नियम जो टूट जाते हैं मेज के नीचे से

हमने इसी जगह एक बार नहीं, कई बार कहा था कि चाहे कुछ हो जाए, बाजार 5735 तक जाएगा। यह हो गया। महज दो हफ्तों में एफआईआई (विदेशी संस्थागत निवेशकों) ने 10,000 करोड़ रुपए की खरीद कर डाली। अहम सवाल है कि आगे क्या होगा? क्या यह क्षणिक आवेग है या बाजार नई छलांग की तैयारी में है?

मंदी और तेजी के खेमे की राय स्वाभाविक तौर पर अलग-अलग है। कुछ कहते हैं कि यह महज फुलझड़ी है और निफ्टी को तो 4850 तक जाना ही है। तेजड़ियों का कहना है कि एफआईआई पागल नहीं हैं जो बाजार के 4850 पर जाने के आसार के बीच 10,000 करोड़ रुपए झोंक देते। खरीदना व खींचना अपनी जगह है, लेकिन बाजार गिरने लगा तो कौन उन्हें बचाएगा क्योंकि रिटेल निवेशक, एचएनआई (हाई नेटवर्थ इंजीविजुअल या अमीर निवेशक) और डीआईआई (घरेलू संस्थागत निवेशक) तो खरीद के मूड में दिख नहीं रहे। असल में रिटेल व एचएनआई निवेशकों ने बराबर बेचने का दबाव न बनाए रखा होता तो एफआईआई के 10,000 करोड़ रुपए निफ्टी को 6500 के पार ले गए होते।

हम मानते हैं कि भारत समेत उभरते बाजारों के लिए सबसे बुरा दौर अब बीत चुका है। निफ्टी के 5500 से नीचे जाने के आसार नहीं है, बल्कि यह मजबूत खरीद का वाजिब स्तर है। पिछले साल भर का रुझान देखें तो निफ्टी के 5500 के आसपास आते ही खरीद शुरू हो जाती है। अगर खुदा-न-खास्ता यह 5500 के नीचे चला भी गया तो झटपट वापस लौट आएगा। इसलिए 5180 से 5770 तक का अच्छा सफर देखने और इस दौरान थोड़ी मुनाफावसूली कर लेने के बाद हमारी पक्की धारणा बन रही है कि 5600 के स्तर पर भारी खरीद होगी क्योंकि एफआईआई हमेशा जोखिम लेने को तैयार रहते हैं।

यह कोई तात्कालिक फुलझड़ी या मुर्दे में हरकत जैसी बात नहीं है, बल्कि मूल्यांकन दिखाता है कि बाजार में फिलहाल सेंसेक्स को 22,000 तक ले जाने का पर्याप्त ईंधन है। सरकार भी अपने स्तर पर सक्रिय हो गई है। एफआईआई के तमाम सरोकार सुलझ गए हैं। वे सरकार की निष्क्रियता को लेकर डरे हुए थे और निवेश करने को तैयार नहीं थे। लेकिन जिस दिन से सरकार ने ईंधन के दाम बढ़ाए हैं, उसी दिन से एफआईआई ने 10,000 करोड़ रुपए लगाना शुरू कर दिया और बाजार की रंगत बदलने लगी। सरकार मानसून सत्र में आर्थिक सुधारों से जुड़े कुछ अहम विधेयक लाने जा रही है। इसलिए माहौल अब शुभ-शुभ है और एफआईआई अपना निवेश जारी रखेंगे।

वैसे, बाजार में तेजी का पूरा रंग तभी जमेगा जब रिटेल व एचएनआई निवेशकों की खरीद शुरू हो जाएगी क्योंकि तब बिकवाली का सिलसिला थम जाएगा और एफआईआई की खरीद के साथ इनकी खरीद 1+1 साबित होगी। करीब 600 अंकों के सुधार के बाद पिछले हफ्ते में निफ्टी में थोड़ा करेक्शन आना लाजिमी था। ऊपर से खनन विधेयक के प्रावधानों और रिलायंस इंडस्ट्रीज के डाउनग्रेड ने मुनाफावसूली का माहौल भी बना डाला। फिर भी हमारा यकीन है कि इस महीने या अगले महीने बाजार 5910 तक जाएगा।

