वो सच, जिसको छिपा रहा है रिजर्व बैंक

देश की मौद्रिक संस्था भारतीय रिजर्व बैंक कहने को अब भी स्वायत्त है। हालांकि मोदी सरकार ने पिछले बारह सालों में उसका ऐसा बधियाकरण किया है कि सरकार की हां में हां मिलाना उसकी फितरत बन गई है। मुद्रास्फीति पर नियंत्रण रखना, आर्थिक विकास को सुगम बनाना और इसके अनुरूप नीतियां बनाना उसकी ज़िम्मेदारी है। लेकिन सरकार को खुश रखने के चक्कर में वो इतना असंगत हो गया है कि उसका रुख, अनुमान और फैसला एक दिशा के बजाय अलग-अलग दिशाओं में भागता नज़र आता है। कोई यीर घाट तो कोई वीर घाट। कहीं कोई स्पष्टता नहीं। रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की अगली बैठक 3-4-5 अगस्त को होनी है। इससे दो महीने पहले 3-4-5 जून को हुई पिछली बैठक में समिति ने सर्वसम्मति से ब्याज दरों को जस का तस रखने और ठंडा रुख अपनाने का निर्णय लिया। न नरम, न गरम। चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में रिटेल मुद्रास्फीति के 4.65% और दूसरी छमाही में 5.65% हो जाने का उसका अनुमान है। जून में रिटेल मुद्रास्फीति 17 महीनों में पहली बार रिजर्व बैंक की निर्धारित दर 4% के पार 4.38% पर पहुंच गई, जबकि थोक मुद्रास्फीति 44 महीनों के सर्वोच्च स्तर 9.87% पर जा पहुंची। पश्चिम एशिया के उबाल और अल-निनो की आपदा के बीच भी रिजर्व बैंक ने रेपो दर को 5.25% पर अपरिवर्तित क्यों रखा?

अब सरकार ने दो तरह की मुद्रास्फीति के साथ तीसरा खुन्तरू भी जोड़ दिया है। यह है प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स या पीपीआई आधारिक मुद्रास्फीति। यह भी जून में बढ़कर 9.57% हो गई। लेकिन मुद्रास्फीति के तीन-तीन सूचकांकों के बावजूद देश में महंगाई से लेकर आर्थिक विकास का मामला बेहद उलझा हुआ है। तीनों मुद्रास्फीति बढ़ी है। मगर रिटेल मुद्रास्फीति से खाद्य व ईंधन को हटा देने के बाद बची कोर मुद्रास्फीति 3.90% पर स्थिर है। जनवरी में यह 3.70% हुआ करती थी। यह 2023 के शुरू में 6% हुआ करती थी। अर्थशास्त्री सवाल उठाते हैं कि जब हमारा जीडीपी तीन सालों में 7.2%, 7.1% और 7.7%  बढ़ा है, तब मूल आर्थिक गति को दर्शाती कोर मुद्रास्फीति 6% से घटकर 3.9% पर कैसे आ गई? कुछ तो गड़बड़ है!

असल में जीडीपी खपत बढ़ने से नहीं, निवेश के स्टेरॉयड के चलते बढ़ा है। 2023-24 से 2025-26 तक देश में निवेश को दिखानेवाला ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन (जीएफसीएफ) क्रमशः 7.3%, 6.4% और 8.2% बढ़ा है, जबकि इसी दौरान खपत को दिखानेवाला प्राइवेट फाइनल कंजम्पशन एक्सपेंडिचर (पीएफसीई) इससे कम 5.8%, 5.8% और 7.7% की दर से बढ़ा है। 2025-26 में खपत में थोड़ा सुधार सितंबर में जीएसटी घटाने की वजह से आया है। खपत घटने के बावजूद उत्पादक क्षमता बढ़ने के पीछे का मुख्य कारक सरकारी निवेश है जिसका अच्छा-खासा हिस्सा कमीशन और भ्रष्टाचार में चला जाता है। निजी क्षेत्र में कोई खास निवेश नहीं आ रहा है। यही वजह है कि जीडीपी में जीएफसीएफ का हिस्सा 2022-23 में 32.4% था। यह 2024-25 में 32.2% और 2025-26 में 32.3% पर अटका पड़ा है। बता दें कि जीएफसीएफ में सरकार और सरकारी कंपनियों का सम्मिलित योगदान 25.2% चल रहा है।

