भारत देश, उसके जन-जन, पेड़-पालव, सारी वनस्तियां, पशु-पक्षी, जल, जंगल, ज़मीन और अर्थव्यवस्था या जीडीपी सब हमारे अपने हैं, सगे हैं। लेकिन बारह साल से प्रधानमंत्री के पद पर बैठे नरेंद्र मोदी का इनमें से कोई भी सगा नहीं। यहां तक कि न वे अपने परिवार के हैं और न ही उनका परिवार उन्हें सगा मानता है। 76 साल की उम्र में भी उनकी वासना केवल अपनी अय्याशी और अपनों के साम्राज्य को बढ़ाते जाना है। इसके लिए उन्हें देश की अक्षुण्ण सत्ता चाहिए, जिसके लिए वे किसी भी हद तक गिरने को तैयार हैं। यही उनकी राजनीति में घुसी क्षुद्रता का मूल स्रोत है। बाकी तो संघ का हिंदू राष्ट्र और हिंदुत्व भी उनके लिए महज मुखौटा है। उनके अपनों में चंद कॉरपोरेट यारों के साथ वे सभी हैं जो भारत के जनधन व राष्ट्रीय सम्पदा को लूटने की नीयत, हसरत और लिप्सा रखते हैं। कहा जाता हैं कि वे कॉरपोरेट क्षेत्र के सेवादार और उसके पाले-पोसे पठ्ठे हैं। लेकिन यह पूरा सच नही। ऐसा होता तो उनके राज में तमाम भारतीय कंपनियां देश छोड़कर बाहर निवेश क्यों करतीं? दरअसल उनकी क्षुद्र राजनीति और येनकेन प्रकारेण ‘मित्रों’ का ही भला करने की फितरत ने व्यापक कॉरपोरेट क्षेत्र को उनकी सरकार के प्रति शंकालु बना दिया है। कंपनियां डरती हैं कि उसकी पूंजी से बने उद्यम को मोदी का कोई यार झटक न ले जाए…
मोदी सरकार कैसे देश के लोकतंत्र और संघीय ढांचे को तोड़कर अपने यारों का हित साधने में लगी है, इसका ताज़ातरीन उदाहरण है 13 अगस्त को खत्म संसद के मानसून सत्र में पास करा लिया गया खान व खनिज (विकास व विनियमन) संशोधन या एमएमडीआर एक्ट 2026, जो 22 अगस्त से लागू भी हो गया। यह उन 11 विधेयकों में से एक है जिन्हें बिना किसी बहस के पास कराया गया है। संसद को धता बताकर बिल पास करवाना मोदी सरकार की फितरत है। नए एक्ट के जरिए खनिज संपदा पर राज्यों की रॉयल्टी व कराधान की शक्ति सीमित कर दी गई है। अब केंद्र सरकार बड़े बिजनेस हाउसों को पुरानी ही नहीं, नई खदानें भी मनमर्जी से दे सकती है और इस प्रक्रिया से राज्य सरकारों को बाहर कर दिया गया है। साथ ही केंद्र सरकार खदानें लेनेवाले बिजनेस हाउसों को परोक्ष सब्सिडी भी देगी। जाहिर है कि यह देश की आर्थिक शक्तियों को केंद्रित करने की राजनीति है और इसका मकसद अदाणी जैसे चंद समूहों का ही भला करना है।
मोदी सरकार 2014 में सत्ता संभालने के बाद इसी तरह राजनीतिक व आर्थिक सत्ता को केंद्रित करती जा रही है। इससे राज्य सरकारों की शक्तियां सीमित होती गई हैं। नतीजतन केंद्र सरकार की चहेती मुठ्ठी भर कंपनियों के हाथों में बाज़ार सिमट रहा है। सरकार ऐसी कंपनियों को राष्ट्रीय चैम्पियन बताकर शह दे रही है। सरकारी समर्थन और माकूल नीतियों के बल पर ऐसी कंपनियों की पकड़ देश की अर्थव्यवस्था पर पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो गई है। यह हालत देखकर बड़ा कॉरपोरेट क्षेत्र भी निवेश करने और सरकारी संरक्षण में पल रहे समूहों से होड़ लेने से कतरा रहा है। मुंबई के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को बनाकर तैयार करनेवाला आंध्र प्रदेश का जीवीके ग्रुप कोई छोटा समूह नहीं था। लेकिन सीबीआई और ईडी के छापे डलवाकर अंततः जीवीके ग्रुप को हवाई अड्डा अदाणी समूह को बेचने पर मजबूर कर दिया गया।
