भारत सरकार के लिए आंतरिक ऋण कोई खास समस्या नहीं। साल-दर-साल वो ऋण से पूरा किया जानेवाला राजकोषीय घाटा भी कम करती जा रही है। वित्त वर्ष 2012-14 में राजकोषीय घाटा जीडीपी का 5.2% हुआ करता था। 2013-14 में जीडीपी का 4.4% पर आ गया। बीच में कोरोना महामारी के भीषण संकट के बावजूद 2025-26 तक इसे दोबारा 4.4% पर ले आया गया और 2026-27 में इसे 4.3% पर ले आया जाएगा। लेकिन सरकार विदेशी ऋण से इतनी आसानी से नहीं निपट सकती क्योंकि यह उसे डॉलर में चुकाना होता है और रुपए के कमज़ोर होने से उतने ही विदेशी ऋण के लिए ज्यादा भुगतान करना पड़ता है। रिजर्व बैंक के ताज़ा अपडेट के मुताबिक भारत सरकार पर चढ़ा विदेशी ऋण जून 2026 के अंत तक 778.2 अरब डॉलर का हो चुका है। यह मार्च 2026 तक के विदेशी ऋण 762.8 अरब डॉलर से 15.4 अरब डॉलर अधिक है। 25 सितंबर 2026 तक देश का विदेशी मुद्रा भंडार 747.6 अरब डॉलर है जो 96% बकाया विदेशी ऋण को कवर करता है। जून 2026 तक का हमारा विदेशी ऋण जीडीपी का 20.8% ही है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण कहती हैं कि चालू वित्त वर्ष 2026-27 में भारत का कुल ऋण-जीडीपी अनुपात 55.6% है जिसे 2030-31 तक 50% पर ले आया जाएगा। लेकिन क्या ऋण-जीडीपी अनुपात सही पैमाना है? अब मगलवार की दृष्टि…
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