अर्थव्यवस्था का पचका हो जाए तो देश का आम जनजीवन और रोज़ी-रोज़गार थरथरा जाता है। सात साल से यही हो रहा है। वित्त वर्ष 2018-19 से 2025-26 तक के सात सालों में हमारा रीयल जीडीपी मात्र 5.4% की सालाना चक्रवृद्धि दर (सीएजीआर) से बढ़ा है। 2013-14 से 2025-26 तक के 12 साल के मोदीकाल में भी यह दर 6.2% ही रही है। हालांकि सरकार कोरोना की डुबकी के बाद पिछले दो-तीन की विकास दर की चकाचौंध दिखाने की धूर्तता कर रही है। नई सीरीज़ के मुताबिक हमारा रीयल जीडीपी 2023-24 में 7.2%, 2024-25 में 7.1% और 2025-26 में 7.6% बढ़ा है। लेकिन इसी दौरान देश के नॉमिनल जीडीपी की विकास दर 2023-24 के 11.0% से घटकर 2024-25 में 9.7% और 2025-26 में 8.6% रह गई। इस ज़मीनी सच्चाई के बीच भी भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन यह सब्ज़बाग दिखाने ने नहीं चूकते कि भारत 2047 तक 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन सकता है। उन्होंने हिसाब लगाया कि इसके लिए भारत को डॉलर में साल-दर-साल 12% की दर से बढ़ना होगा। बीते हफ्ते गुरुवार को आईआईटी मद्रास के समारोह में उन्होंने यह भी कहा कि भारत का जीडीपी अभी 3.91 ट्रिलियन डॉलर है। यह अगले छह साल में 7.8 ट्रिलियन डॉलर हो सकता है। कैसे? बड़ी कठिन पहेली है। जब रुपया डॉलर के सापेक्ष साल भर में 12% कमज़ोर हो गया हो, तब अर्थव्यवस्था डॉलर में 12% सालाना कैसे बढ़ेगी? अब मंगलवार की दृष्टि…
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