अमेरिका के ऋण-संकट ने पूरी दुनिया के बाजारों की हालत पटरा कर दी है तो भारतीय बाजार कैसे सलामत बच सकता था। निफ्टी एक फीसदी से ज्यादा गिरकर 5500 के नीचे पहुंच गया। फिर भी मुझे लगता है कि अपने यहां असली तकलीफ रोल्स की है। चूंकि यह फिजिकल सेटलमेंट है नहीं, तो ट्रेडरों के पास कैश का अंतर भरने के अलावा कोई चारा नहीं है। यह हमारे बाजार में आई तीखी गिरावट का मूल कारण हैऔरऔर भी

पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी ने 14 लिस्टेड कंपनियों को हिदायत दी है कि वे दो हफ्ते के भीतर निवेशकों की बकाया शिकायतो का निपटारा कर दें, नहीं तो उनमें से हर किसी पर एक करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया जा सकता है। सेबी इस बाबत इनमें से अधिकांश कंपनियों को पहले भी पत्र लिख चुकी है। लेकिन उन्होंने इसको कोई तवज्जो नहीं दी। इन कंपनियों के नाम हैं – डीएसजे कम्युनिकेशंस, सतगुरु एग्रो इंडस्ट्रीज, राज इरिगेशन,औरऔर भी

सार्वजनिक क्षेत्र की शीर्ष तेल उत्खनन कंपनी ओएनजीसी का एफपीओ (फॉलो-ऑन पब्लिक ऑफर) लगता है कि अगस्त में ही नहीं आ पाएगा। इसका लगभग 11,500 करोड़ रुपए का एफपीओ इस साल मार्च से पहले ही आना था। फिर कहा गया कि यह अप्रैल में आएगा। इसके बाद टाल कर जुलाई किया गया। और, अब कहा जा रहा है कि जून 2011 की तिमाही के नतीजों की घोषणा के बाद ही इस पर विचार किया जा सकता है।औरऔर भी

लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप (एलएलपी) फर्म स्टॉक एक्सचेंजों की सदस्य बन सकती है और स्टॉक एक्सचेंज उसे स्टॉक ब्रोकर के रूप में पंजीकृत कर सकते हैं। यह साफ किया गया है पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी ने आज सोमवार को सभी स्टॉक एक्सचेंजों को भेजे सर्कुलर में। सेबी ने कहा है कि सिक्यूरिटीज कांट्रैक्ट रेगुलेशन नियम, 1956 (एससीआरआर) में अलग से एलएलपी का जिक्र नहीं है क्योंकि लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप एक्ट तो उसके बाद साल 2008 में बनाऔरऔर भी

हमने इसी जगह एक बार नहीं, कई बार कहा था कि चाहे कुछ हो जाए, बाजार 5735 तक जाएगा। यह हो गया। महज दो हफ्तों में एफआईआई (विदेशी संस्थागत निवेशकों) ने 10,000 करोड़ रुपए की खरीद कर डाली। अहम सवाल है कि आगे क्या होगा? क्या यह क्षणिक आवेग है या बाजार नई छलांग की तैयारी में है? मंदी और तेजी के खेमे की राय स्वाभाविक तौर पर अलग-अलग है। कुछ कहते हैं कि यह महज फुलझड़ीऔरऔर भी

सेबी के कार्यकारी निदेशक जे एन गुप्ता ने अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रॉयटर्स को दिए गए एक इंटरव्यू में भारतीय पूंजी बाजार नियामक संस्था को अमेरिका जैसे विकसित पूंजी बाजार की नियामक संस्था से बेहतर बताया है। जब उनसे पूछा गया कि क्या सेबी का भारतीय बाजार पर अमेरिका के एसईसी (सिक्यूरिटीज एक्सचेंज कमीशन) की तुलना में ज्यादा नियंत्रण है तो उनका कहना था – यकीकन। श्री गुप्ता का कहना था कि सेबी ने तमाम ऐसे उपाय करऔरऔर भी

शेयर बाजार के बिगड़े माहौल के चलते 15 कंपनियों ने पूंजी बाजार नियामक सेबी की मंजूरी के बावजूद अपने आईपीओ पेश नहीं किए। इन्हें मिली मंजूरी की मीयाद पूरी हो गई और ये कंपनियां पूंजी बाजार में उतरने की हिम्मत नहीं जुटा सकीं। इस साल जनवरी से जून 2011 के बीच 15 आईपीओ से कुल 25,186 करोड़ रुपए जुटाने की योजना थी। लेकिन इनमें से कोई भी आईपीओ बाजार में नहीं आया। बता दें कि सेबी सेऔरऔर भी

भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर डॉ. दुव्वरि सुब्बाराव का तीन साल का कार्यकाल सितंबर में खत्म हो रहा है। इसलिए सरकारी हलकों में उनकी जगह नए गवर्नर को लाने की तैयारियां शुरू हो गई हैं। सूत्रों के मुताबिक इस दौड़ में तीन लोगों का नाम सबसे आगे हैं। ये हैं – शिकागो विश्वविद्यालय के प्रोफेसर व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सलाहकार रघुराम राजन, आर्थिक मामलों के सचिव आर गोपालन और कार्नेल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर व वित्त मंत्रालयऔरऔर भी

सरकार ने चालू वित्त वर्ष के बजट में की गई घोषणा पर अमल की शुरुआत कर दी है। उसने बताया है कि विदेशी निवेशकों को घरेलू म्यूचुअल फंड में 10 अरब डॉलर तक निवेश करने की अनुमति दी जाएगी। हालांकि विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) इसमें शिरकत नहीं कर पाएंगे। इससे शेयर बाजार में होने वाले तीव्र उतार चढ़ाव को हल्का रखने में मदद मिलेगी। वित्त मंत्रालय में संयुक्त सचिव (पूंजी बाजार) थॉमस मैथ्यू ने कहा कि इसऔरऔर भी

ग्रीस की खराब आर्थिक हालात के कारण पूरा यूरोप चिंतित है। भारत में महंगाई की स्थिति खराब चल रही है। इन हालात में बदनाम पी-नोट्स (पार्टिसिपेटरी नोट्स) के जरिए भारतीय शेयर बाजार में एक बार फिर बड़े पैमाने पर निवेश शुरू हो गया है। विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) के कुल निवेश में पी-नोट्स की हिस्सेदारी मई महीने में 19.5 फीसदी तक पहुंच चुकी थी। सेबी के मुताबिक अप्रैल में यह आंकड़ा 15 फीसदी ही था। हालांकि यहऔरऔर भी