दस साल पहले देश में आशाओं और आकांक्षाओं के उबाल का दौर था। इसी उबाल को अन्ना आंदोलन ने हवा दी थी और इसी पर सवार होकर 2014 में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी सीधे देश के प्रधानमंत्री बन गए थे। देश के बहुमत को यकीन था कि हम विकास के नए दौर में छलांग लगाने जा रहे हैं। हर साल दो करोड़ नए रोज़गार। हर देशवासी के बैंक खाते में स्विस बैंकों में जमा भारतीयों केऔरऔर भी

त्योहारों का मौसम चलते-चलते दीपावली के पर्व तक आ पहुंचा। आशाओं व आकांक्षाओं के पूरा होने का पर्व। सुख, शांति, समृद्धि, कीर्ति व ऐश्वर्य का पर्व। असत्य पर सत्य की जीत का पर्व। भारतवर्ष में सदियों से चली आ रही परम्परा का पर्व। इसमें सबसे पहले पाली भाषा में कहा गया, “सब्बे सत्ता सुखी होन्तु, सब्बे होन्तु च खेमिनो। सब्बे भद्राणि पस्सन्तु, मा किंचि पाप माग मा, मा किंचि सोक माग मा, मा किंचि दुख माग मा॥”औरऔर भी

एनएसई का निफ्टी-50 सूचकांक 26 मई 2023 से 26 सितंबर 2024 तक के 16 महीनों में 41.71% छलांग लगाने के बाद पिछले एक महीने में ही 7.76% गिर चुका है। वहीं, एक महीने में चीन का शांघाई कम्पोजिट सूचकांक 9.96% बढ़ चुका है। वजह बड़ी साफ है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) भारतीय शेयर बाज़ार से निवेश निकालकर चीन के शेयर बाजार में लगा रहे हैं। लेकिन सवाल उठता है कि क्या अपना बाज़ार एफपीआई के निकलने काऔरऔर भी

क्या विकसित देश का मतलब जीडीपी बढ़ जाना ही होता है? नहीं, इसका वास्ता सकल जीडीपी से नहीं, बल्कि प्रति व्यक्ति जीडीपी या आय से है। विश्व बैंक के मुताबिक विकसित देश की प्रति व्यक्ति आय 13,846 डॉलर से ज्यादा होनी चाहिए। भारत की प्रति व्यक्ति आय इस साल के अंत तक 2396 डॉलर हो सकती है। जाहिर है कि विकसित देश बनने तक भारत का फासला बहुत लम्बा है। लेकिन क्या प्रति व्यक्ति आय हासिल करनेऔरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बेबाकी से झूठ बोलते हैं। यह उनकी आदत, संघी प्रशिक्षण व संस्कार का हिस्सा है। उनके तमाम मंत्री-संत्री तक झूठ बोलते हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण तक बेझिझक झूठ बोल देती हैं। यह हकीकत मोजीराज के दस साल में जगजाहिर हो चुकी है। दिक्कत यह है कि आज रिजर्व बैंक जैसा शीर्ष मौद्रिक संस्थान तक अपने गवर्नर शक्तिकांत दास की अगुआई में झूठ गढ़ने और फैलाने में सिद्धहस्त हो गया है। रिजर्व बैंक बिनाऔरऔर भी

मोदी सरकार ने दस साल के शासन में अर्थव्यवस्था के कुशल वित्तीय प्रबंधन का नगाड़ा बहुत बजाया है। लेकिन हकीकत में यह ढोल के भीतर की पोल और भयंकर कुप्रबंधन है। वित्तीय प्रबंधन का बड़ा सटीक पैमाना होता है राजकोषीय़ घाटा। बीते वित्त वर्ष 2023-24 में तमाम जोड़तोड़ के बावजूद देश का राजकोषीय घाटा जीडीपी का 5.63% रहा है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस पर खूब अपनी पीठ थपथपाई। मगर यह 2012 से 2019 के दौरानऔरऔर भी

देश महज नारों से नहीं चलता। हकीकत देश के सबसे ताकतवर शख्सियत प्रधानमंत्री की भी नहीं सुनती। ऐसा होता तो भारतीय अर्थव्यवस्था अभी 3.5 ट्रिलियन नहीं, 5 ट्रिलियन डॉलर की बन चुकी होती, किसानों की आय दो साल पहले 2022 में ही दोगुनी हो चुकी होती और देश में पिछले दस सालों में 20 करोड़ नए रोज़गार पैदा हो चुके होते। इसलिए भारत को 2047 तक विकसित देश बना देने के नारे की हकीकत हमें समझनी होगी।औरऔर भी

कोई देश अमीर तो कोई देश गरीब क्यों होता है? क्या इसकी वजह भौगोलिक या सांस्कृतिक होती है या कुछ दूसरे कारक इसका फैसला करते हैं? इसका जवाब तलाशते तीन अर्थशास्त्रियों जेम्स रॉबिन्सन, डैरन एसमोग्लू और साइमन जॉनसन को इस बार अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार दिया गया है। इसकी वजह भौगोलिक या सांस्कृतिक नहीं हो सकती। अन्यथा, भारत 18वीं सदी के मध्य तक अमेरिका से अमीर और हमारा औद्योगिक उत्पादन अमेरिका से ज्यादा नहीं होता। नोबेल पुरस्कारऔरऔर भी

यूं तो शेयर बाज़ार की दशा-दिशा और अलग-अलग शेयरों के भाव बहुत सारे कारकों से प्रभावित होते हैं। इनमें घरेलू अर्थव्यवस्था से लेकर वैश्विक अर्थव्यवस्था, खासकर अमेरिका व चीन की स्थिति और उनकी मौद्रिक नीति तक शामिल है। साथ ही एक बड़ा कारक यह है कि बाज़ार या शेयर में धन का प्रवाह या निकासी कैसी चल रही है। इधर माना जा रहा है कि भारत से भागने में लगे विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक हमारे केमिकल क्षेत्र मेंऔरऔर भी

विदेशो पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) भारत छोड़कर भाग रहे हैं और इससे हमारे शेयर बाजार में फिलहाल एक तरह की अफरातफरी मच गई है। इस सच को इनकार करना या इसकी अनदेखी करना ठीक नहीं। यह भी कहना मन को बहलाने जैसा है कि आम निवेशकों की बढ़ती प्रत्यक्ष हिस्सेदारी और म्यूचुअल फंडों के जरिए परोक्ष शिकरत से देशी निवेश इतना मजबूत हो गया है कि विदेशी निवेशकों के निकलने का कोई फर्क नहीं पड़ता। हम एफपीआई काऔरऔर भी