शेयर बाज़ार में धन का प्रवाह बढ़ता है तो सूचकांक से लेकर अलग-अलग स्टॉक्स तक बढ़ने लगते हैं। धन का प्रवाह सूखते ही सारी तेज़ी हवा हो जाती है। सितंबर 2024 के बाद विदेशी पोर्टफलियो निवेशकों (एफपीआई) के निकलने जाने से हमारे शेयर बाज़ार की यही दशा-दिशा चल रही है। एफपीआई झूमकर लौटे नहीं तो अपना शेयर बाज़ार एक कदम आगे, दो कदम पीछे चलता रहेगा। ऐसा नहीं कि विदेशी निवेशक भारत से चिढ़कर भाग रहे हैं।औरऔर भी

भारत में शायद ही कोई ऐसा घर होगा जहां कभी न कभी किसी रिश्तेदार, दोस्त या यूट्यूब गुरु ने यह दावा न किया हो कि यह स्टॉक पांच गुना जाएगा, यह अगला मल्टीबैगर है, अभी खरीद लो, वरना ज़िंदगी भर पछताओगे। इन दावों में इतना आत्मविश्वास होता है कि सुनने वाला खुद को अगले कुछ वर्षों में करोड़पति के रूप में देखने लगता है। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि ऐसे सपने सबसे ज़्यादा वही लोगऔरऔर भी

देश के कम से कम 12.1 करोड़ युवा निठल्ले बैठे हैं। 81.35 करोड़ लोग हर महीने सरकार से मिलनेवाले पांच किलो मुफ्त राशन के मोहताज़ हैं। 9.45 करोड़ स्वाभिमानी किसानों की कमर ऐसी टूटी है कि सरकार से साल भर में 6000 रुपल्ली की सम्मान-निधि पाकर लाभार्थी बन गए। वित्त मंत्री सीतारमण विदेश जाकर भारतीय मध्यवर्ग को बेच रही हैं। कुछ दिन पहले फ्रांस में उन्होंने बताया कि भारतीय मध्यवर्ग 1995 से औसतन हर साल 6.3% बढ़औरऔर भी

देश में इस वक्त 12.1 करोड़ युवा ऐसे हैं जो न तो पढ़ रहे हैं और न ही किसी रोज़गार या ट्रेनिंग में लगे हैं। 2012 से 2024 तक युवा बेरोजगारों की संख्या तीन गुनी हो गई। जो आज तक दुनिया की किसी भी विकासशील अर्थव्यवस्था में नहीं हुआ, वो भारत में हो चुका है। यहां 2020 से 2024 के बीच उद्योग-धधों से निकलकर आठ करोड़ मजदूर वापस खेती-किसानी में लौट गए। भारत की यह दारुण हकीकतऔरऔर भी

मोदी सरकार एक तरफ स्वदेशी, आत्मनिर्भर भारत और मेक-इन इंडिया का राग अलाप रही है, दूसरी तरफ स्थिति यह है कि देश का 30.8% औद्योगिक माल चीन से बनकर आ रहा है। वित्त मंत्रालय ने कई साल से सीमावर्ती देशों की कंपनियों पर हमारे सरकारी टेंडरों में भाग लेने पर बंदिशें लगा रखी हैं। लेकिन अचानक 24 जून को मंत्रालय ने आदेश जारी करके भारत में फैक्ट्रियां चला रही चीन की चार कंपनियों को ऐसी बंदिशों सेऔरऔर भी

इसे देश की आर्थिक आपदा कहें या अर्थव्यवस्था में बढ़ रहा असंतुलन। इसका मूल आधार है मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र का ठहराव और जीडीपी में उसके योगदान का घटते जाना। विश्व बैंक के डेटा के मुताबिक 2015 में हमारे जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग का हिस्सा 16% हुआ करता था। यह 2025 तक घटकर 13% रह गया है। इसी दौरान इंडोनेशिया के जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग का हिस्सा बढ़कर 19%, मलयेशिया में 23% और वियतनाम में 24% हो गया। बता दें किऔरऔर भी

रुपए का गिरना, रोज़गार का घटना, भ्रष्टाचार का बढ़ना, अमीरों का और ज्यादा अमीर और गरीबों का और ज्यादा गरीब होते जाना। यह सारा कुछ हमारी अर्थव्यवस्था में पनपते भयंकर असंतुलन के लक्षण हैं। फिर भी अर्थव्यवस्था की बीमारी अभी असाध्य नहीं हुई है। इस बीमारी के स्वरूप को ऊपरी तौर पर तीन विकासक्रमों से समझा जा सकता है। एक, महंगे फोन और कंप्यूटर बेचनेवाली कंपनी एप्पल इंडिया की आय रोजमर्रा के आम उपभोक्ता सामान बेचनेवाली देशऔरऔर भी

पश्चिम एशिया के संकट से उपजी अनिश्चितता काफी हद तक खत्म हो चुकी है। प्रति बैरल कच्चे तेल के दाम 100 डॉलर के पार जाने के बाद 70 डॉलर के आसपास डोल रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दावा कर रहे हैं कि उन्होंने सदी के सबसे बड़े संकट को रणनीतिक फैसलों और राजनय से निपटा दिया। लेकिन क्या भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सब कुछ सामान्य हो गया है? क्या हमारा शेयर बाज़ार उसी तरह बम-बम करेगा, जैसाऔरऔर भी

सरकारी दावों और मंत्रियों-सलाहकारों के मंत्रों से इतर देश में रोज़गार की असल स्थिति क्या है? लगभग 2.80 करोड़ बेरोज़गार शिक्षित युवा नौकरियों की तलाश में लगे हैं, जबकि करीब 10 करोड़ लोगों ने थककर नौकरी की तलाश ही बंद कर दी है जिसमें से ज्यादातर महिलाएं हैं। रोज़गार पर विश्वसनीय डेटा देनेवाली इकलौती निजी संस्था सीएमआईई के मुताबिक भारत में मार्च 2017 के अंत तक 15 साल से 64 साल की कामकाज़ी उम्र के 42.7% लोगोंऔरऔर भी

मोदी सरकार रोज़गार देने के नाम पर कैसा छल कर रही है, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है प्रधानमंत्री विकसित भारत रोज़गार योजना। 19 जून को बड़े-बड़े विज्ञापन निकाले गए कि शाम 5 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 15 लाख लाभार्थियों को रोज़गार देते हुए ₹2400 करोड़ रुपए की प्रोत्साहन राशि वितरित करेंगे। इस बाबत आयोजित भव्य समारोह में मोदी ने खुद भाषण दिया कि 1 अगस्त 2025 से शुरू इस योजना के समर्थन से अब तक करीब 70 लाखऔरऔर भी