मोदी सरकार की जीडीपी चमत्कार गाथा में जितना गहरे उतरते जाइए, आपका माथा उतना ही चकराता जाता है। ऊपर-ऊपर 7.8% या 2.6% की विकास दर और डबल डिफ्लेटर के खेल को किनारे रख दें तो एक नया चौंकानेवाला रहस्य कूदकर सामने आ खड़ा होता है। नई सीराज की गणना में 2022-23 से लेकर 2025-26 तक का जीडीपी पुरानी सीरीज़ से पूरे ₹42.1 लाख करोड़ घटा दिया गया है। मतलब उक्त तीन सालों में पहले बताया गया जीडीपी असल में 96.6% कम रहा था। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि नई सीरीज़ में दिया गया निजी अंतिम खपत खर्च (पीएफसीई) ₹689.21 लाख करोड़ है। यह पुरानी सीरीज़ के निजी अंतिम खपत खर्च ₹769.91 लाख करोड़ से ₹80.70 लाख करोड़ या 10.48% कम है। आखिर पुरानी और नई सीरीज़ के बीच देश के आमजन की इतनी खपत कैसे और कहां हवा में उड़ गई? क्या यह खपत कभी थी ही नहीं और इसे जबरन दिखाया गया था? यह सवाल ज़मीन से जुड़े अध्येता और अर्थशास्त्री विवेक कौल ने बड़ी शिद्दत से उठाया है। हम सबकी जो खपत देश के जीडीपी का 55-60% बनाती रही है, उसमें इतना बड़ा झोल कैसे आ गया? सवाल उठता है कि क्या दशकों से भारत के विशाल बाज़ार व खपत की जो कहानी देश-दुनिया में बेची जा रही है, वो खोखली हो चुकी है और इसीलिए निजी क्षेत्र देश में निवेश नहीं कर रहा? अब शुक्रवार का अभ्यास…
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