भारत बाजार प्रणालियों में पश्चिम की नकल तो करता है। लेकिन उसे अपने मुताबिक ढालता नहीं। इसे इस तथ्य में देखा जा सकता है कि यहां रिटेल निवेशक हमेशा ठगे जाते हैं। रिलायंस इंडस्ट्रीज का शेयर पिछले साल भर बाजार से पीछे चलता रहा। जब वह चक्र के निचले स्तर पर पहुंचकर उठने ही जा रहा था कि मॉरगन स्टैनले ने उसे डाउनग्रेड कर दिया। इससे रिटेल निवेशकों का मनोबल टूटता है। आप देख लीजिएगा कि जब उस्ताद लोग गिरे हुए भावों पर रिलायंस को बटोर चुके होंगे तो अगले दो महीने में ही फिर इसे अपग्रेड कर दिया जाएगा। ऐसा अतीत में भारती एयरटेल, हीरो होंडा, आइडिया और टाटा मोटर्स के साथ हो चुका है। एनालिस्टों की राय को इस तरह बदलने पर अपने यहां कोई अंकुश ही नहीं है, जबकि अमेरिका या यूरोप में इस तरह मनमाफिक तरीके से जब चाहें, तब डाउनग्रेड या अपग्रेड नहीं किया जा सकता।

तीन दिन पहले एसकेएस माइक्रोफाइनेंस को सायास तूल दी गई। क्यों? यह तो एक्सचेंज ही बता सकते हैं। वे बार-बार यही कहते हैं कि अनावश्यक सट्टेबाजी को रोकने के लिए वे बाजार के हर शेयर पर नजर रखते हैं और जरूरत पड़ने पर सर्किट ब्रेकर लगाते हैं। कभी-कभार ही होता है कि 5 फीसदी सर्किट बढ़ाकर अचानक 20 फीसदी कर दिया जाए। लेकिन एसकेएस माइक्रोफाइनेंस के साथ ऐसा ही हुआ और वो दो दिन में दो बार ऊपरी सर्किट तोड़ता हुआ 40 फीसदी बढ़ गया। अब फिर से निगरानी के नियमों के तहत उस पर सर्किट सीमा घटाकर 10 फीसदी कर दी गई है।
सामान्य मामलों में नियमों के तहत सर्किट सीमा 2 से 5, 5 से 10 और 10 से 20 फीसदी की जाती है। लेकिन एसकेएस को विशेष मामला बनाकर यह सीमा सीधे 5 से 20 फीसदी कर दी गई। इसके बाद तो सीमा को घटकर 10 फीसदी पर टिकना ही था। लेकन इतनी ढील से इसका शेयर फिर से 500 रुपए तक जा पहुंचा जैसा सामान्य मामलों में संभव नहीं था। नियमतः अगर कोई शेयर 27 फीसदी से ज्यादा बढ़ जाता है तो उसकी सर्किट सीमा खटाक से बदल दी जाती है और यहां तक कि उसे 100 फीसदी डिलीवरी वाली ट्रेड टू ट्रेड श्रेणी में डाल दिया जाता है। लीक से हटना साहस का काम होता है, लेकिन नियामक जब लीक से हटता है तो उसके पीछे कुछ न कुछ मेज के नीचे का खेल जरूर होता है।

इसी तरह बिड़ला पैसिफिक मेडस्पा के आईपीओ में एक और खेल हुआ है। पहले दिन 200 फीसदी बढ़ गया। दूसरे दिन 20 फीसदी के निचले सर्किट पर चला गया। अगली कड़ी 20 फीसदी और 10 फीसदी गिरावट की है। ऐसा तब तक चलता रहेगा जब तक आईपीओ ऑपरेटर इससे पूरी तरह बाहर नहीं निकल जाते। जाहिर है इसमें शिकार हो रहा है रिटेल निवेशकों का। सवाल उठता है कि दिनदहाड़े होती इन धांधलियों के बीच वित्त मंत्रालय, कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय या सेबी किस मुंह पूंजी बाजार में रिटेल निवेशकों की वापस लाने की बात करते हैं? क्या वे इतने अंधे हैं कि जो सबको दिखता है, वह उन्हें ही नहीं दिखता?

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