भाजपा, एनडीए व मोदी के हाथों में राजनीतिक सत्ता के केंद्रित होने और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की ताकत घटने से छोटी व क्षेत्रीय कंपनियों को मिलनेवाला संरक्षण मिटता जा रहा है। इससे ऐसी कंपनियों के उभरते-उभरते राष्ट्रीय बन जाने की संभावना छीज गई है। दूसरे, केंद्र सरकार की नीतियों में अनिश्चितता है। तमाम उद्योगों में घुसने की शर्तें कड़ी कर दी गई हैं। साथ ही सरकार अपने खासमखास बड़े समूहों को हर हाल में जिताती है। याद करें कि कैसे वेदांता की ज्यादा बोली के बावजूद जे.पी. एसोसिएट्स को अदाणी ग्रुप के हवाले कर दिया गया, जबकि अनिल अग्रवाल का वेंदाता समूह दशकों से भाजपा को सबसे ज्यादा चंदा देता रहा है। कंपनियां डरती हैं कि सरकार कब किसके दबाव में नीतियां बदल दें और उन्हें तगड़ी चपत लग जाए। कंपनियों की निगाह में सरकार की नीतियों की विश्वसनीयता खत्म हो गई है। तीसरे, कंपनियों को भय है कि सरकार के दुलारे राष्ट्रीय चैम्पियन कहे जानेवाली कॉरपोरेट समूह कभी भी उन्हें निगल सकते हैं। नए उद्यमी तो ज्यादा ही भयभीत हैं। अंबानी ने राघव बहल के बनाए टीवी-18 को कैसे हजम कर लिया और अदाणी ने प्रणय रॉय के एनडीटीवी को कैसे निगल लिया, यह भारत के उद्यमी कभी भूल नहीं सकते।
सरकार की क्षुद्र राजनीति, संकीर्ण स्वार्थ और धृतराष्ट्री रवैये ने आज देश में जो रिस्क पैदा कर दिया है, उसके चलते देशी व विदेशी, दोनों ही तरह के निवेशक बड़ा निवेश करने से भाग रहे हैं। मुश्किल यह नहीं कि उन्हें अभी काम करने का मौका मिलेगा या नहीं, बल्कि यह है कि उन्हें यकीन नहीं, आत्मविश्वास नहीं कि अगले दस-बीस साल तक वे बिजनेस करते हुए होड़ में टिके रह पाएंगे या नहीं। इस यकीन के बिना कोई उद्यमी अपनी पूंजी लगाने या कहें तो डुबाना का रिस्क नहीं लेता। माहौल को दुरुस्त करने का एक ही तरीका हो सकता है कि देश में सत्ता के केंद्रीकरण को हर हाल में रोका जाए, क्षेत्रीय राजनीतिक शक्तियों को पनपने दिया जाए और नई राजनीतिक शक्तियों के उभार की हर संभावना के दरवाज़े खुले रखे जाएं।
साथ ही देश में राष्ट्रीय चैम्पियन कंपनियों को प्रश्रय देने की नीतियों को मिटाकर आर्थिक प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया जाए। आर्थिक प्रतिस्पर्धा बढ़ने से राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भी बढ़ेगी। लेकिन मोदी सरकार ऐसा कतई होने नहीं देना चाहती। इसलिए सरकार के मुखिया के रूप में नरेंद्र मोदी बराबर भौकाल बनाए रखते हैं। अंदर से लेकर बाहर तक, हर मोर्चे पर देश की अर्थव्यवस्था की मिट्टी पलीद करने के बावजूद वे सेमी कंडक्टर, एआई, न्यूक्लियर रिफॉर्म, मैन्यूफैक्चरिंग, डिफेंस निर्यात, स्टार्ट-अप, मेक-इन इंडिया, आत्मनिर्भर भारत, लखपति दीदियों और 25 करोड़ लोगों को गरीबी से मुक्त करने जैसे झूठ का ढिंढोरा पीटे जा रहे हैं। लेकिन यह उनके दिखाने के दांत हैं, चबाने के दांत अब भी 146 करोड़ देशवासियों की नज़रों से ओझल हैं।
