बांस फट चुका है या फाड़ा जा चुका है। फिर भी फटा बांस बजने से बाज़ नहीं आ रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगातार चौथी बार लालकिले की प्राचीर से 2047 तक भारत को विकसित बनाने की बात कही। हालांकि बताया नहीं कि इस दिशा में अब तक क्या किया है। इतना ज़रूर कहा कि, “विकसित भारत का सबसे बड़ा लाभार्थी मेरे देश का युवा है और इसलिए हमें विकसित भारत के लक्ष्य को युवाओं के साथ जोड़कर आगे बढ़ाना है। युवा हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता हैं।” दिक्कत यह है कि प्राथमिकता बताकर जिस तरह मोदी सरकार ने 81.35 करोड़ गरीबों को महीने का पांच किलो मुफ्त राशन और 11 करोड़ किसानों को साल में 6000 रुपए देकर लाभार्थी बना दिया, उसी तरह वो करोड़ों युवाओं को लाभार्थी बनाकर पंगु बना देना चाहती है। देश में इन युवाओं की गिनती कितनी हो सकती है, सरकार नहीं बताती। मगर, इतना ज़रूर पता है कि आज की तारीख में देश में कम से कम 12.1 करोड़ युवा ऐसे हैं जो न तो पढ़ रहे हैं, न किसी रोज़गार या ट्रेनिंग में लगे हैं। कांवड़ यात्रा निकालकर ऐसे ही युवा नशे में हुड़दंग व गाली-गलौज करते हैं। लेकिन सरकारी तंत्र इन पर पुष्प-वर्षा करता है और पुलिस इन्हें संरक्षण देती है। ऐसे युवा उत्तराखण्ड से लेकर बिहार, उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश तक भाजपा की हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण राजनीति का स्थाई साधन बने हुए हैं।
बाकी युवाओं की हालत क्या है? भारत जैसे दुनिया के सबसे युवा देश में, जहां की 65% आबादी की उम्र 35 साल से कम है, वहां इसका डेटा बड़ा पारदर्शी होना चाहिए था। लेकिन सरकार ने इसे समुद्री शैलाव की तरह ऐसा उलझा रखा है कि जितना हाथ-पैर मारेंगे, उतना ही फंसते चले जाएंगे। जैसे, 15 से 29 साल के युवाओं का डब्ल्यूपीआर (वर्कर्स पार्टिशिपेशन रेशियो) या आबादी में काम करनेवालों का अनुपात अप्रैल-जून 2026 की तिमाही में 34.3% था। मतलब इस आयुवर्ग के 65.7% लोग काम करने को तैयार या इसकी स्थिति में नहीं थे। फिर जो 34.3% डब्ल्यूपीआर में गिने गए, उसमें से 15.9% लोग बेरोज़गार थे। 34.3% का 15.9% गिनें तो 5.45% निकलता है। इसे डब्ल्यूपीआर के बाहर के 65.7% में जोड़ दें तो 15 से 29 साल के 71.15% युवा या तो काम करने की स्थिति में नहीं हैं या उन्हें काम नहीं मिल रहा। ऊपर से एक और डेटा एलएफपीआर (लेबर फोर्स पार्टिशिपेशन रेट) या श्रम बल भागीदारी दर का है। यह अप्रैल-जून 2026 में 40.7% है जिसमें 0.64% त्रुटि की गुंजाइश है। 17 अगस्त 2026 को जुलाई की सबसे नई आवधिक श्रमबल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) रिपोर्ट आई है। इसमें भी गोता लगाते जाइए। डेटा के शैवाल में उलझकर आपको कुछ नहीं मिलने जा रहा।
