अनिश्चितता से भरा समय है और अनिश्चितता से ही भरा है शेयर बाज़ार। इस अनिश्चितता से जूझने के लिए जिसने रिस्क लिया, उसने या तो कमाया या अनुभव से थोड़ी समझ और हौसला हासिल किया। जिसने रिस्क नहीं लिया तो धारा के साथ बह गया या बहते-बहते कहीं किनारे लग गया। करना क्या है, यह हर किसी को रिस्क लेने की अपनी क्षमता के हिसाब से तय करना है। शेयर बाज़ार का कोई भरोसा नहीं। बड़ों कोऔरऔर भी

मोदी सरकार की जीडीपी चमत्कार गाथा में जितना गहरे उतरते जाइए, आपका माथा उतना ही चकराता जाता है। ऊपर-ऊपर 7.8% या 2.6% की विकास दर और डबल डिफ्लेटर के खेल को किनारे रख दें तो एक नया चौंकानेवाला रहस्य कूदकर सामने आ खड़ा होता है। नई सीराज की गणना में 2022-23 से लेकर 2025-26 तक का जीडीपी पुरानी सीरीज़ से पूरे ₹42.1 लाख करोड़ घटा दिया गया है। मतलब उक्त तीन सालों में पहले बताया गया जीडीपीऔरऔर भी

देश का जीडीपी और उसकी विकास दर भले ही जन-जन से जुड़ी है, लेकिन सरकार ने उसे जन-जन से दूर रखने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। पहले थोक मुद्रास्फीति को डिफ्लेटर बनाकर चला गया, तब उसमें उद्योग-धंधों और थोक व्यापारियों की स्थिति देखी गई, आमजन पर पड़ रही महंगाई की मार नहीं। डिफ्लेटर 0.8% और 2.2% लिया गया, जबकि रिटेल मुद्रास्फीति  2.4% और 4.9% रही थी। इस साल से जो डबल डिफ्लेटर इस्तेमाल किया जा रहाऔरऔर भी

दुनिया भर में नॉमिनल जीडीपी में किसी झूठ या फ्रॉड की गुंजाइश नहीं क्योंकि वो बाज़ार मूल्यों पर आधारित होता है और बाज़ार मूल्य अमूमन झूठ नहीं बोलते। मई 2014 से पहले भारत में भी ऐसी कोई गुंजाइश नहीं थी। तब औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) जैसे मात्रा पर आधारित सूचकांकों से रीयल जीडीपी की गणना सीधे की जाती थी और फिर उसमें डिफ्लेटर जोड़कर नॉमिनल जीडीपी निकाला जाता था। लेकिन मोदी सरकार ने जनवरी 2015 से जीडीपीऔरऔर भी

देश के आम से लेकर खास लोग और दिहाड़ी मजदूर से लेकर कॉरपोरट तक हम सभी रोजमर्रा के जीवन में जो देखते, समझते, झेलते, भोगते व महसूस करते हैं, वो नॉमिनल जीडीपी और उसकी विकास दर में ही झलकता है। हालांकि दुनिया भर में इसे मुद्रास्फीति-निरपेक्ष बनाने के लिए डिफ्लेटर का इस्तेमाल कर रीयल जीडीपी और उसकी विकास दर निकाली जाती है। लेकिन एक बात हमेशा ध्यान में रखें कि रीयल जीडीपी और उसकी विकास दर मूलतःऔरऔर भी

ब्रिक्स का 18वां शिखर सम्मेलन। भारत ने चौथी बार इसकी अध्यक्षता की। इसके पांच मूल सदस्यों – ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन व दक्षिण अफ्रीका में भारत सबसे गरीब है। हमारी प्रति व्यक्ति आय 2550 डॉलर है, जबकि दक्षिण अफ्रीका की 6110 डॉलर, ब्राज़ील की 9930 डॉलर, चीन की 13,660 डॉलर और रूस की 15,160 डॉलर है। विश्व बैंक के जुलाई 2026 के ताजा मानक के मुताबिक 14,375 डॉलर या अधिक प्रति व्यक्ति वाला देश विकसित है, जबकिऔरऔर भी

देश का जीडीपी महज संख्याओं का खेल नहीं। हर देशवासी के साथ उद्योग-धंधों, व्यापार और सरकारों तक की हरकतों से इसका वास्ता है। इसके सारे घटकों को डेटा सर्वसुलभ और पारदर्शी हो तो इसका हिसाब निकालना कोई रॉकेट साइंस नहीं। किसी अवधि में घरों से लेकर बिजनेस तक जो भी माल व सेवाएं सृजित हुई हैं, उसमें सरकार को मिला टैक्स जोड़कर उसके द्वारा दी गई सब्सिडी घटा दें तो जीडीपी निकल आता है। इसका एक स्वरूपऔरऔर भी

यह वाकई बड़े अचम्भे की बात है। वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही में नॉमिनल जीडीपी पुरानी सीरीज में ₹86,05,365 करोड़ था, जबकि रीयल जीडीपी ₹47,88,623 करोड़ था। आखिर डेरिवेटिव या निकाला गया रीयल जीडीपी बाज़ार मूल्य के नॉमिनल जीडीपी से 44.35% कम क्यों? मुद्रास्फीति को बेअसर करने का यह कैसा डिफ्लेटर था जिसने गुब्बारे की 44.35% हवा निकाल दी थी? सरकारी अर्थशास्त्रियों व आर्थिक विश्लेषकों की जमात इतने बड़े अंतर का रहस्य खोलने के बजाय तंजऔरऔर भी

मोदी सरकार जीडीपी को चमकाने के लिए सालों-साल से बड़े योजनाबद्ध तरीके से काम कर रही है। जीडीपी की गणना का आधार वर्ष 2011-12 से बदलकर 2022-23 करना तय था। इसलिए उसने 2022-23 का जीडीपी जितना कम किया जा सकता था, उतना कम किया ताकि उसके आधार पर आगे अधिक वृद्धि दर दिखाई जा सके। वित्त वर्ष 2022-23 में नॉमिनल जीडीपी शुरू में ₹2,72,40,712 करोड़ आंका गया। फिर इसे घटाकर ₹2,68,90,473 करोड़ किया गया। फरवरी 2026 मेंऔरऔर भी