मोदी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि देश से कालाधन खत्म हुआ या नहीं, हर देशवासी के खाते में 15 लाख रुपए आए या नहीं, 2 अक्टूबर 2019 तक महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर भारत स्वच्छ हुआ या नहीं, किसानों की आय 2022 तक दोगुनी हुई या नहीं, हर साल दो करोड़ रोज़गार बने या नहीं, 2025 तक देश की अर्थव्यवस्था 5 ट्रिलियन डॉलर की हुई या नही और 2047 तक भारत विकसित देश बनेगा या नहीं। यह सब तो मोदी के चोंचले हैं, उनका छल-प्रपंच है। मोदी को केवल अपनी अय्याशी जारी रखने और राष्ट्रीय संसाधनों से अपनों का साम्राज्य बढ़ाने से मतलब है। उन्हें तब ज़रूर फर्क पड़ता है जब अमेरिका में अदाणी के खिलाफ केस चलता है और उसे सज़ा हो सकती है। इसे बचाने लिए मोदी भारत की संप्रभुता, आत्मसम्मान और आर्थिक हितों तक की कुर्बानी देते रहे हैं और आगे भी देते रहेंगे। कई बार तो लगता है कि कहीं मधु किश्वर का यह आरोप सही तो नहीं कि मोदी भारत में सीआईए के एजेंट बनकर काम कर रहे हैं और उन्हें बाकायदा इसकी ट्रेनिंग दी गई है।
मोदी असल में 2001 में जब से गुजरात के मुख्यमंत्री बने हैं, तभी से काम करने नहीं, श्रेय लेने की राजनीति कर रहे हैं। तेरह साल तक उन्होंने गुजरातियों की उद्यमशीलता का श्रेय लिया और गुजराती अस्मिता को भुनाते रहे। बाकी क्या किया, इसका सबूत गुजरात के सरकारी स्कूलों की हालत और स्वास्थ्य व्यवस्था दे देती है। 2014 में देश के प्रधानमंत्री बनने पर भी वे श्रेय लेने की राजनीति करते रहे। जवानों के साथ दीवाली मनाने, विदेश यात्राओं पर बड़े नेताओं के गले पड़ने और युद्ध रुकवा देने के दावों के पीछे उनकी यही राजनीति है। याद है कि अयोध्या में राम मंदिर बनने के बाद कैसे पोस्टर जारी करवा दिए कि रामलला मोदी की उंगली पकड़कर मंदिर पहुंच रहे हैं। यहीं नहीं, जी-20 और बसुधैव कुटुम्बकम की डुगडुगी वे अभी तक बजाए जा रहे हैं। वे दस साल में करीब सरकारी 94,000 स्कूल बंद करवा देते हैं। मगर लालकिले से छात्रों को फ्री कोचिंग देने का ऐलान भी कर देते हैं। यह कोचिंग ऑनलाइन होगी, जिस मॉडल की पहले से ही इंटरनेट पर भरमार है तो लगे हाथ मोदी सरकार भी बहती गंगा में हाथ धो लेगी।
यही मोदी महान की क्षुद्रता है कि वे करते-धरते कुछ नहीं, बहती गंगा में हाथ धोते रहते हैं। जहां बोलकर गए और जीते कि मां गंगा ने बुलाया, उस बनारस शहर को क्योटो बनाना था और जून 2014 से शुरू नमामि गंगे परियोजना के तहत 20,000 करोड रुपए डालकर 2020 तक गंगा को एकदम निर्मल कर देना था। क्योटो बनना तो दूर, काशी की प्राचीन पहचान अब खाक बन चुकी है, जबकि बजट से अब तक मिले 32,612 करोड़ रुपए (चालू वित्त वर्ष 2026-27 का 3100 करोड़ रुपए का बजट आवंटन शामिल) के बावजूद गंगा का पानी अभी तक बिना ट्रीट किए पिया नहीं जा सकता। अगर मोदी सरकार ने इस परियोजना में