अब लौटते हैं जीडीपी बढ़ने के बावजूद कोर मुद्रास्फीति के घटने की उलट चाल पर। सोना-चांदी जैसी बहुमूल्य धातुओं को निकाल दें तो आर्थिक गति के मूल को दर्शाती मुख्य कोर मुद्रास्फीति जून में 3.90% के बजाय 2.90% ही निकलती है। इस मुद्रास्फीति के कम होने से रिजर्व बैंक के पास रेपो या ब्याज को दर को 5.25% पर ही रखने का बहाना मिल जाता है। लेकिन असली सवाल है कि कोर मुद्रास्फीति इतनी कम क्यों है? आप यह जानकर चौंक जाएंगे कि इसका मुख्य कारण है चीनी माल के घटते दाम। चीन में प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स (पीपीआई) मुद्रास्फीति अक्टूबर 2022 से फरवरी 2026 तक ऋणात्मक चल रही है। मतलब, वहां का माल महंगा होने के बजाय सस्ता हो रहा है। भारत चूंकि अपना 30% से ज्यादा औद्योगिक माल चीन से आयात करता है। इसलिए इस तरह वो चीन से असल में ‘मंदीस्फीति’ आयात कर रहा है।

भारत के मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में चीन की घुसपैठ हमारे कोर मुद्रास्फीति के घटने की प्रमुख वजह है। चीन पर हमारी सप्लाई श्रृंखला की निर्भरता बराबर बढ़ती जा रही है। भारत में चीनी माल का आयात 2025-26 में बढ़ते-बढ़ते 131.63 अरब डॉलर पर पहुंच गया। यह भारत के जीडीपी का करीब 3.5% बनता है। भारत में आ रहे चीनी माल में आम इस्तेमाल से लेकर दवा उद्योग में इस्तेमाल होनेवाली एपीआई और फैक्ट्रियों में इस्तेमाल होनेवाले साजोसामान तक शामिल है। ध्यान दें कि टैक्स को हटा दें तो मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र का फैक्टरी गेट पर आउटपुट पीपीआई मई से जून के बीच 0.3% घट गया। वहीं, इस क्षेत्र का इनपुट पीपीआई इस दौरान 2.1% चढ़ गया। ऐसा इसलिए क्योंकि मैन्यूफैक्चरर को मिलनेवाले दाम में मामूली अंतर आया, जबकि टैक्स के चलते उसकी लागत बढ़ गई। व्यापक स्तर पर देखें तो इस साल फरवरी से जून के बीच थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति 2.13% से 7.74% ऊपर 9.87% पहुंच गई, जबकि रिटेल मुद्रास्फीति 3.21% से 1.17% ऊपर 4.38% पर ही पहुंची है।

मुद्रास्फीति के इन आंकड़ों ने तीन सच खुलकर सामने आते हैं। एक, खाद्य व ईंधन के दाम बढ़ने से रिटेल मुद्रास्फीति बढ़ी है, जबकि कोर मुद्रास्फीति का कम होना खपत के घटते जाने और आर्थिक सुस्ती का संकेत है। दो, जीडीपी सरकारी निवेश के दम पर फूल रहा है, जबकि खपत व निजी निवेश ठंडा पड़ा है। तीन, मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र चीनी आयात पर निर्भर होता जा रहा है। चीन में पीपीआई मुद्रास्फीति के चार साल से ऋणात्मक होने से हमारी कोर मुद्रास्फीति जीडीपी बढ़ने के बावजूद घट रही है। यह देश की अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भर भारत के लिए घातक है। देश के खपत को बढ़ाने के लिए राजकोषीय नीति के साथ ही वाजिब मौद्रिक नीति की ज़रूरत है। सरकार की राजकोषीय नीति तो दलगत स्वार्थ के नीचे दबी पड़ी है, जबकि रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति का मकसद मुद्रास्फीति के पेंच सुलझाकर खपत बढ़ाने और आर्थिक विकास को गति देने के बजाय सरकार की छवि को बचाने के लिए रुपए को मजबूत बनाना रह गया है। इसलिए उसका ध्यान देश की आंतरिक स्थितियों पर नहीं, बल्कि अमेरिका के केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व की फैसलों पर ज्यादा रहता है।

