कर्ज अवाम की फांस, सरकार की ऐश!

विकास के सरकारी शोर में देश बड़ी सांसत में फंस गया है। एक तरफ आमजन को जिंदगी चलाने के लिए घर का सोना तक गिरवी रखकर लोन लेना पड़ रहा है। दूसरी तरफ  पिछले बारह सालों में भारत सरकार पर चढ़ा आंतरिक ऋण ₹54.04 लाख करोड़ का 3.52 गुना ₹190.44 लाख करोड़ हो चुका है, जबकि हमारा नॉमिनल जीडीपी 3.05 गुना ही हुआ है। लेकिन व्यक्ति और देश पर चढ़े ऋण को एक तराजू पर रखना ठीक नहीं। कारण, लोकतंत्र में जनता को भले ही संप्रभु माना गया हो। लेकिन उसे अपना ऋण उतारने का इंतज़ाम खुद ही करना होता है, भले ही इसके लिए दुर्दिन के लिए बचाकर रखा गया सोना ही गिरवी रखना पड़े। लेकिन सरकार जितना चाहे, उतने नोट छापकर आंतरिक ऋण की अदायगी कर सकती है तो ऋण लेते जाने में उसकी मौज ही मौज है। हालांकि देश व अवाम के लिए यह बड़ा कठिन-कठोर और निर्मम दुष्चक्र बन जाता है क्योंकि ज्यादा नोट छापने से मुद्रा का मूल्य घट जाता है और मुद्रास्फीति बढ़ जाती है, जिसका खामियाजा अंततः जनता को भी भुगतना पड़ता है। फिर भी सरकार बेधड़क ऋण लेती रहती है। वो बॉन्ड जारी करके ऋण जुटाती रहती है। उसके जारी बॉन्ड अमूमन बैंक, बीमा कंपनियां व अन्य वित्तीय संस्थाएं ही खरीदती हैं। इसके लिए ये सारी की सारी वित्तीय संस्थाएं अवाम की बचत ही दांव पर लगाती हैं। अब सोमवार का व्योम…

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