मोदी सरकार ने सत्ता संभालने के पहले कार्यकाल के पहले साल वित्त वर्ष 2014-15 में फर्टिलाइज़र सब्सिडी पर ₹70,967.31 करोड़ खर्च किए थे। अपने दूसरे कार्यकाल के पहले साल वित्त वर्ष 2019-20 में इस मद पर उसने वास्तव में ₹81,124 करोड़ खर्च किए। पर अगले वित्त वर्ष 2020-21 उसने फर्टिलाइज़र सब्सिडी का बजट आवंटन घटाकर ₹71,309 करोड़ कर दिया। तभी मार्च 2020 में कोरोना की महामारी आ गई तो पूरे वित्त वर्ष 2020-21 में उसे बजट अनुमानऔरऔर भी

लोकसभा चुनाव में अभी तीन महीने बचे हैं। लेकिन महीने भर पहले 22 जनवरी को अयोध्या में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा के साथ ही मोदी सरकार का प्रचार अभियान शुरू हो चुका है। इन दिनों अखबारों के पहले पेज़ पर सबसे ऊपर पूरे आठ कॉलम में ‘मोदी सरकार की गारंटी’ छापी जा रही है। एकदम एकतरफा। कहीं इसकी कोई काट नहीं। लेकिन खुद मोदी सरकार के अपने ही आंकड़े इस गांरटी के झूठ का पर्दाफाश करने के लिएऔरऔर भी

खास लोगों की बात अलग है। सांसद-विधायक एक बार में इतना कमा लेते हैं कि सात पुश्तों का इंतज़ाम। ऊपर से ताजिंदगी भरपूर पेंशन। सरकारी कर्मचारियों को बराबर महंगाई भत्ता। लेकिन हमारे-आप जैसे आम आदमी की कमाई कभी महंगाई के हिसाब से नहीं बढ़ती। बीस साल में देशी घी ₹150 से ₹600 किलो और 10 ग्राम सोना ₹6000 से ₹60,000 का हो गया। लेकिन हमारी कमाई भी क्या इसी रफ्तार से बढ़ी? जो खा-पी लिया, पहन-ओढ़ लिया,औरऔर भी

ताज़ा खबर यह है कि चीन भारत की सीमा पर पिछले पांच सालों से जो 628 गांव बना रहा था, उनमें उसने अपने लोगों को बसाना शुरू कर दिया। इससे पहले वो जून 2020 में लद्दाख की गलवान घाटी में हमारी लगभग 800 वर्ग किलोमीटर ज़मीन पर कब्ज़ा कर चुका है। लेकिन एक सच्चाई जो कभी खबर नहीं बनी, वो यह है कि आत्मनिर्भर भारत और ‘मेक-इन इंडिया’ के नारों के बीच औद्योगिक इनपुट के लिए चीनऔरऔर भी

देश में आर्थिक विकास की उलटबांसी चल रही है। खुद सरकार के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2017-18 में कृषि में हमारी 44.1% श्रमशक्ति को रोजगार मिला हुआ था और मैन्यूफैक्चरिंग में 12.1% को। वित्त वर्ष 2021-22 तक विकास की ऐसी कर्मनाशा बही कि कृषि में लगी श्रमशक्ति बढ़कर 45.5% और मैन्यूफैक्चरिंग में घटकर 11.6% हो गई। श्रमशक्ति से बाहर निकलकर देखें तो देश की 60-70% आबादी अब भी किसी न किसी रूप में कृषि पर निर्भरऔरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंतरिम बजट को समावेशी व इनोवेटिव बताया है। मगर यह न तो समोवेशी है और न ही इनोवेटिव। जिस विकास में रोज़गार ही नहीं बन रहा, वो समावेशी कैसे हो सकता है? खुद सरकार के आवधिक श्रम शक्ति सर्वेक्षण (पीएलएफएस) के अनुसार देश में नियमित वेतन वाला रोज़गार पांच साल से ठहरा हुआ है। अधिकांश रोजगार जो बना है, वो अवैतनिक पारिवारिक श्रम या प्रछन्न बेरोज़गारी है। कृषि में वास्तविक मजदूरी घटी है।औरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर उनके तमाम मंत्री-संत्री दावा कर रहे हैं कि 2014 से पहले भारत दुनिया की उन पांच नाजुक अर्थव्यवस्थाओं में गिना जा रहा था जो विकास की फंडिंग के लिए अविश्सनीय विदेशी निवेश पर निर्भर थे। लेकिन साथ ही उनका दावा है कि 2014 से 2023 के बीच देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) दोगुना होकर 596 अरब डॉलर रहा है। इतना नकलीपना क्यों? पहले जो विदेशी निवेश कमज़ोरी की निशानी था, वहीऔरऔर भी

बजट की झांकी निकल गई। अब आम चुनावों की रैलियां निकलने लगी हैं। प्रधानमंत्री कहते हैं कि अयोध्या में राम मंदिर बनने से पीढ़ियों का इंतज़ार खत्म हुआ। उन्होंने 17वीं लोकसभा का अंतिम सत्र राम के नाम कर दिया। दरअसल, राम को घोड़ा बनाकर भाजपा चुनावों का अश्वमेध यज्ञ पूरा करना चाहती है। लेकिन उसे भरोसा नहीं कि राम का सिक्का कितना चल पाएगा। इसीलिए 2004 से 2014 तक कांग्रेस के राज में अर्थव्यवस्था के हाल परऔरऔर भी

इस समय अपनी अर्थव्यवस्था ही नहीं, शेयर बाज़ार तक का हाल विचित्र है। अर्थव्यवस्था में 17% का योगदान करनेवाली केंद्र व राज्य सरकारों का हाल दुरुस्त है। मगर, बाकी 83% योगदान करनेवाले छोटे-बड़े उद्योगों व आम घरों का हाल पस्त है। शेयर बाज़ार में उन कंपनियों के शेयर चमकते ही जा रहे हैं, जिनका धंधा सरकारी खपत पर टिका है। आईआरबी इंफ्रा जैसी कंपनी का शेयर साल भऱ तीन गुना हो चुका है। भारत इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकरऔरऔर भी

सरकार पिछले कई सालों से अपने बूस्टर डोज़ से अर्थव्यवस्था से चलाए जा रही है, जबकि उद्योग, कॉरपोरेट और हाउसहोल्ड या आम लोगों की खपत व निवेश में ठंडक दिखाई दे रही है। हकीकत यह है कि अर्थव्यवस्था में उद्योग के निवेश और आम लोगों की खपत का योगदान 83% है। वहीं, केंद्र व राज्य सरकारों का योगदान बमुश्किल 17% है। ऐसे में पूंजीगत व्यय और इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च का कितना भी हल्ला सरकार मचा ले, वोऔरऔर भी