लेकिन देश के जिन करोड़ों युवाओं की समस्या को मोदी सरकार अब तक बराबर छिपाने में लगी थी, वे युवा अब खुद बहकर सड़कों पर निकल आए हैं। अब मोदी की हर अदा और झूठ का ऐसा जवाब मिल रहा है, जिसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। कहीं बच्चे सीधे डीएम के दफ्तर पहुंचकर सड़क ठीक करने की मांग कर रहे हैं तो कहीं स्कूल की लड़कियां शिक्षकों की नियुक्ति को लेकर ‘सीएम को बुलाओ’ का नारा लगाते हुए सड़कजाम कर रही हैं। नरेंद्र मोदी बारह साल से जिस 56 इंच के सीने की बात कर रहे थे, उसे इन युवाओं ने 24 सेकंड के वीडियो में 56 इंच का छोटा बंदर – बाल नरेंदर, बाल नरेंदर बना डाला। सोशल मीडिया पर सरकार जितना बंदिश लगाने की कोशिश कर रही है, युवाओं के बीच का आक्रोश उतना ही भड़कता जा रहा है। मोदी ने इस बार 15 अगस्त को लालकिले से दिमागी नक्सल का खतरा दिखाया तो अलग से एक दिगामी नक्सल जनता पार्टी बन गई। युवाओं के आक्रोश की झलक एक छोटी-सी पोस्ट से मिल जाती है कि, “अगर सवाल पूछना, असहमति रखना, अपनी पीड़ा बताना और अपने अधिकार के लिए कानून के रास्ते पर लड़ना ही दिमागी नक्सलवाद है तो शुरू कर लीजिए गितनी। दिमागी नक्सलियों को गिनते-गिनते सिस्टम थक जाएगा, गिनती खत्म नहीं होगी।”
सरकार की गिनती पर वैसे भी किसी को भरोसा नहीं। रोज़गार के आंकडों पर तो कतई नहीं। रोज़गार पर विश्वसनीय डेटा देनेवाली इकलौती निजी संस्था सीएमआईई के मुताबिक भारत में मार्च 2017 के अंत तक 15 साल से 64 साल की कामकाज़ी उम्र के 42.7% लोगों के पास नौकरी थी। यह मार्च 2026 के अंत तक 4% कटकर 38.7% पर आ गई है। लगभग 2.80 करोड़ बेरोज़गार शिक्षित युवा नौकरियों की तलाश में लगे हैं, जबकि करीब 10 करोड़ लोगों ने थक-हारकर नौकरी की तलाश ही बंद कर दी है। वहीं, जाने-माने अर्थशास्त्री सतोष मेहरोत्रा ने हैदराबाद विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर जजाति परिदा के साथ मिलकर लिखी नई किताब ‘इंडिया आउट ऑफ वर्क, रीथिंकिंग इंडियाज़ ग्रोथ स्टोरी’ में बताया है कि देश में 2012 से 2024 तक युवा बेरोजगारों की संख्या तीन गुनी हो गई है। यह भी कि जो आज तक दुनिया की किसी भी विकासशील अर्थव्यवस्था में नहीं हुआ, वो भारत में हो गया है। यहां 2020 से 2024 के बीच उद्योग-धधों से निकलकर आठ करोड़ मजदूर वापस खेती-किसानी में लौट गए।
संतोष मेहरोत्रा कहते हैं कि सरकारी अर्थशास्त्री चार साल में जिस आठ करोड़ रोज़गार के बढ़ने का दावा करते हैं, वो असल में उद्योग-धंधों या सेवा क्षेत्र में नहीं, बल्कि कृषि क्षेत्र में मजबूरी में मजदूरों के खपने का आंकड़ा है। यह भी कमाल की बात हैं कि गांवों में सर्वे में पूछे जाने पर जिन महिलाओं ने कहा कि वे घर का काम करती है, उन्हें बिना भुगतान की रोज़गार-याफ्ता महिलाओं में गिन लिया गया। यह अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के नियम का उल्लंघन है। आईएलओ ने साफ कह रखा है कि बिना किसी भुगतान वाले काम को काम ही माना जाएगा, लेकिन भारत सरकार