शेयर बाज़ार और शेयरों के भाव धन के प्रवाह से चलते हैं। धन का प्रवाह लोगों के पास ज़रूरत के ऊपर इफरात धन से बनता है। इफरात धन खत्म तो शेयर बाज़ार भी खत्म। अब चूंकि वित्तीय जगत ग्लोबल हो गया है तो बेहतर रिटर्न की तलाश में दुनिया भर के लोगों का इफरात धन अच्छे अवसरों की खाक छानता फिरता है। ताज़ा उदाहरण है विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) का। जब तक उन्हें लगा कि उनका धनऔरऔर भी

शेयर बाज़ार के निवेशक को न तो परम आशावादी होना चाहिए और न ही चरम निराशावादी। उसे दरअसल घनघोर यथार्थवादी होना चाहिए। आम सामाजिक व राजनीतिक जीवन में जिसे अवसरवादी होना भी कहते हैं। जैसी बहे बयार, पीठ तब तैसी दीजे। लेकिन अवसरवादी होने में नकारात्मकता है, जबकि यथार्थवादी होना सकारात्मक सोच है। जो जैसा है, उसे वैसा ही देखना और स्वीकार करना। शेयर बाज़ार उठता है, गिरता है। फिर उठ जाता है। यह उसका स्वभाव है।औरऔर भी

अमेरिका में ट्रम्प की जीत पर अपना शेयर बाज़ार ऐसा उछला जैसे इससे अर्थव्यवस्था में सुरखाब के पर लग गए हों। लेकिन अगले ही दिन सारा खुमार उतर गया। आईटी शेयरों की चमक भी फीकी पड़ गई। दुनिया जानती है कि ट्रम्प कुछ देता है तो उसके बदले में कहीं ज्यादा वसूल लेता है। यह भी कड़वी हकीकत है कि ट्रम्प के जीत से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारत में वापसी नहीं करने जा रहे। वे तो अर्थव्यवस्थाऔरऔर भी

नामी ब्रोकरेज कंपनी एडेलवाइस सिक्यूरिटीज़ से नुवामा वेल्थ बनी निवेश फर्म ने हाल ही एक रिसर्च रिपोर्ट में इस तथ्य की पुष्टि की है कि भारतीय अर्थव्यवस्था मांग के सुस्त पड़ते जाने के बड़े दौर से गुजर रही है। इसके चलते कॉरपोरेट क्षेत्र के मुनाफे के बढ़ने की दर शीर्ष पर पहुंचने के बाद थमने लगी है और तमाम कोशिशों के बावजूद उसके लाभ मार्जिन घटते जा रहे हैं। नुवामा कोई बाहर की नहीं, बल्कि कॉरपोरेट क्षेत्रऔरऔर भी

मोदी सरकार के राज में जीडीपी से लेकर मुद्रास्फीति और औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) तक का आंकड़ा एकदम अविश्सनीय हो गया है। समझदार लोग इन पर भरोसा नहीं करते। देश के आम आदमी की हालत खराब है, इस प्रत्यक्ष तथ्य को किसी प्रमाण की ज़रूरत नहीं। दिक्कत यह है कि जिस कॉरपोरेट क्षेत्र के कंधे पर सवार होकर यह सरकार भारत को विकसित देश बनाने का सपना बेच रही है, उसके कंधे भी अब दुखने लगे हैं।औरऔर भी

सितंबर में जीएसटी संग्रह 40 महीनों की न्यूनतम दर 6.5% से बढ़कर ₹1.73 लाख करोड़ पर पहुंचा तो सरकार बड़ी मायूस थी। अब अक्टूबर में 8.9% बढ़कर ₹1.87 लाख करोड़ हो गया तो बड़ी गदगद है। यह जुलाई 2017 में जीएसटी के लागू होने के बाद की दूसरी सबसे बड़ी वसूली है। अप्रैल 2014 में सबसे ज्यादा ₹2.10 लाख करोड़ का जीएसटी जमा हुआ था। लेकिन ज्यादा जीएसटी पर चहकना सरकार की उसी तरह की क्रूरता हैऔरऔर भी

देश में आर्थिक विकास का दस साल से बनाया गया तिलिस्म धीरे-धीरे टूट रहा है। अक्टूबर महीने में भले ही त्योहारी सीजन की बिक्री की वजह से जीएसटी संग्रह 8.9% बढ़ गया हो, लेकिन सितंबर में यह 6.5% ही बढ़ा था जो पिछले 40 महीनों का न्यूनतम स्तर था। इसी तरह देश का व्यापार घाटा सितंबर में साल भर पहले के 20.08 अरब डॉलर से बढ़कर 20.78 अरब डॉलर हो गया। यह अगस्त में 29.65 अरब डॉलरऔरऔर भी

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के निकलने से अपना शेयर बाज़ार डूब रहा है या डुबकी लगा रहा है? जवाब है कि बाज़ार कतई डूब नहीं रहा। वो केवल डुबकी लगा रहा है ताकि फिर और ज़ोर-शोर से ज्यादा ठोस धरातल से उछाल मार सके। यह भी साफ होना चाहिए कि सूचकांकों के गिरने से कंपनियां खुद-ब-खुद सस्ती नहीं हो जातीं और न ही उनके शेयर के भाव घट जाने से उनके बिजनेस और मुनाफे की भावी संभावनाऔरऔर भी

देश में सुख-समृद्धि का क्या स्थिति है? कीर्ति और ऐश्वर्य की पताका कहां फहरा रही है? आम लोगों की बात करें तो खाने-पीने की चीजों की महंगाई के चलते अक्टूबर 2024 में औसत भोजन की थाली पिछले साल के इसी महीने की तुलना में 52% महंगी हो गई है, जबकि इस दौरान औसत वेतन और मजदूरी 9-10% ही बढ़ी है। थोड़ा ऊपर बढ़ें तो स्कूटर व मोटरसाइकल की बिक्री 2018-19 में 2.12 करोड़ के शीर्ष पर पहूंचनेऔरऔर भी

अण्णा आंदोलन और उसके बाद हुए सत्ता परिवर्तन के बाद लगा था कि अब देश से भ्रष्टाचार व कालाधन खत्म हो जाएगा। झूठ का नाश हो जाएगा। असत्य हमेशा-हमेशा के लिए हार गया और सत्य की पताका लहराती रहेगी। लेकिन सच क्या है? भ्रष्टाचार ऊपर से लेकर नीचे तक अब भी फैला हुआ है। राफेल से लेकर पेगासस और इलेक्टोरल बॉन्डों तक, फेहरिस्त बड़ी लम्बी है। राजनीति से लेकर अर्थनीति समेत सार्वजनिक जीवन तक में असत्य वऔरऔर भी