अगर आप मानव शरीर को नहीं समझते तो अच्छे डॉक्टर नहीं बन सकते। मशीनों और जटिल समीकरणों को नहीं समझते तो अच्छे इंजीनियर नहीं बन सकते। इसी तरह अगर आप कंपनी के बिजनेस को नहीं समझते तो अच्छे निवेशक नहीं बन सकते। निवेश का मतलब कुछ संख्याओं पर दांव लगाना नहीं। इसका मतलब है उस कंपनी में स्वामित्व हासिल करना जिसमें आप अपनी रिस्क पूंजी लगाते हैं। भले ही वह छोटी रकम हो, 100-200 शेयर हों। मगरऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में निवेश करना विज्ञान है और कला भी। हमारी काबिलियत जानकारी व अनुभव के साथ बढ़ती जाती है। फिर भी अच्छे निवेश के साथ बुरे निवेश से भी हर किसी का साबका पड़ता है। वॉरेन बफेट जैसे धुरंधर निवेशक भी इससे नहीं बच पाए। 1993 मे उन्होंने डेक्सटर शू कंपनी में 44.30 करोड़ डॉलर का निवेश किया जिसे बाद में उन्होंने जीवन की सबसे बड़ी गलती माना। इसमें उनका सारा निवेश डूब गया था। सवालऔरऔर भी

शेयर बाज़ार स्वभाव से ही अधीर है। लेकिन इसमें लम्बे समय के लिए निवेश करनेवालों को बड़ा धैर्यवान होना पड़ता है। उन्होंने अधीरता दिखाई तो यहां से कभी कमा नहीं सकते। अधीर स्वभाव वाले निवेशकों को सरकारी बॉन्डो, पीपीएफ या बैंक डिपॉजिट का ही आसरा लेना चाहिए। नहीं तो शेयर बाज़ार के निवेश को लेकर वे ताज़िंदगी रोते ही रहेंगे कि मार डाला, हाय! मारा डाला। संभावनामय बिजनेस वाली कंपनी चुनो और भूल जाओ। कंपनी के कामकाजऔरऔर भी

शेयर बाज़ार आशा और निराशा की अतियों के बीच झूलता है। अनिश्चितता के मौजूदा दौर में कुल लोग कह रहे हैं कि सेंसेक्स 1,50,000 तक चला जाएगा तो कुछ का मानना है कि वो 40,000 तक गिर सकता है। यह भी सच है कि बाज़ार को सामान्य या अनुमानित घटनाएं नहीं, बल्कि अचानक होनेवाला अचम्भा बड़ा झटका देता है। लेकिन अच्छी कंपनियों का धंधा बाज़ार को लगनेवाले झटके के बीच भी शांत व सहज गति से बढ़ताऔरऔर भी

विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) भले ही भारत की विकासगाथा को लेकर फिलहाल निराशा दिखा रहे हों। लेकिन हकीकत यह है कि हमारे आर्थिक विकास की संभावना अभी खत्म नहीं हुई है। इसकी मूल वजह है कि भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में शुमार है। यहां की 54 प्रतिशत आबादी 25 साल से कम उम्र की है और यह स्थिति 2035 से 2040 तक बनी रहेगी। काम करनेवाले ज्यादा, उनके ऊपर निर्भर लोग कम। भारत का यहऔरऔर भी

बाज़ार जब तेज़ी पर था तो जिस भी कंपनी का शेयर खरीदो, अमूमन बढ़ ही जाता था। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। इसलिए हमें अपनी रणनीति बदलनी होगी. निवेश प्रकिया में बेहद सावधानी व अनुशासन बरतना होगा। मूलभूत नियम यह है कि उभरती व मजबूत बिजनेस आधार वाली कंपनी के शेयर जितना हो सके, उतने कम भाव पर खरीदें। बाज़ार में आई गिरावट से अच्छी कंपनियों के शेयर सस्ते में उपलब्ध करा दिए हैं। लेकिन इसऔरऔर भी

मौजूदा परिस्थिति में शेयर बाज़ार के लम्बे निवेशक के सामने क्या रास्ता है? इसका पहला जवाब तो यह कि एफडी या सरकारी बॉन्डों में आधी बचत लगा देने के बाद बाकी रकम का बड़ा हिस्सा म्यूचुअल फंडों की इक्विटी स्कीमों में एसआईपी (सिस्टेमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान) के ज़रिए लगाएं। फिर भी सीधे स्टॉक्स में लगाना है तो ऊंचे स्तर की मजबूत कंपनियों के शेयर कम भाव पर खरीदें। जो मूलतः कमज़ोर कंपनियां हों, किसी भी वजह से घाटेऔरऔर भी

शेयर बाज़ार अभी जिस तरह थोड़ा-थोड़ा गिर रहा है, उसे करेक्शन कहते हैं। 24 फरवरी को यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद छह ट्रेडिंग सत्रों में निफ्टी-50 सूचकांक 4.79% गिर चुका है। हो सकता है कि अगले कुछ हफ्तों में 10-12% गिर जाए। करेक्शन के ऐसे दौर में निवेशक घबरा जाते हैं। वे अपनी सारी योजना छोड़ मैदान से भागने लगते हैं। कुछ बाज़ार की सवारी करने का दम भरते हैं और उससे आगे निकलने कीऔरऔर भी

युद्ध जारी है। रूस यूक्रेन में अपनी समर्थक सरकार बनाए बिना पीछे नहीं हटनेवाला। नाटो ने भी टैंक भेजने शुरू कर दिए हैं। अब शेयर बाज़ार का क्या होगा? पहले दिन जमकर गिरा। अगले दिन उठ गया। अब क्या होगा? गिरेगा या उठेगा! लेकिन हां या ना, सही या गलत और कंप्यूटर की भाषा में कहें तो शून्य व एक की बाइनरी अलावा भी दुनिया में बहुत होता है। सोचने की आसानी से लिए यकीनन यह तरीकाऔरऔर भी

एक बात हमें अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि न तो अपने यहां देखभाल करनेवाला समाज है और न ही सरकार। हर कोई स्वार्थ का पुतला है। सरकार भी चंद निहित स्वार्थों की सेवा में लगी है। सबका साथ, सबका विकास महज अवाम को झांसा देने का नारा है। सबका विश्वास भी चरका पढ़ाकर हासिल किया जाता है। हमें अपना हित खुद समझना और हासिल करना है। शेयर बाज़ार पर भी यह बात पूरी तरह लागू होतीऔरऔर भी