ने बिना भुगतान वाले घर के काम को भी रोज़गार में गिन लिया है। फिर भी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2004-05 में जहां देश में समग्र रोज़गार की दर 42% थी, वहीं 2017-18 तक यह घटकर 35% पर आ गई। हालांकि उसके बाद बढ़कर 41% पर पहुंच गई। सरकार कहती है कि इस समय देश में 15 साल से ऊपर के 56.6 करोड़ लोग किसी न किसी किस्म के रोज़गार में हैं। इसमें से 40.2 करोड़ पुरुष और 16.4 करोड़ महिलाएं हैं।
लेकिन जहां 146 करोड़ की आबादी में कामकाजी उम्र (15 से 64 साल) के लोग 68% हों और बाकी 32% बच्चे या बूढ़े हों, वहां देश का कुल श्रमबल 99.28 करोड़ (146 करोड़ का 68%) निकलता है। जुलाई 2026 तक के नवीनतम डेटा के मुताबिक देश में श्रमबल भागीदारी 55.4% है तो काम खोज़ रहे लोगों की कुल संख्या 55 करोड़ (99.28 करोड़ का 55.4%) निकलती है। फिर भी सरकार इससे 1.6 करोड़ ज्यादा लोगों के रोज़ी-रोज़गार में लगे होने की बात करें तो इस पर आखिर कौन यकीन करेगा? सरकार का यह झूठ देश ही नहीं, दुनिया के सामने उजागर हो गया है। इसलिए सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद विदेशी निवेशकों के साथ ही देशी कंपनियां भी भारत छोड़कर भाग रही हैं। देश का युवा भी अपनी असहाय अवस्था से खलबला गया है तो उसकी पीड़ा आक्रोश बनकर फूट निकली है। देश के गृह मंत्री अमित शाह को लग रहा था कि जिस तरह कश्मीर के बच्चों व नौजवानों को पैलेट गन के छर्रों से चुप करा दिया, वैसे ही दिल्ली में संसद कूच में शामिल छात्रों-नौजवानों को शांत कर देगे। लेकिन आज वे संसद में जवाब देने से भागे-भागे फिर रहे हैं। युवा उनके पीछे पड़े हैं और उन्हें ललकार रहे हैं।
दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बनने से लेकर अब तक 25 सालों में बनाए गए तिलिस्म के टूटने से तिलमिला गए हैं और आंय-बांस-सांय बकने लगे हैं। इस बार 15 अगस्त को उन्हें कुछ नहीं सूझा तो कह पड़े कि, “बायोइकोनॉमी में देश की युवा शक्ति ने सामर्थ्य दिखाया। 2014 के पहले जो ₹60 हजार करोड़ का कारोबार था, आज वो बायोइकोनॉमी ₹20 लाख करोड़ पहुंच चुकी है।” बायोइकोनॉमी की हवाबाज़ी से इतर जब कुछ ठोस बताने की बात आई तो उनकी सप्तधारा बह निकली। उन्होंने कहा कि आने वाले 5-7 साल में, जो पिछले 5-7 दशक में नहीं हुआ, वो सप्तधारा के सामर्थ्य से हासिल कर लेंगे।
उनकी सप्तधारा की पहली शक्ति है – मैन्यूफैक्चरिंग पावर। दूसरी शक्ति है कृषि व फूड प्रोसेसिंग। तीसरी है टेक्नोलॉजी और इनोवेशन। चौथी है गति शक्ति या देश के अंदर कनेक्टिविटी और मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स की व्यवस्था। पांचवी शक्ति है रक्षा शक्ति। छठी शक्ति है ग्रीन इकोनॉमी, ब्लू इकोनामी। सप्तधारा की सातवी धारा है भारत की सॉफ्ट पावर। इसमें मोदी योग, आस्था, आयुर्वेद, हैंडीक्राफ्ट, संस्कृति और यहां तक कि बीलवुड की फिल्मों के साथ ही फिक्की