हालात लगातार बदलते हैं। धारणाएं उनका पीछा करती हैं। अगर हम सच्चाई के हिसाब से धारणाएं न बदलें तो समय हमें रौंदकर आगे बढ़ जाता है। इसलिए समय के साथ या उससे आगे चलने के लिए हमें धारणाओं को लगातार अपडेट करते रहना पड़ता है। जैसे, अभी तक माना जाता है कि शेयर बाज़ार में संभावनामय कंपनी चुनकर निवेश करो और 10-15 साल भूल जाओ। इसे ही दीर्घकालिक निवेश माना जाता है। लेकिन पिछले कुछ सालों सेऔरऔर भी

कमाई कम, खर्च ज्यादा। अंतर को पाटने के लिए अमेरिका उधार लेता है। भारत का बाज़ार हिसाब चुकाता है। अमेरिकी सरकार इस साल मेच्योर हो रहे करीब 10 ट्रिलियन डॉलर के बॉन्डों की रिफाइनेंसिंग कर रही है। इनमें से अधिकांश बॉन्ड कोविड के समय तब जारी किए गए थे, जब ब्याज दर काफी कम थी। फेडरल रिजर्व ब्याज दर की रेंज बढ़ाकर 3.75% से 4.00% कर चुका है। अमेरिकी सरकार ज्यादा ब्याज नहीं देगी तो उसके बॉन्डोंऔरऔर भी

बाज़ार गिरता ही जा रहा है। निफ्टी-50 सूचकांक ने इसी साल 2 अप्रैल 2026 को 22,182.55 पर 52 हफ्ते का न्यूनतम स्तर पकड़ा था। इससे साल भर पहले वो 7 अप्रैल 2025 को 21,743.65 तक गिरा था। अभी 1 अक्टूबर 2026 को नीचे में 22,217.30 चला गया। 52 हफ्ते के न्यूनतम स्तर से मात्र 34.75 अंक दूर। हो सकता है कि नए हफ्ते की शुरुआत निफ्टी के नए न्यूनतम स्तर से हो। भारतीय बाज़ार के इस तरहऔरऔर भी

ठीक दो साल पहले हमारा शेयर बाज़ार बम-बम कर रहा था। 26 सितंबर 2024 को बीएसई सेंसेक्स सूचकांक 85,930.43 और 27 सितंबर 2024 को एनएसई निफ्टी-50 सूचकांक 26,277.35 का ऐतिहासिक शिखर छू चुका था। उसके बाद फिर 1 दिसंबर 2025 को सेंसेक्स ने 86,159.02 और उससे महीने भर बाद 5 जनवरी 2026 को निफ्टी-50 ने 26,373.20 पर पुराने शिखर से उठकर नया ऐतिहासिक शिखर बना लिया। इसको तो अभी एक साल भी नहीं बीते हैं। लेकिन सेंसेक्सऔरऔर भी

अनिश्चितता से भरा समय है और अनिश्चितता से ही भरा है शेयर बाज़ार। इस अनिश्चितता से जूझने के लिए जिसने रिस्क लिया, उसने या तो कमाया या अनुभव से थोड़ी समझ और हौसला हासिल किया। जिसने रिस्क नहीं लिया तो धारा के साथ बह गया या बहते-बहते कहीं किनारे लग गया। करना क्या है, यह हर किसी को रिस्क लेने की अपनी क्षमता के हिसाब से तय करना है। शेयर बाज़ार का कोई भरोसा नहीं। बड़ों कोऔरऔर भी

ब्रिक्स का 18वां शिखर सम्मेलन। भारत ने चौथी बार इसकी अध्यक्षता की। इसके पांच मूल सदस्यों – ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन व दक्षिण अफ्रीका में भारत सबसे गरीब है। हमारी प्रति व्यक्ति आय 2550 डॉलर है, जबकि दक्षिण अफ्रीका की 6110 डॉलर, ब्राज़ील की 9930 डॉलर, चीन की 13,660 डॉलर और रूस की 15,160 डॉलर है। विश्व बैंक के जुलाई 2026 के ताजा मानक के मुताबिक 14,375 डॉलर या अधिक प्रति व्यक्ति वाला देश विकसित है, जबकिऔरऔर भी

हफ्ते के पहले दिन सोमवार को घोषित हुआ कि देश के जीडीपी की रीयल या सच्ची विकास दर, महंगाई के असर को खत्म करने के बाद 7.8% रही है। मतलब भारतीय अर्थव्यवस्था पश्चिम एशिया के संकट के बावजूद बमबम कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इसे निजी उपलब्धि बताकर अपनी पीठ थपथपा रहे है। फिर भी हमारा शेयर बाज़ार मायूसी में जकड़ा रहा। हफ्ते के आखिरी ट्रेडिंग दिन, शुक्रवार तक निफ्टी-50 सूचकांक सोमवार के 24,080.40 सेऔरऔर भी

बाज़ार अपना चार महीनों से कदमताल किए जा रहा है। इस साल 29 अप्रैल को निफ्टी-50 सूचकांक 24,177.65 पर बंद हुआ था और अभी 28 अगस्त को 24,175.65 पर है। वहीं, साल के दूसरे दिन 2 जनवरी को यह 26,328.55 पर था, जहां से अब तक 8.18% गिर चुका है। निराशा और पस्ती का आलम है। देशी निवेशक संस्थाएं खासकर म्यूचुअल फंड और बीमा कंपनियां ज्यादा खरीद रही हैं, जबकि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक उनसे कम बेच रहेऔरऔर भी

भारत तमाम गलत व खोखली नीतियों के बावजूद अगर कई सालों से दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है तो मूल वजह इसकी अंतर्निहित सामर्थ्य है। इसलिए यहां शेयर बाज़ार में लम्बे समय का निवेश आनेवाले कई दशकों तक लाभदायी होगा। लेकिन निवेश का पूरा फल पाने के लिए हमें पांच अहम पहलुओं पर गौर करना होता है। पहला, बढ़ती अर्थव्यवस्था में कौन-से उद्योग व सेवा क्षेत्र हैं जो अधिक तेज़ी से बढ़औरऔर भी

बेचनवाले तो गंजे को भी कंघी बेच देते हैं। इस समय शेयरों के निवेश में एआई के कमाल की ऐसी ही बिक्री चल रही है। वॉरेन बफेट, मेरिल लिंच के साथ राकेश झुनझुनवाला की बुद्धि व शैली से कंपनियों का चयन। ऊपर से फंडामेंटल और टेक्निकल एनालिसिस के मेल ‘कैनस्लिम’ का तड़का। देश में लिस्टेड करीब 6000 कपनियों के वित्तीय ही नहीं, गर्वनेंस तक का सारा डेटाबेस। दावा कि राजेश एक्सपोर्ट्स के घोटाले का संकेत एक सालऔरऔर भी