हमारी सरकार और उसमें ऊंचे पदों पर बैठे नीति-नियामक किसके लिए नीतियां बनाते हैं, यह इसी बात से साफ हो जाता है कि वे समय-समय पर अर्थव्यवस्था को लेकर जब भी घोषणाएं करते हैं, उसमें बेरोज़गारी का जिक्र भूल-चूक से भी नहीं होता। हालांकि प्रधानमंत्री से लेकर भाजपा के मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों के लिए आजकल विकसित भारत और रोज़गार हर कार्यक्रम में लगाया जानेवाला तड़का बन गया है। पहली अप्रैल से शुरू हो रही नई जनगणना केऔरऔर भी

कोई कुछ भी कहे, लेकिन शेयर बाज़ार का भविष्य बांचने का कोई तरीका नहीं है। अगर ऐसा होता तो हर कोई इस शेर पर सवार होकर शिकार कर रहा होता। तब निवेश की किसी भी रणनीति का कोई मतलब नहीं होता। एक बात समझ लें कि शेयर बाज़ार बड़ा जटिल और पल-पल बदल रहा तंत्र है जिसमें सब कुछ के ऊपर लाखों-लाख लोगों की भावनाएं निर्णायक होती हैं। यह कोई प्रकृति के नियमों पर चलनेवाला सामान्य तंत्रऔरऔर भी

जीडीपी की नई सीरीज़ में केवल आधार वर्ष 2011-12 से बढ़ाकर 2022-23 ही नहीं किया गया है, बल्कि इसमें बेहद बारीक स्तर पर करीब 600 डिफ्लेटर इस्तेमाल किए गए हैं, जबकि पिछली सीरीज़ में मोटे तौर पर ऐसे 180 डिफ्लेटर इस्तेमाल किए जा रहे थे। सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन का कहना है कि इसमें आगे सेवा क्षेत्र के डिफ्लेटर भी जोड़ लिए जाएंगे। लेकिन दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाऔरऔर भी

देश में 1991 के आर्थिक उदारवाद की शुरुआत के तीन-चार साल बाद ही कुछ जन-पक्षधर अर्थशास्त्रियों ने कहा था कि जीडीपी की गणना में कितने भी डिफ्लेटर शामिल कर लिए जाएं और मुद्रास्फीति के प्रभाव को खत्म कर लिया जाए, लेकिन चूंकि वो उत्पादन पर ही ज्यादा फोकस करता है, इसलिए अर्थव्यवस्था की सही तस्वीर नहीं पेश करता। उनका कहना था कि जीडीपी की गणना में उत्पादन और मुद्रास्फीति जितना ही महत्व बेरोज़गारी की स्थिति को दियाऔरऔर भी