फ्रेम्स द्वारा आयोजित वेव्स (वर्ल्ड ऑडियो विजुअल एंड एंटरनमेंट समिट) तक को गिना डालते हैं। मोदी भारत की सॉफ्ट पावर की बात तब कर रहे हैं, जब उनके बारह साल के राज में भारत के पासपोर्ट की रैंकिंग दुनिया के 199 देशों की सूची में 143वें नबंर पर पहुंच गई है। केवल 30 देश हमें वीसा-फ्री एंटी देते हैं, 40 देश पहुंचने पर वीसा दे सकते हैं, जबकि 128 देशों में जाने के लिए पहले से वीसा लेना ज़रूरी है। इस सूची में सबसे नीचे अफगानिस्तान है। मोदी अपनी तालिबानी सोच व नीतियों से भारत को उसी गर्त में पहुंचाने के लिए 18-18 घंटे काम कर रहे हैं।
उनकी बाकी छह धाराएं भी केवल शब्दों का आडम्बर और सब्ज़बाग है। देश को आप कैसे मैन्यूफैक्चरिंग पावर बना सकते हों जब उसे आपने चीन को आउटसोर्स कर दिया है और हमारा 33% औद्योगिक माल चीन से बनकर आ रहा है? कृषि व फूड प्रोसेसिंग में आप बारह साल से क्या रहे थे? कृषि व किसानों की हालत खराब है। जीपीपी में 13% योगदान कर रही कृषि पर देश की 46% श्रमशक्ति लदी पड़ी है। अब अमेरिकी व यूरोपीय कृषि व डेयरी उत्पाद भारत में बेरोकटोक लाकर कैसे यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है? तीसरी शक्ति के तहत टेक्नोलॉजी व इनोवेशन में आप क्या उखाड़ लोगे, जब सरकार आर एंड डी (शोध व अनुसंधान) पर जीडीपी का मात्र 0.64% खर्च कर रही है, जबकि अमेरिका में यह खर्च 3.48%, चीन में 2.43% और दक्षिण कोरिया में 4.91% के आसपास है। चौथी शक्ति कनेक्टिविटी व लॉजिस्टिक्स है। भारत में ब्यूरोक्रेसी की जकड़बंदी में लॉजिस्टिक्स की लागत जीडीपी की 13-16%, जबकि चीन में यह 8% के आसपास है। रक्षा शक्ति की स्थिति है कि युद्ध में फंसे यूक्रेन के बाद भारत अब भी दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश बना हुआ है, जिसमें जमकर कमीशनखोरी चलती है। बाकी ग्रीन इकोऩमी की छठी शक्ति का तो कहना ही क्या, जब छत्तीसगढ़ से लेकर बिहार व महाराष्ट्र तक दसियों हज़ार एकड़ ज़मीन लगभग मुफ्त में अदाणी और लॉयड जैसे समूहों को दी जा रही हैं?
असल में यह सारा सब्जबाग फैलाना ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यूएसपी (यूनीक सेलिंग प्वॉइंट) रहा है। अपना यूएसपी और तिलिस्म टूटते देख वे चुनावी लोकतंत्र पर कब्जा जमाने के लिए एसआईआर और परिसीमन का रास्ता अपनाना चाह रहे थे। लेकिन देश के युवाओं ने प्रतिरोध की ऐसी राह पकड़ी है कि जल्दी ही हर तरफ विरोध प्रदर्शनों की सुनामी आ सकती है। ऐसी सुनामी जो तिलिस्म के बचे-खुचे अवशेषों को भी उड़ाकर बहा ले जाएगी। हिंदुत्व का कवच भी अयोध्या में राममंदिर चढावा-चोरी के उजागर होने के बाद छिन्न-भिन्न हो रहा है। भाजपा का पैतृक संगठन आरएसएस भी हैरान-परेशान है। ऐसे में भाजपा की अंदरूनी खींचतान बढ़ने लगी है। भाजपा ने जिन्हें धनबल, बाहुबल और सत्ताबल के दम पर खरीदा था, वे भी अंदर ही अंदर कुलबुला और पछता रहे हैं। अवाम को छलने और वोट दिलाने में मोदी की सामर्थ्य छीझते ही सत्तामोह में डूबे सारे भाजपाई और एनडीए के नेता उनको झटकने में एक मिनट भी नहीं लगाएंगे।
