कंपनियों पर लटकी सरकार की तलवार

माना जा रहा था कि भारत से लाइसेंस-परमिट राज 33 साल पहले 1991 में नई आर्थिक उदार नीतियां लागू होने के बाद खत्म हो गया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर चुनावी बांडों के खुलासे से साफ हो गया कि देश में अब भी कंपनियों के लिए सरकार की कृपा बहुत मायने रखती है। जिस तरह अपोलो टायर्स, बजाज ऑटो, बजाज फाइनेंस, ग्रासिम इंडस्ट्रीज़, महिंद्रा ग्रुप, पिरामल एंटरप्राइसेज़, गुजरात फ्लूरोकेमिकल्स, टीवीएस, सनफार्मा, वर्द्धमान टेक्सटाइल्स, मुथूत, सुप्रीम इंडस्ट्रीज़, वेदांता, भारती एयरटेल, फिनोलेक्स केबल्स, रैडिको खेतान, फोर्स मोटर्स, पीवीआर, जीएचसीएल, इंडिया ग्लाइकोल्स, जिंदल पॉलि फिल्म्स, टोरेंट पावर, टोरेंट फार्मा, ज़ेनसार टेक्नोलॉजीज, सीएट, डॉ. रेड्डीज़ लैब, हीरो मोटोकॉर्प, आईटीसी, एमआरएफ, श्री सीमेंट, इंडिगो, सिप्ला, डीएलएफ, अल्ट्राटेक सीमेंट, वेलस्पन कॉर्प, स्पाइसजेट, ऑरोबिंदो फार्मा, पटेल इंजीनियरिंग, आईएफबी एग्रो, कल्पतरु प्रोजेक्ट्स, गुडलक इंडिया, सायंट और नैटको फार्मा जैसी तमाम छोटी-बड़ी लिस्टेड कंपनियों को चुनावी बांड खरीदकर सत्ताधारी पार्टी को चंदा देना पड़ा है, उससे सरकार की सर्वसत्ता पूरी तरह साबित हो जाती है। अब तथास्तु में आज की कंपनी…

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