भारतीय रिजर्व बैंक के मुताबिक मार्च 2026 तक भारतीय परिवारों पर चढ़ा ऋण देश के जीडीपी का 45.9% है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय संस्था बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट (बीआईएस) के मुताबिक यह ऋण मार्च 2026 की तिमाही में जीडीपी का 49.10% हो चुका है, जबकि दिसंबर 2025 की तिमाही में यह 47.80% और 2016 की सितंबर तिमाही में 33.10% ही हुआ करता था। भारतीय परिवारों के ऋण का इस तरह बढ़ना चिंता की बात है। लेकिन इससे भी बड़ी चिंता की बात यह है कि मार्च 2026 तक भारतीय परिवारों पर चढ़े कुल ₹158.55 लाख करोड़ के ऋण में से 58.4% ऋण परसनल लोन, क्रेडिट कार्ड व कंज्यूमर ड्यूरेबल्स के ऋण हैं। लोगबाग ऋण का बड़ा हिस्सा रीयल एस्टेट या बिजनेस जैसी आस्तियों में नहीं लगा रहे, बल्कि रोजमर्रा की खपत के लिए ले रहे हैं। उनके कुल ऋण में हाउसिंग लोन का हिस्सा घटकर 29% पर आ गया है। अगर इसमें कार लोन भी मिला दें तो हाउसिंग व कार लोन का हिस्सा भारतीय परिवारों की कुल वित्तीय देनदारी में 36% हो जाता है। लोगों ने शेयर बाज़ार और म्यूचुअल फंड में भी निवेश घटा दिया है। वित्त वर्ष 2024-25 में हमारी घरेलू बचत का 18% हिस्सा इक्विटी व म्यूचुअल फंड में जा रहा था। यह 2025-26 में घटकर 13% पर आ चुका है। धीरे-धीरे नौबत सोना व जेवरात बेचकर घर चलाने की आ गई है। अब बुधवार की बुद्धि…
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