हर देशवासी को जानना ही चाहिए कि देश चला रही मौजूदा भारत सरकार आय-व्यय को लेकर क्या कर रही है। चालू वित्त वर्ष 2026-27 का कुल बजट ₹53.47 लाख करोड़ का है। इसमें से टैक्स व अन्य मदों से उसे कुल ₹35.33 लाख करोड़ का राजस्व मिलेगा। ₹80,000 करोड़ वो आस्तियां बेचकर जुटाएगी। ₹38,397 करोड पुराने ऋणों की वसूली से मिलने हैं। इस तरह उसकी कुल आय ₹36.51 लाख करोड होगी। बाकी ₹16.96 लाख करोड़ रुपए वोऔरऔर भी

देश के ऋण की तुलना जीडीपी के करना सही नहीं क्योंकि स्टॉक की तुलना फ्लो से नही की जा सकती। तुलना के लिए दोनों का स्वरूप फ्लो या प्रवाह का रहना चाहिए। इसलिए तुलना करनी ही है तो ऋण नहीं, ब्याज भुगतान की तुलना जीडीपी से करनी चाहिए। भारत की स्थिति यह है कि वह अकेले ब्याज की अदायगी पर ही जीडीपी का 5.11% खर्च कर देता है। यह वियतनाम (0.89%), इंडोनेशिया (2.21%) और मलयशिया (2.84%) जैसीऔरऔर भी

देश का नॉमिनल जीडीपी बीते वित्त वर्ष 2025-26 में अनंतिम अनुमान के मुताबिक ₹346.36 लाख करोड़ रहा है। इस बार के बजट में 2026-27 में इसके ₹393.01 लाख करोड हो जाने का अनुमान है। भारत पर चढ़ा देशी-विदेशी कुल ऋण मार्च 2026 तक ₹197.18 लाख करोड़  है और मार्च 2027 तक इसके बढ़कर ₹214.82 लाख करोड़ हो जाने का बजट अनुमान है। इस तरह गणना करें तो 2025-26 में भारत का ऋण-जीडीपी अनुपात 56.9% है जो 2026-27औरऔर भी

भारत सरकार के लिए आंतरिक ऋण कोई खास समस्या नहीं। साल-दर-साल वो ऋण से पूरा किया जानेवाला राजकोषीय घाटा भी कम करती जा रही है। वित्त वर्ष 2012-14 में राजकोषीय घाटा जीडीपी का 5.2% हुआ करता था। 2013-14 में जीडीपी का 4.4% पर आ गया। बीच में कोरोना महामारी के भीषण संकट के बावजूद 2025-26 तक इसे दोबारा 4.4% पर ले आया गया और 2026-27 में इसे 4.3% पर ले आया जाएगा। लेकिन सरकार विदेशी ऋण सेऔरऔर भी

विकास के सरकारी शोर में देश बड़ी सांसत में फंस गया है। एक तरफ आमजन को जिंदगी चलाने के लिए घर का सोना तक गिरवी रखकर लोन लेना पड़ रहा है। दूसरी तरफ  पिछले बारह सालों में भारत सरकार पर चढ़ा आंतरिक ऋण ₹54.04 लाख करोड़ का 3.52 गुना ₹190.44 लाख करोड़ हो चुका है, जबकि हमारा नॉमिनल जीडीपी 3.05 गुना ही हुआ है। लेकिन व्यक्ति और देश पर चढ़े ऋण को एक तराजू पर रखना ठीकऔरऔर भी

भारतीय परिवार रोजमर्रा की खपत के लिए ज्यादा ऋण ले रहे हैं तो परसनल लोन देने और दिलाने वाली कंपनियां बड़ी खुश हैं। दुनिया के 50 से ज्यादा देशों में सक्रिय स्विटज़रलैंड की बहुराष्ट्रीय फाइनेंस व निवेश कंपनी यूबीएस के हिसाब से वित्त वर्ष 2025-26 में भारतीय परिवारों पर चढ़े ऋण का 34% हिस्सा परसनल लोन का था, जबकि 2019-20 में यह 29% हुआ करता था। उनका आकलन है कि आगे गैर-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों (एनबीएफसी) द्वारा दियाऔरऔर भी

भारतीय रिजर्व बैंक के मुताबिक मार्च 2026 तक भारतीय परिवारों पर चढ़ा ऋण देश के जीडीपी का 45.9% है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय संस्था बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट (बीआईएस) के मुताबिक यह ऋण मार्च 2026 की तिमाही में जीडीपी का 49.10% हो चुका है, जबकि दिसंबर 2025 की तिमाही में यह 47.80% और 2016 की सितंबर तिमाही में 33.10% ही हुआ करता था। भारतीय परिवारों के ऋण का इस तरह बढ़ना चिंता की बात है। लेकिन इससे भी बड़ीऔरऔर भी

देश के जीडीपी के बढ़ते दावों के बीच भारतीय परिवारों की बैलेंस शीट बिगड़ती जा रही है। जीडीपी के अनुपात में उनकी देनदारियां बढ़ती ही जा रही हैं। भारतीय रिजर्व बैंक की सितंबर माह की बुलेटिन के मुताबिक जून 2022 में भारतीय परिवारों की वित्तीय आस्तियां ₹328.94 लाख करोड़ थीं जो तब के नॉमिनल जीडीपी की 134.3% यानी 1.34 गुना थीं। भारतीय परिवारों की वित्तीय आस्तियां मार्च 2026 में ₹490.24 लाख करोड़ हैं जो तब के नॉमिनलऔरऔर भी

यह आभास नहीं, जिसका कोई विरोधाभास हो। यह एक साथ मौजूद सच्चाई भी नहीं कि उसे विडम्बना कह दिया जाए। यह कोई अद्भुत, अकल्पनीय व अनदेखी स्थिति भी नहीं, जिसमें कबीर की उलटबांसियों की तरह कोई सत्य या गूढ़ रहस्य छिपा हो। इसे अधिक से अधिक मोदी-जाल कहा जा सकता है कि एक तरफ भारत दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है, दूसरी तरफ अपना काम-धंधा या नौकरी करने वाले 80% भारतीयों की वास्तविकऔरऔर भी

दुनिया को दिखाना है ताकि भारत को हर कोण से बेचने का चौकस माहौल बना रहे। मोदी सरकार ने दलाली के साध्य के लिए जीडीपी को देश बेचने का साधन बना दिया है। बाकी देश व अवाम जाए भाड़ में। बस जीडीपी चमकता दिखना चाहिए। उसे फर्क नहीं पड़ता कि देश के लगभग 80% स्वरोजगार में लगे व नौकरीपेशा लोगों की वास्तविक आय पिछले कुछ सालों में घट गई है, जबकि इसी दौरान स्टॉक एक्सचेंजों में लिस्टेडऔरऔर भी