गंगा के किनारे बसे निषाद, केवट, मल्लाह व बिंद जैसे समुदायों के लाखों परिवार को शामिल कर लिया होता तो गंगा कब की निर्मल हो चुकी होती और इन समुदायों का पारम्पिक जीवन भी खुशहाल रहता। लेकिन मोदी को गंगा के साफ न होने का कतई मलाल नहीं। उन्हें इसका भी मलाल नहीं कि देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के बिजनेस सेंटर बांद्रा कुरला कॉम्प्लेस को घेरकर बहती मीठी नहीं मोदीराज के बारह साल बाद भी बजबजा रही है। अगर मोदी को ज़रा-सा भी देश में विदेशी पूंजी लाने की चिंता होती तो वे चुटकी बजाकर मीठी नदी को साफ करवा सकते थे। आज तो किसी विदेशी निवेशक ने अगर एक बार भी बांद्रा कुरला कॉम्प्लेक्स के इर्दगिर्द घूमकर मीठी नदी की बदबू फेंफड़ों में भर ली तो दुबारा भारत में फैक्टरी लगाने की सोचेगा भी नहीं। हां, मोदी जी ने ज़रूर अहमदाबाद में गिफ्ट सिटी बनाकर नोट से नोट बनाकर अंतरराष्ट्रीय धंधा करने का सरंजाम कर दिया है। इससे मोदी की नीयत स्पष्ट हो जाती है कि वे काम नहीं करना चाहते, जो अपने-आप हो जाए, उसका श्रेय लेना जानते हैं और केवल झांकी व हवाबाज़ी बनाना चाहते हैं।
लेकिन भारत जैसे विशाल देश की समस्याएं इतनी बड़ी हैं कि वे अपने-आप नहीं हल हो सकतीं और सत्ताशीर्ष पर बैठा व्यक्ति केवल श्रेय लेकर और झांकी बनाकर नेतृत्व नहीं कर सकता। इसलिए बारह साल बीतने पर रंगे-सियार की पोल खुलती जा रही है और वो अचानक हुआं-हुआं करने लगा है। खास बात यह है कि यह रंगा-सियार अकेला नहीं, बल्कि पूरा चढ्ढी गैंग साथ लेकर चल रहा है। गैंग का सरगना होने के नाते उसे हर शिकार और लूट का पता है। लेकिन वो इतना शातिर व चीमड़ है कि ऐसे शिकार और लूट का खुलासा हो जाने के बाद मुंह तक नहीं खोलता। मणिपुर को जातीय विभाजन की आग में जलाने के बाद अरसे तक उसके मुंह नहीं खोला। अंततः संसद में बोला भी तो अनाप-शनाप बकवास। राम मंदिर में करोड़ों की चढ़ावा चोरी का खुलासा हुए तीन महीने होने जा रहे हैं। इस पर अभी तक उनके मुंह से एक शब्द नहीं निकला है। उनके प्रधान सचिव रहे नृपेन्द्र मिश्रा शुरू से ही मंदिर निर्माण के सर्वसर्वा हैं और राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव रहे चम्पत राय जिन्हें विष्णु का अवतार कहते रहे हैं, उस विष्णु को चढ़ावा चोरी का पता न हो, ऐसा हो नहीं सकता। राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा इन्हीं मोदी जी ने की थी। जाहिर है कि संघ और सरकार के हर पाप में उनकी गहरी भागीदारी और संलिप्तता रही है।
मोदी को यकीन था कि सात रेसकोर्स रोड का नाम बदलकर सात लोक कल्याण मार्ग कर लेंगे तो भारत की गऊ जनता उनके प्रधानमंत्री आवास को कल्याण का केंद्र मान लेगी और प्रधानमंत्री कार्यालय का नाम सेवातीर्थ कर लेंगे तो करोड़ों सनातनी हिंदू उनकी आरती उतारने लगेंगे। लेकिन अरबों की चढावा चोरी में लिप्त श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के साथ मोदी के सेवातीर्थ के अभिन्न रिश्तों के उजागर होते ही सब फच्चर हो गया। आस्था का भ्रम टूट चुका है। अब जीडीपी के बढ़ने की झांकी बनाए रखना मोदी का अंतिम साधन है। मगर, यहां भी पलीता साफ लगता दिख रहा है। वैसे भी मोदी और उनकी सरकार के लिए जीडीपी भी महज दिखाने का दांत और शुद्ध छलावा ही रहा है। उन्हें न तो अर्थव्यवस्था की समझ है और न ही भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की उनकी कोई नीयत है।