अपनी यह मजबूरी छिपाने के लिए रिजर्व बैंक आधा-अधूरा सच पेश कर रहा है और पूरा सच बयां करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा। पश्चिम एशिया संकट और अल-निनो के प्रभाव के चलते उसने चालू वित्त वर्ष 2026-27 में जीडीपी के विकास का अनुमान घटाकर 6.6% तो कर दिया। लेकिन वो मानने को तैयार ही नहीं कि देश में खपत की कोई समस्या है या निवेश में किसी तरह की दिक्कत है। कोर मुद्रास्फीति का घटना साफ-साफ दिखाता है कि अर्थव्यवस्था में मांग ठंडी पड़ी है। साथ ही जीडीपी में पूंजी निवेश का हिस्सा 32% के आसपास ठहरा रहना शुभ संकेत नहीं है, वो भी तब, जब सरकार ने खुद पूंजी लगाकर किसी तरह इस निवेश को गिरने से रोक रखा है। फिर भी रिजर्व बैंक कहता है कि अर्थव्यवस्था में मजबूती बनी हुई और स्थाई या पूंजी निवेश की संवेग जारी है। हालांकि उसने नवीनतम वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट में माना है कि निजी कॉरपोरेट निवेश दबा हुआ है जो निवेश व जीडीपी के अनुपात के दबे रहने में झलकता है। सवाल उठता है कि जब आर्थिक विकास सुस्त पड़ रहा हो और मुद्रास्फीति बढ़ रही हो, तब रिजर्व बैंक को विकास या मुद्रास्फीति में से किसकी चिंता ज्यादा करनी चाहिए?

अगले हफ्ते सोम-मंगल-बुध की बैठक में मौद्रिक नीति समिति जो फैसला करेगी, उससे रिजर्व बैंक का रुख साफ हो जाएगा। बहुत मुमकिन है कि कोर मुद्रास्फीति के दबे होने के कारण वो रेपो या ब्याज दर नहीं बढ़ाएगा। मतलब आमजन को महंगाई से राहत की कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। साथ ही आर्थिक विकास को गति देने के लिए ब्याज दर में कमी भी नहीं करेगा क्योंकि उसे पता है कि मांग ही नहीं है तो धन सस्ता कर देने से भी निजी क्षेत्र नया निवेश नहीं करने जा रहा। इस बीच अमेरिकी केद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व की ओपन मार्केट समिति ने 28-29 जुलाई (कल और परसों) की बैठक के बाद ब्याज दरें बढ़ा दी तो वहां के सरकारी बॉन्डों पर यील्ड दी दर भी बढ़ जाएगी। तब अपने रिजर्व बैंक को भी अगस्त की बैठक में ब्याज दर बढ़ानी पड़ सकती है। ऐसा नहीं करने पर देश से डॉलर की निकासी बढ़ सकती है जिससे रुपया डॉलर के मुकाबले और कमज़ोर हो सकता है। तब रुपए को संभालने के लिए रिजर्व बैंक को और डॉलर झोंकने पड़ सकते हैं। दिक्कत यह है कि इतनी मशक्कत के बावजूद रुपए का गिरना रुक नहीं रहा।

20 मई 2026 को एक डॉलर 96.96 रुपए का हो गया था। यह रुपए का अब तक का न्यूनतम स्तर है। ऐसा तब जब रिजर्व बैंक ने अप्रैल में 8.95 अरब डॉलर बेचे थे। इसके बाद मई में उसने बाज़ार में शुद्ध रूप से 6.1 अब डॉलर झोंक दिए। इससे रिजर्व बैंक के मुनाफे में इजाफा हो सकता है। बीते वित्त वर्ष 2025-26 में रिजर्व बैंक ने स्पॉट बाज़ार में शुद्ध रूप से 53.31 अरब डॉलर डाले थे। किसी भी वित्त वर्ष में रिजर्व बैंक का यह अब तक का सबसे बड़ा हस्तक्षेप था। इससे पहले वित्त वर्ष 2024-25 में उसने 34.51 अरब डॉलर की शुद्ध बिक्री थी। लेकिन डॉलर के सामने रुपए का दम फूलता ही जा रहा है। 1 अप्रैल 2024 को रुपए की विनिमय दर 83.43 रुपए प्रति डॉलर थी। आज 27 जुलाई 2026 को सुबह यह दर 96.21 रुपए प्रति डॉलर चल रही है। इस तरह सवा दो साल में 102.87 अरब डॉलर बाज़ार में झोंकने के बावजूद डॉलर के मुकाबले रुपया 13.28% गिर चुका है! आखिर हमारा रिजर्व बैंक किसके कहने पर किस पिनक में काम कर रहा है? मुद्रास्फीति और आर्थिक विकास को दरकिनार कर उसने रुपए के बचाने का कार्यभार पकड़ा। लेकिन वो भी कायदे से नहीं हो पा रहा! देश की शीर्षस्थ मौद्रिक संस्था का यह नाकारापन भारत की अस्मिता और संप्रभुता के लिए घातक है।

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