सरकार के एजेंडा में नौजवान क्यों नहीं!
विकासशील देश में सरकार का एजेंडा विकास ही हो सकता है। लेकिन किसका विकास? लोकतांत्रिक देश में सरकार और जनता के एजेंडे में कोई फर्क नहीं होना चाहिए। भारत तो दुनिया में सबसे ज्यादा युवा आबादी वाला देश है। सालों-साल से बखाना जा रहा है कि हमारी 65% आबादी 35 साल से नीचे की है। इसे हमारा डेमोग्राफिक डिविडेंड भी कहा जाता है। आखिर फिर क्यों हमारे आर्थिक विकास के केंद्र में नौजवान और उसका रोज़गार नहींऔरऔर भी
न अपनी ही ज़मीं, न ही अपना आसमां!
आज की तारीख बड़ी अहम है। ठीक 95 साल पहले 23 मार्च 1931 को 23-23 साल के ही तीन नौजवानों भगत सिंह, सुखदेव थापर और शिवराम राजगुरु ने ब्रिटिश शासन से मुक्ति दिलाकर भारत का सुंदर भविष्य बनाने के लिए सरकार से माफी मांगने के बजाय फांसी पर चढ़ना कुबूल किया था। भगत सिंह ने फांसी पर चढ़ने के ठीक पहले देशवासियों को एक ही संदेश दिया: साम्राज्यवाद मुर्दाबाद, इंकलाब ज़िंदाबाद। फांसी के ठीक पहले तीनों नेऔरऔर भी
संकट में उभरे हैं कुछ मूल्यवान स्टॉक्स
युद्ध से मध्य-पूर्व ही नहीं, पूरी दुनिया में अफरातफरी मची है। कच्चे तेल का दाम प्रति बैरल 110 डॉलर को पार कर रहा है। भारत अपनी ज़रूरत का 88% कच्चा तेल आयात करता है। डॉलर 94 रुपए तक पहुंच गया है तो हमारा आयात बिल बढ़ता जा रहा है। ऊपर से खाड़ी के देशों में रह रहे करीब 90 लाख भारतीयों द्वारा देश में हर साल भेजे जा रहे 51 अरब डॉलर से ज्यादा की विदेशी मुद्राऔरऔर भी
बोल-वचन नहीं है रेअर अर्थ की चुनौती!
कोई देखता नहीं, कोई पूछता नहीं तो सरकार कुछ भी बोलकर चली जाती है। देश में रेअर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (आरईपीएम) बनाने की ₹7280 करोड़ की नई स्कीम में सात साल के भीतर 6000 टन रेअर अर्थ मैग्नेट प्रतिवर्ष बनाने के लिए पूंजी व प्रोत्साहन दिए जाएंगे। हकीकत यह है कि देश में इस समय सालाना 7000 टन रेअर अर्थ मैग्नेट की खपत होती है। अगर नई स्कीम सफल भी हो गई और साल 2030 तक देशऔरऔर भी






