भारत में यूरोपीय देशों जैसी सामाजिक सुरक्षा होती तो आम लोगों को बचत के लिए मगज़मारी नहीं करनी पड़ती। ऊपर से वहां की सरकारें टैक्स का धन अवाम को संकट से बचाने के लिए खर्च करती हैं, जबकि अपने यहां सरकार हर आपदा में टैक्स बढ़ाने के अवसर खोजती है। कच्चे तेल के दाम पिछले आठ साल में बराबर घटते रहे। इधर बढ़ने के बावजूद 2014 से कम हैं। फिर भी हमारी सरकार ने पेट्रोल-डीज़ल व रसोईऔरऔर भी

हमारे शेयर बाजार में देशी-विदेशी बड़ा धन कभी ऑटो शेयरों को फर्श से अर्श तक पहुंचा देता है तो कभी आईटी स्टॉक्स की मिट्टी पलीद कर देता है, जमी-जमाई फाइनेंस कंपनियों को ज़मींदोज़ कर देता है तो सरकारी बैंकों को सिर चढ़ा लेता है। लेकिन अंततः उन उद्योग-धंधों के शेयर बढ़ते ज़रूर हैं, जहां संभावनाएं व्यापक होती हैं। ऐसा ही एक क्षेत्र है कृषि। भारत की आबादी दुनिया की लगभग 18% हो चुकी है। संयुक्त राष्ट्र कीऔरऔर भी

रिस्क बहुत ज्यादा हो तो इंसान को निराशावादी हो जाना चाहिए और रिस्क काफी कम हो तो आशावादी। जबरदस्त रिस्क के माहौल में आशावाद हमारी नैया डुबा सकता है, जबकि निराशावाद से घिरे होने के कारण हम बहुत-बहुत फूंक-फूंककर सावधानी से चलेंगे तो बचने की गुंजाइश भरपूर रहेगी। वहीं, रिस्क बहुत कम हो तो आशावाद से लबालब होकर हम सुरक्षित फैसले ले सकते हैं, जबकि निराशावाद में डूबने पर अच्छे-खासे सुरक्षित मौके भी हमारे हाथ से निकलऔरऔर भी

अपने शेयर बाज़ार की कड़वी हकीकत यह है कि यहां कमाते कम और गंवाते ज्यादा हैं। जो शेयर बाज़ार के धंधे से सीधे जुड़े हैं, ब्रोकर या किसी अन्य बिचौलिये के रूप में, वे ज़रूर सदाबहार कमाई करते हैं। लेकिन बाकियों की हालत अक्सर खराब ही रहती है चाहे वो लम्बे समय के निवेशक हों या छोटी अवधि के ट्रेडर। ऐसे में सहज स्वाभाविक सवाल उठता है कि हमेशा ऊंच-नीच से गुजरते शेयर बाज़ार से कमाने कीऔरऔर भी

झोंक में खरीदना और झोंक में बेच देना यह हमारे शेयर बाज़ार के नए-नवेले निवेशकों की बड़ी पुरानी आदत है। पिछले कुछ दिनों से जब से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की खरीद लौटी है और बाज़ार बढ़ने लगा है, आम निवेशक फिर से बावले होने लगे हैं। वे समझने को तैयार नहीं कि निवेश में भावों को गिरने-उठने के कहीं ज्यादा मायने-मतलब रखती है कंपनी की मूलभूत ताकत। कंपनी अगर मजबूत है, उसका धंधा चलना ही चलना हैऔरऔर भी

हम शेयर बाज़ार में लिस्टेड कंपनी के शेयर इसीलिए खरीदते हैं ताकि कुछ साल बाद उन्हें बेचकर मुनाफा कमा सकें, अपनी ज़रूरत पूरी कर सकें। इसके लिए शेयर को कम से कम भाव पर खरीदना ज़रूरी है। मान लें कि झोंक में आकर या किसी के कहने पर हमने किसी कंपनी का शेयर बढ़े भाव पर खरीद लिये तो वह आखिर कितना बढ़ेगा! अगर उसने बचत खाते या एफडी के बराबर रिटर्न दिया तो क्या फायदा? शेयरोंऔरऔर भी

अपने ही सुख के बारे में सोचते-सोचते हम अक्सर दुख से दबे रहते हैं। फॉर्मूला याद नहीं रखते कि “दुख तुम्हें क्या तोड़ेगा, तुम दुख को तोड़ दो। बस अपनी आंखें औरों के सपनों से जोड़ दो।” देश में इस वक्त 80% लोग बमुश्किल गुजर-बसर कर पाते हैं जबकि नेता-अभिनेता, क्रिकेटर, दलाल, ठेकेदार व धंधेबाज़ों से मिलकर बनी 5% आबादी का कैश-फ्लो इतना है कि उन्हें बचाने की ज़रूरत नहीं। बाकी बचे 15% लोग ही अपनी बचतऔरऔर भी

आज के दौर में सबसे मुश्किल काम है कमाना। दिक्कत यह है कि काम ही नहीं मिल रहा तो कमाएंगे कैसे? कहते हैं कि खोजने पर तो भगवान भी मिल जाता है। फिर काम कैसे नहीं मिलेगा? लेकिन करोड़ों लोगों को लाख खोजने पर भी काम नही मिल रहा। कमाने के बाद की कड़ी है बचाना। बचाने के बाद उसे बढ़ाना।  की जुगत। बचत को कहीं लगाया नहीं तो मुद्रास्फीति दीमक की तरह खा जाएगी। इसलिए उसेऔरऔर भी

एक बात हमें बहुत साफ समझ लेनी चाहिए कि वित्तीय बाज़ार में हम अपनी बचत लगाकर जो भी कमाते हैं वह किसी दूसरे के उद्यम का नतीजा होता है। बैंक हमें एफडी पर इसलिए ज्यादा ब्याज देता है क्योंकि वह हमारे धन को उधार पर चढ़ाकर उससे ज्यादा कमा लेता है। सरकार हमें बॉन्ड पर इसलिए ज्यादा ब्याज देती है क्योंकि हमारा धन उसकी ज़रूरतें पूरी करता है और उसके पास उधार चुकाने के लिए ज्यादा उधारऔरऔर भी

सही निवेश के लिए कंपनी और उनके बिजनेस को जानना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि साफ-साफ इस बात का भी आकलन होना चाहिए कि पांच-दस साल बाद कंपनी और उसका बिजनेस कहां तक पहुंच सकता है। यकीनन, सटीक रूप से भविष्य तो कोई नहीं जानता। लेकिन समझदार आकलन से हम भविष्य के रिस्क को कम कर लेते हैं। शेयर बाज़ार में निवेश या ट्रेडिंग रिस्क को संभालने का ही खेल है। हमें इस रिस्क को न्यूनतम करने काऔरऔर भी