दुनिया भर में नॉमिनल जीडीपी में किसी झूठ या फ्रॉड की गुंजाइश नहीं क्योंकि वो बाज़ार मूल्यों पर आधारित होता है और बाज़ार मूल्य अमूमन झूठ नहीं बोलते। मई 2014 से पहले भारत में भी ऐसी कोई गुंजाइश नहीं थी। तब औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) जैसे मात्रा पर आधारित सूचकांकों से रीयल जीडीपी की गणना सीधे की जाती थी और फिर उसमें डिफ्लेटर जोड़कर नॉमिनल जीडीपी निकाला जाता था। लेकिन मोदी सरकार ने जनवरी 2015 से जीडीपी निकालने का तरीका बदल दिया। वो मात्रा नहीं, बाज़ार मूल्यों के आधार पहले नॉमिनल जीडीपी निकालती और फिर डिफ्लेटर घटाकर असली या रीयल जीडीपी बताने लगी। इससे जीडीपी पर झाग ही झाग छा गया और असली जीडीपी कहीं नीचे छिप गया। अब भी सांख्यिकी मंत्रालय के सचिव सौरभ गर्ग इस छल की सफाई देते हुए कहते हैं कि पहले अर्थव्यस्था में लगभग आधा योगदान करनेवाले असंगठित या अनौपचारिक क्षेत्र का सही डेटा नहीं था। अब सही डेटा आ रहा है कि तो पहले के नॉमिनल जीडीपी को कम करना पड़ा है। जीडीपी की गणना में दूसरा फ्रॉड डिफ्लेटर के माध्यम से किया जा रहा है। इस साल फरवरी में जीडीपी की नई सीरीज आने के बाद चालू वित्त वर्ष 2026-27 से दुनिया भर में प्रचलित ‘डबल डिफ्लेटर’ की पद्धति अपना ली गई है। लेकिन पूरे झोल के साथ। अब बुधवार की बुद्धि…
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