देश का जीडीपी और उसकी विकास दर भले ही जन-जन से जुड़ी है, लेकिन सरकार ने उसे जन-जन से दूर रखने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। पहले थोक मुद्रास्फीति को डिफ्लेटर बनाकर चला गया, तब उसमें उद्योग-धंधों और थोक व्यापारियों की स्थिति देखी गई, आमजन पर पड़ रही महंगाई की मार नहीं। डिफ्लेटर 0.8% और 2.2% लिया गया, जबकि रिटेल मुद्रास्फीति 2.4% और 4.9% रही थी। इस साल से जो डबल डिफ्लेटर इस्तेमाल किया जा रहा है, उसका भी वास्ता आमजन से नही है। एक है इनपुट डिफ्लेटर और दूसरा है आउटपुट डिफ्लेटर। इनपुट डिफ्लेटर में कोई पारदर्शिता नहीं। उत्पादन में कच्चे माल से लेकर बिजली व पानी तक इतनी चीजें इस्तेमाल की जाती हैं कि उनका डेटा सरकार ने सार्वजनिक नहीं किया है। वहीं, आउटपुट में प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स (पीपीआई) है जिसे दशकों से नहीं निकाला जा सका क्योंकि उत्पादक कहते थे कि यह हमारा ट्रेड सीक्रेट है। अब यह कहां से आ गया और इसके सही होने का क्या भरोसा! ऐसे में किसी को भी पच नहीं रहा कि जिस तिमाही में थोक मुद्रास्फीति 9.3% और रिटेल मुद्रास्फीति 3.9% रही हो और अब अगस्त में थोक मुद्रास्फीति बढ़कर 9.92% और रिटेल मुद्रास्फीति 4.8% हो गई हो, वहां आखिर जीडीपी डिफ्लेटर 2.33% कैसे और कहां से निकाल लिया गया? यह सरासर छल है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…
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