साल 2013 में जब आईएमएफ ने भारत, इंडोनेशिया, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका और तुर्किए को दुनिया की पांच फ्रेज़ाइल या भंगुर अर्थव्यवस्थाएं कहा था, तब जनवरी से सितंबर के बीच डॉलर के सापेक्ष भारतीय रुपया 12%, इंडोनेशिया का रुपैया 15.4%, दक्षिण अफ्रीका का रैंड 14.4%, तुर्किए का लीरा 9.9% और ब्राज़ील का रियाल 7.6% गिरा है। वहीं, इस बार पिछले 12 महीनों में डॉलर के मुकाबले रुपया 12.09%, तुर्किए का लीरा 17.17% और इंडोनेशिया का रुपैया 4.33% कमज़ोर हुआ है, जबकि इसी दौरान डॉलर के सापेक्ष ब्राज़ील का रियाल 12.70% और दक्षिण अफ्रीका का रैंड 9.98% मजबूत हुआ है। अगस्त 2014 से तुर्किए के राष्ट्रपति बने रेसेप तैयप एर्दोगन ने अपनी मुद्रा लीरा की जैसी दुर्गति की है, मई 2024 से भारत के प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी ने भारतीय रुपए की वैसी ही दुर्गति कर डाली। यह भारतीय अर्थव्यवस्था का कैसा कुशल प्रबंधन है कि 2047 में विकसित भारत का नारा लगाते हुए उसे 12 साल में फिर से दुनिया की भंगुर अर्थव्यवस्था बना दिया गया? डर है कि मोदी सरकार भारत को कहीं तुर्किए की हालत में न पहुंचा दे, जिसकी मुद्रा लीरा मई 2018 के बाद से अब तक डॉलर के मुकाबले 1000% से ज्यादा टूट चुकी है। हमारी मुद्रा मंगलवार को 95.40 रुपए प्रति डॉलर की ऐतिहासिक तलहटी तक गिर गई। आगे का क्या भरोसा? अब गुरुवार की दशा-दिशा…
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