आज (31 अगस्त 2026) ही चालू वित्त वर्ष 2026-27 की जून या पहली तिमाही के जीडीपी का डेटा आया है। इसमें जीडीपी की पहली तिमाही की नॉमिनल विकास दर 10.3% रही है। लेकिन मुद्रास्फीति के असर को खत्म करने के लिए 2.5% डिफ्लेटर घटाने के बाद इसकी रीयल विकास दर 7.8% निकलती है। सरकार दंभ से कह रही है कि ईरान के खिलाफ अमेरिका व इज़रायल के युद्ध से उपजे विषम हालात के बावजूद भारत ने विकास की गति बनाए ही नहीं रखी, बल्कि बढ़ा दी है। वो दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था बनी हुई है। पूरे चालू वित्त वर्ष 2026-27 में जीडीपी की नॉमिनल विकास दर 10% से 11% और रीयल विकास दर के 6.4% से 6.8% रहने का अनुमान है। इससे पहले वित्त वर्ष 2022-23 को आधार वर्ष मान लेने के बाद तीन सालों – 2023-24, 2024-25 और 2025-26 में जीडीपी की अद्यतन नॉमिनल विकास दर क्रमशः 11.1%, 9.4% और 8.6% रही है, जबकि इस दौरान जीडीपी की रीयल विकास दर क्रमशः 7.3%, 7.2% और 7.8% रही है। लगातार 7% से ऊपर। लेकिन क्या कम से कम इतनी विकास दर आगे बनाए रखी जा सकती है? क्या डॉलर के सामने कमज़ोर होता रुपया कभी संभल पाएगा या कमज़ोर रुपए का सहारा पाकर भारत का निर्यात बम-बम करने लगेगा? देश के विदेशी मुद्रा भंडार का क्या होगा? मुद्रास्फीति का क्या होगा क्योंकि सुपर अल-निनो सिर चढ़कर बैठा है? ऊपर से बड़ा सवाल कि क्या मोदी सरकार के रहते देश में कॉरपोरेट निवेश बढ़ सकता है?
देश में अभी कॉरपोरेट निवेश बढ़ने के तमाम आर्थिक कारक मौजूद हैं। रुपए की वास्तविक प्रभावी विनिमय दर (आरईईआर) दुनिया की 40 प्रमुख मुद्राओं के सापेक्ष अभी 91.26 रुपए है। यह अगर 100 होता तो रुपया अपने सही मूल्य पर होता। मतलब रुपए का मूल्य करीब 9% कम चल रहा है तो इसका फायदा निर्यात बढ़ाने में मिल सकता है। वास्तविक मजदूरी दबी हुई चल रही है। सरकार की तरफ से लगातार इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश किया जा रहा है। भारत के पास अब भी जबरदस्त डेमोग्राफिक डिविडेंड है। ऐसी ही चीजों ने मिलकर चीन और दक्षिण कोरिया की कामयाबी की कहानी लिखी थी। लेकिन इतना सब कुछ होने के बावजूद भारत की विकासगाथा कमज़ोर पकड़ती जा रही है। सरकारी पूंजी निवेश से झांकी बनती और भ्रष्टाचार का भूमिगत धंधा फलता-फूलता है। निजी निवेश के बिना विकासगाथा को अंज़ाम पर नहीं पहुंचाया जा सकता। निजी क्षेत्र निवेश तब करता है जब उसे लगता है कि प्रतिस्पर्धी में उतरने पर लाभ होने की वाजिब गुंजाइश है। लेकिन क्षुद्र राजनीति ने प्रतिस्पर्धा खत्म कर दी हो और सरकारी संरक्षण सिर चढकर बोल रहा हो, तब देशी-विदेशी पूंजी को बाहर भागने से कोई नहीं रोक सकता।
