देश का मतलब सरकार नहीं होता और न ही किसी व्यक्ति को देश का पर्याय बनाया जा सकता है। अपने यहां महात्मा गांधी, पंडित जवाहर लाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और लाल बहादुर शास्त्री जैसी महान हस्तियां हुईं। लेकिन किसी ने खुद को भारत का पर्याय नहीं बताया। कांग्रेस के अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने 1974 में ‘इंडिया इज़ इंदिरा, इंदिरा इज़ इंडिया’ का नारा दिया था। लेकिन देश ने कभी इसे स्वीकार नहीं किया और इंदिरा गांधीऔरऔर भी

सालों-साल से बनाया जा रहा 24-25 स्टॉक्स का जो पोर्टफोलियो सितंबर तक 60-62% फायदा दिखा रहा था, दो महीने में ही वहां फायदा 30-32% तक सिमट जाए तो किसी का भी दुखी हो जाना स्वाभाविक है। कमज़ोर कंपनियों के शेयर गिर जाएं तो समझ में आता है। लेकिन अच्छी-खासी मजबूत कंपनियों के शेयर घाटा देने लग जाएं तो धैर्यवान व समझदार निवेशक भी मायूस हो जाता है और खुद को असहाय महसूस करता है। लेकिन इतिहास साक्षीऔरऔर भी

याद रखें कि आप ट्रेडिंग कर रहे हैं, लम्बे समय का निवेश नहीं। फिर भी उन्हीं कंपनियों में ट्रेड करना चाहिए जो फंडामेंटल स्तर पर मजबूत हों। कभी कमज़ोर कंपनियों के स्टॉक्स में ट्रेड न करें। यकीनन, निवेश के लिए दो-तीन साल या ज्यादा का टाइमफ्रेम लेकर चलना पड़ता है। उठना-गिरना शेयर बाज़ार का स्वभाव है। कोरोना का प्रकोप बढ़ा तो बीएसई सेंसेक्स साल 2020 के शुरुआती दो-तीन महीनों में ही 41,000 अंक से गिरते-गिरते 30,000 अंकऔरऔर भी

सरकार विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के निकलने से परेशान हो गई है। इतनी ज्यादा कि अब उसे डैमेज कंट्रोल में उतरना पड़ रहा है। सबसे पहले उसने रिजर्व बैंक से घोषित करवाया कि एफपीआई चाहें तो किसी कंपनी में 10% से ज्यादा के निवेश को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) में बदल सकते हैं। उसका मानना है कि इससे एफपीआई की मुनाफावसूली पर लगाम लग सकती है। फिर सेबी की तरफ से खबर चलवाई गई कि घबराने कीऔरऔर भी

क्या सचमुच भारत की विकासगाथा को कोई आंच नहीं आई है और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) नाहक हमारे शेयर बाज़ार से भागे जा रहे हैं? आज की हकीकत यह है कि पिछले दस सालों में भारत की विकासगाथा अडाणी व अम्बानी जैसे चंद उद्योगपतियों और सरकार से दलाली खा रहे या सत्ताधारी दल को चंदा खिला रहे धंधेबाज़ों तक सिमट कर रह गई है। इस विकासगाथा में देश में सबसे ज्यादा रोज़गार देनेवाले कृषि और मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्रऔरऔर भी

बाज़ार थमने का नाम ही नहीं ले रहा। न जाने कब इस रात की सुबह होगी? यह सवाल आज शेयर बाज़ार के हर निवेशक व ट्रेडर के दिलो-दिमाग में नाच रहा है। हर तरफ घबराहट व अफरातफरी का आलम है। सरकारी अर्थशास्त्री से लेकर शेयर बाज़ार व म्यूचुअल फंड के धंधे में लोग समझाने में लगे हैं कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) का स्वभाव ही संकट में निकल भागने का है। करीब डेढ़ महीने से एफपीआई केऔरऔर भी

आपने अगर रिसर्च के आधार शेयर बाज़ार में निवेश करने की समझ और आदत बना ली तो बहुत अच्छा। तब धीरे-धीरे आपको कंपनियों और उनके धंधे की समझ बढ़ती जाएगी। तब आप उनके मूल्यांकन का गणित भी समझने लगेंगे। शुरू में ही आपको ईपीएस और पी/ई का महत्व पता लगने लगेगा। यह भी थोड़े समय में आप जान जाएंगे कि बैंकिंग व फाइनेंस कंपनियों में ईपीएस और पी/ई नहीं, बल्कि प्रति शेयर बुक वैल्यू (बीपीएस) और पी/बीऔरऔर भी

चार साल पहले कोरोना में फंसने के बाद जबरदस्त शोर मचा कि चीन से दुनिया के तमाम देश दूरी बना रहे हैं और ‘चाइना प्लस वन’ की नीति अपना रहे हैं। इसका सबसे ज्यादा फायदा भारत को मिलेगा। लगा कि भारत अब दुनिया भर में फैले चीन के निर्यात बाज़ार पर कब्ज़ा कर लेगा। लेकिन यह भी मोदी सरकार के देश के भीतर उछाले गए तमाम जुमलों की ही तरह अंतरराष्ट्रीय सब्ज़बाग व बड़बोलापन साबित हुआ। चीनऔरऔर भी

चीन सरकार द्वारा घोषित किया गया 1.4 लाख करोड़ डॉलर का पैकेज़ डेढ़ महीने के भीतर उठाया गया दूसरा बड़ा कदम है। इसका लगभग 60% हिस्सा स्थानीय सरकारों को छिपे हुए ऋणों से मुक्ति दिलाने के लिए है। इससे पहले वहां की सरकार बैंकों के लिए ज्यादा धन और घर खरीदनेवालों को टैक्स में रियायत दे चुकी है। वेल्थ व निवेश प्रबंधन में लगी वैश्विक वित्तीय फर्म नोमुरा का आकलन है कि चीन का वित्तीय प्रोत्साहन पैकेजऔरऔर भी

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के धन का भारतीय शेयर बाज़ार से निकलकर चीन के शेयर बाज़ार में जाने का सिलसिला रुकने के बजाय अब बढ़ सकता है। बीते हफ्ते शुक्रवार को ही चीन की सरकार ने अपनी सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए 10 लाख करोड़ युआन या 1.4 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के प्रोत्साहन पैकेज की घोषणा की है। यह पैकेज कितना बड़ा है, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि हमारी समूचीऔरऔर भी