ऐसे में मोदी मजबूर होकर विकसित भारत@2047 को फिर से ध्यान भटकाने का साधन बनाने में जुट गए हैं। इसी दिशा में उन्होंने लालकिले की प्राचीर से ललकारा, “12 साल के भीतर-भीतर हम मेजर इकोनॉमी में फास्टेस्ट ग्रोइंग इकोनॉमी बन गए हैं।” जेबकतरा पकड़ लिया जाए तो ऐसी ही अंग्रेज़ी झाड़ता है। वैसे भी जब सब रेंग रहे हों तो चलनेवाला भी सबसे तेज़ रफ्तार वाला बन जाता है। तथ्य यह है कि भारत की अर्थव्यवस्था 2003 से 2015 के बीच औसतन 7.8% सालाना की दर से बढ़ रही थी। यह विकास दर 2014 से 2024 के बीच घटकर 5.8% सालाना पर आ गई। ऐसा तब हुआ, जब इसी दरमियान मोदी ने 15 अगस्त 2022 को लालकिले की प्राचीर से पहली बार आज़ादी के सौ साल पूरा होने पर 2047 में विकसित भारत बनाने का नारा उछाला था।
हकीकत यह है कि भारत को 2047 तक विकसित देश बनाने के लिए देश की अर्थव्यवस्था को मुद्रास्फीति को घटाकर वास्तविक स्तर पर कम से कम 8% सालाना की दर बढ़ना होगा। 2014 से 2024 तक विकास दर इससे 2.2% कम रही है। भारत सरकार ने बताया है कि यह दर 2024-25 में 7.1% और 2025-26 में 7.7% रही है। लेकिन कोई भी अंतरराष्ट्रीय एजेंसी नहीं कह रही है कि भारत की अर्थव्यवस्था 2020 से 2030 के दौरान 6.7% सालाना से अधिक गति से बढ़ सकती है। मतलब, लक्ष्य से 1.3% कम। फिर 2030 से 2047 के बीच क्या भारत की अर्थव्यवस्था 14.6% की असंभव गति से बढ़ सकती है? मोदी जी, आखिर किसको और क्यों उल्लू बना रहे हो! तब तो देश के सामने जवाब देने के लिए आप इस दुनिया में रहेंगे नहीं। रहे भी जवाब नहीं देंगे। आपने नोटबंदी के दौरान 50 दिन में काम न पूरा होने पर देश से चौराहे पर सजा भुगतने का वादा किया गया था। लेकिन आप तो बांके उस्ताद ठहरे। देश अभी तक कहता फिर रहा है – वादा तेरा वादा, वादे पे तेरे मारा गया, बंदा ये सीधा-साधा।
इस बीच सबसे बड़ी त्रासदी देश के सामने यह आनेवाली है कि जिसे हमें भारत का डेमोग्राफिक डिविडेंड कहे जा रहे थे, वो 2047 से करीब सात साल पहले 2040 में ही खत्म हो सकता है। तब आबादी में कामकाज़ी उम्र (15 से 64 साल) के लोगों की संख्या आश्रित या निर्भर लोगों (15 साल से कम और 64 साल से अधिक) से कम होने लगेगी। इसलिए हमारे पास केवल 14 साल ही बचे हैं भारत में 1980 के दशक से ही चले आ रहे डेमोग्राफिक डिविडेंड को फलीभूत करने के लिए। ऐसे में नौजवान पीढ़ी की हुंकार, ललकार और गूंज ने एक ऐतिहासिक मौका दिया है कि हम उसे सकारात्मक ऊर्जा में बदलकर नकारात्मक धोखेबाज़ निजाम से मुक्ति पा लें और भारत को दुनिया में उसका अभीष्टतम स्थान दिलाने का अभियान चला दें। साथ ही ऐलान कर दें कि अब भारत में ‘संकल्प, सिद्धि, सपने, सामर्थ्य’ जैसे खोखले व हवाई शब्दों की कोई जरूरत नहीं रह गई है।
