देश के 90% से ज्यादा लोगों की महीने की आमदनी ₹25,000 से कम है। समझना मुश्किल नहीं कि इसमें से कितने में वे घर-परिवार चलाते होंगे, कितना हारी-बीमारी जैसे आकस्मिक खर्च पर जाता होगा और इसके बाद वे कितना बचा पाते होंगे। डेटा बताता है कि अप्रैल 2020 से मार्च 2023 तक भारतीय घरों की कुल वित्तीय बचत ₹86.2 लाख करोड़ रही है। इसमें से ₹31.6 लाख करोड़ बैंक व अन्य संस्थाओ के एफडी, ₹49.5 लाख करोड़औरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी खासियत है कि जिस बात पर उनको घेरा जा सकता है, उसे ही वे अपना मुख्य प्रचार बना लेते हैं। 2014 से अब तक उन्होंने जो कहा, वो किया ही नहीं। अच्छे दिन नहीं आए, विदेश गया कालाधन नहीं आया, हर देशवासी के खाते में 15 लाख रुपए नहीं आए, हर साल दो करोड़ नौजवानों को रोज़गार नहीं मिला, 2022 तक किसानों की आय दोगुनी नहीं हुई, नोटबंदी से न कालाधनऔरऔर भी

मोदी सरकार भ्रष्टाचार को सदाचार में कैसे बनाती रही है, इसकी सटीक मिसाल है चुनावी बांड। जिसे जनता जनार्दन कहा जाता है, उसे पता ही नहीं कि किस देशी-विदेशी कंपनी ने किस राजनीतिक पार्टी को कितना चंदा दे दिया। बस, देनेवाला जानता है किसको दिया और पानेवाला जानता है कि किसने दिया। डील हो गई। डंके की चोट पर कॉरपोरेट रिश्वतखोरी को चुनावी फंडिंग का वैधानिक हिस्सा बना दिया गया। लेकिन सरकार ने कहा कि चुनावी बांडऔरऔर भी

प्रगति कभी हवा में नहीं होती। विकास हमेशा निरंतरता में होता है। यह कहना सफेद झूठ, सरासर धोखा और फरेब है कि मई 2014 से पहले देश में कुछ हुआ ही नहीं और सब कुछ नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद ही हुआ। जिन जनधन खातों, आधार और मोबाइल (जेएएम या जैम) को मोदी सरकार अपनी सफलता का मूलाधार बताती है, इन सभी की नींव मनमोहन सिंह की अगुआई वाली यूपीए सरकार के शासन में रखीऔरऔर भी

मोदी सरकार की श्रेय लेने की राजनीति का सबसे बड़ा उदाहरण है बैंकों के जनधन खाते। 28 अगस्त 2014 को प्रधानमंत्री जनधन योजना इस अंदाज़ में लॉन्च की गई, जैसे पहले कुछ था ही नहीं। हद तो तब हो गई, जब दो महीने पहले ही केंद्र में विदेशी मामलों से लेकर संस्कृति तक की राज्यमंत्री मीनाक्षी लेखी ने 28 दिसबर 2023 को बयान दिया कि कांग्रेस के राज में आजादी से लेकर मई 2014 तक देश मेंऔरऔर भी

श्रेय लेने की राजनीति की भी कोई हद होती है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस बार के बजट में शतरंज के चैम्पियन बढ़ने का भी श्रेय ले लिया। उन्होंने कहा था कि भारत में साल 2010 में 20 से कम ग्रैंडमास्टर थे, जबकि आज 80 से ज्यादा ग्रैंडमास्टर है। उनके आका प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो श्रेय लेने की राजनीति में उस्तादों के भी उस्ताद निकले। मोदी सरकार की गारंटी वाले एक विज्ञापन में दावा किया गयाऔरऔर भी

शेयर बाज़ार से कमाने के लिए अगर हम निवेश और ट्रेडिंग के अंतर को सही-सही समझ लें तो हमारी सफलता की प्रायिकता बढ़ जाती है। याद रखें कि शेयर बाज़ार में पक्का कुछ नहीं। यहां सब कुछ रैंडम या यदृच्छया चलता है। इसलिए यहां सफलता की प्रायिकता या प्रोबैबिलिटी ही चलती है। लेकिन यह बात मन में पक्के तौर पर बैठाना लेनी चाहिए कि निवेश लम्बे समय की ट्रेडिंग है और ट्रेडिंग छोटे समय का निवेश। इसऔरऔर भी

पहली बार अच्छे दिन और विदेश से कालाधन वापस लाने का जुमला था। मतदाता ने भरोसा किया। दूसरी बार पुलवामा के शहीदों के नाम पर अवाम की देशभक्ति को ललकारा गया। तब भी मतदाता ने तहेदिल से साथ दिया। लेकिन न अच्छे दिन आए, न विदेश से कालाधन और न ही देश की बाहरी-भीतरी सुरक्षा मजबूत हुई। हां, इतना ज़रूर हुआ कि विरोधियों पर ईडी व सीबीआई के हमले तेज कर दिए गए। विपक्ष के जो नेताऔरऔर भी

इसे राजनीतिक अवसरवाद की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या कहेंगे कि जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले चुनावी सभाओं व रैलियों में खुद को अति पिछड़ा बताते थे, वे अब कहने लगे हैं कि भारत में केवल चार ही जातियां हैं – गरीब, युवा, महिलाएं और किसान। उनमें यह बदलाव तब आया, जब विपक्ष के इंडिया गठबंधन ने जाति जनगणना का मुद्दा ज़ोर-शोर से उठा दिया। प्रधानमंत्री पिछड़ी व दलित जातियों की गोलबंदी को रोकने के लिए नईऔरऔर भी

दस साल हो गए। क्या अच्छे दिन सभी के आ गए? किसानों की आय 2022 में दोगुनी होनी थी। हो गई क्या? हर साल दो करोड़ नौजवानों को रोज़गार मिलना था। मिला क्या? पांच ट्रिलियन डॉलर या पांच लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था मार्च 2025 तक बन जानी थी। बन पाएगी क्या? खुद सरकार मानती है कि हमारा जीडीपी ऊपर-ऊपर 10.5% बढ़ जाए, तब भी मार्च 2025 तक हमारी अर्थव्यवस्था 3,27,71,808 करोड़ रुपए यानी 3.95 ट्रिलियन डॉलरऔरऔर भी