देश की अर्थव्यवस्था डूबती जा रही है। सरकार यह सच स्वीकार नहीं कर सकती क्योंकि ऐसा करने पर वो खुद डूब जाएगी। लेकिन रुपया रसातल में जा रहा है, यह हर खासो-आम खुली आंखों से देख रहा है। फरवरी अंत में ईरान पर अमेरिकी हमले के बाद रुपया 30 मार्च को डॉलर के मुकाबले 95.22 तक चला गया था। महीने भर बाद 30 अप्रैल को इसने 95.35 की नई तहलटी पकड़ ली। कच्चा तेल 110 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बना रहा तो डॉलर 100 रुपए का भी हो सकता है। दुनिया की दूसरी प्रमुख मुद्रा यूरो पहले ही 111 रुपए के पार जा चुकी है। ब्रिटिश पाउंड भी 129 रुपए के करीब चल रहा है। विचित्र बात है कि जब अमेरिकी डॉलर खुद कमज़ोर हो रहा है, तब रुपया उसके मुकाबले मजबूत होने के बजाय गिरता जा रहा है, वो भी भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा विदेशी मुद्रा बाज़ार में बराबर डॉलर बेचकर सप्लाई बढ़ाने के बावजूद। ऐसा तब, जब भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया में पांचवीं से चौथी बनने के बजाय छठे नंबर पर खिसक गई है। पिछले एक साल में हमारा रुपया डॉलर के मुकाबले 12.11% कमज़ोर हुआ है। 2013 में भी जनवरी से सितंबर के बीच डॉलर के मुकाबले रुपया 12% गिरा था। तब मॉर्गन स्टैनले में भारत को इंडोनेशिया, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका व तुर्किए के साथ दुनिया की पांच ‘फ्रेज़ाइल’ या भंगुर अर्थव्यवस्थाओं में रख दिया था। अब सोमवार का व्योम…
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