25 अंक और एनएसई निफ्टी-50 सूचकांक 26,277.35 के शिखर पर पहुंच गए तो एफपीआई ने मुनाफावसूली बढ़ा दी। उनकी शुद्ध निकासी बदस्तूर जारी रही। सामने से म्यूचुअल फंडों और बीमा कंपनियों जैसी घरेलू संस्थाओं की खरीद आती रही तो 1 दिसंबर 2025 को सेंसेक्स 86,159.02 और निफ्टी-50 सूचकांक 26,325.80 के नए ऐतिहासिक शिखर पर पहुंच गए। अगले ही महीने 5 जनवरी 2026 को निफ्टी-50 सूचकांक ने 26,373.20 अंक का नया शिखर पकड़ लिया। हल्ला मचा कि सितंबर 2026 की तिमाही में रीयल जीडीपी 8.3% बढ़ा है। इसलिए शेयर बाज़ार ने ऐतिहासिक शिखर चूमा है। लेकिन विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने इस हल्ले पर कोई ध्यान नहीं दिया और भारतीय बाज़ार से निकलते रहे।

उसके बाद पश्चिम एशिया का संकट आ गया जो थोड़ा शांत होने के बाद फिर उबलने लगा है। जीडीपी की विकास दर पर खास कोई आंच नहीं आई है। रिजर्व बैंक ने 2026-27 में जीडीपी के बढ़ने का अनुमान 6.9% से घटाकर 6.6% कर दिया है। सुपर अलनिनो का खतरा भी मंडरा रहा है। फिर भी 6.6% की विकास दर कोई कम नहीं होती। लेकिन निफ्टी-50 सूचकांक 5 जनवरी 2026 के ऐतिहासिक शिखर से इस समय 8.21% डाउन चल रहा है। विदेशी निवेशकों के लौटने के आसार नहीं दिख रहे। ऐसे में 2025-26 में आखिर जीडीपी के 7.7% बढ़ने का क्या मतलब रह जाता है? क्या सरकार का जीडीपी झूठ बोल रहा है या भारत का शेयर बाज़ार? आखिर अर्थव्यवस्था में कहां झोल है जो बाज़ार में जान नहीं आ रही? यह पेंच सुलझाने की कोशिश करेंगे हम अर्थसत्य के अगले लेख में।

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