मोदी सरकार यकीनन राजनीति में येनकेन प्रकारेण सत्ता पर अजगरी गिरफ्त बनाए हुए है। लेकिन अर्थव्यवस्था में वो अंधे धृतराष्ट्र की गति को प्राप्त हो चुकी है। वो अपने मुठ्ठी भर प्रिय कॉरपोरेट समूहों के स्वार्थ में इतनी अंधी हो चुकी है कि बाकी उसे कुछ नहीं दिख रहा। अर्थव्यवस्था के सामने दो सबसे बड़ी चुनौतियां हैं उत्पादन या मैन्यूफैक्चरिंग को बढ़ाना और लोगों की क्रय-शक्ति या खपत के आधार को बढ़ाना। देश में खपत का मौजूदाऔरऔर भी

विदेशी निवेशक जितना बेच रहे हैं, देशी निवेशक उतना ही खरीद रहे हैं, फिर भी हमारा शेयर बाज़ार गिरा जा रहा है। बेचने-खरीदने का हिसाब एकदम बराबर। ज़ीरो-सम गेम। फिर भी निवेशकों को 76 लाख करोड़ रुपए का विशालकाय घाटा! याद रखें कि अर्थव्यवस्था काया है तो शेयर बाज़ार उसकी छाया। लेकिन छाया है परछाईं नहीं, जो सूरज के उठने-गिरने के साथ बदलती रहे। 27 सितंबर 2024 को निफ्टी-50 सूचकांक 24.34 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड होऔरऔर भी

कहा जाता है कि जहाज जब डूबने को होता है तो सबसे पहले चूहे निकलकर भागते हैं। यह अलग बात है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के संकट में फंसने का संकेत पाकर हमारे शेयर बाज़ार से निकल भागनेवाले कोई चूहे जैसे पिद्दी नहीं, बल्कि विशाल आकार व प्रभाव वाले विदेशी संस्थागत या पोर्टफोलियो निवेशक (एफआईआई/ एफपीआई) हैं। 27 सितंबर 2024 से 14 फरवरी 2025 तक वे हमारे शेयर बाज़ार के कैश सेगमेंट से ₹2.01 लाख करोड़ निकाल चुकेऔरऔर भी

अपने यहां रोज़गार पर स्थिति बड़ी कारुणिक है। दुष्यंत कुमार के शब्दों में, “न हो क़मीज़ तो पांवों से पेट ढक लेंगे, कितने मुनासिब हैं ये लोग इस सफ़र के लिए।” यहां बिरले लोग ही बताते हैं कि उनके पास कोई रोज़गार नहीं है। जिससे भी पूछो, वो बताएगा कि वो कोई न कोई काम-धंधा कर रहा है। गांवों में महिलाओं से पूछो तो वे बताती है कि घर के कामकाज में हाथ बंटाती हैं। सरकारी सर्वेक्षणऔरऔर भी

भारत को गरीब मुल्क होने की दुर्दशा से निकालना है तो बड़े पैमाने पर सार्थक रोज़गार पैदा करने होंगे। इस साल की आर्थिक समीक्षा में बड़ी साफगोई से कहा गया है कि भारत को 2030 तक हर साल कृषि से बाहर 78.5 लाख रोज़गार पैदा करने होंगे। सरकार का ताज़ा आवधिक श्रमबल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) जुलाई 2023 से जून 2024 तक की अवधि के लिए किया गया था। इसके मुताबिक कृषि में हमारा 46% श्रमबल लगा हुआ है।औरऔर भी

फोर्ब्स पत्रिका के अनुसार इस समय ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था का आकार या जीडीपी 3.73 ट्रिलियन डॉलर है। वहीं, हमारे राष्ट्रीय सांख्यिकी संगठन (एनएसओ) के ताज़ा अनुमान और नए बजट के मुताबिक मार्च 2025 में समाप्त हो रहे वित्त वर्ष 2024-25 में भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार या जीडीपी ₹324.11 लाख करोड़ का रहेगा। इसे 86.69 रुपए प्रति डॉलर की विनिमय दर पर निकालें तो यह 3.74 ट्रिलियन डॉलर बनता है। दूसरे शब्दों में अब भी भारत दुनिया कीऔरऔर भी

हमें जीडीपी के विकास दर के झांसे को कायदे से समझना होगा। एक तो यह है कि साल के शुरू में विकास दर का बजट अनुमान होता है, जो तीन तिमाही बाद संशोधित अनुमान तक और फिर साल बीतने पर वास्तविक दर तक पहुंच जाता है। दूसरा यह है कि हमेशा विकास की एक नॉमिनल दर या सतही दर होती है जिसे मौजूदा मूल्यों पर निकाला जाता है। नॉमिनल विकास दर को जब मुद्रास्फीति के असर कोऔरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लम्बी-लम्बी फेंकने में माहिर व जगजाहिर हैं तो उनकी सरकार आर्थिक विकास तक में हांकने की उस्ताद बनी हुई है। जब से मोदी सरकार ने देश की सत्ता संभाली है, तब से पेश किए गए 11 बजट में से तीन (2020-21, 2021-22 और 2022-23) को कोरोना महामारी से प्रभावित और एक (2016-17) को अपवाद मानकर छोड़ दें तो बाकी सात में उसने जीडीपी की नॉमिनल विकास दर का जो अनुमान लगाया था, वास्तविक याऔरऔर भी

इस बार की आर्थिक समीक्षा में बताया गया है कि वित्त वर्ष 2023-24 में वेतनभोगी व स्वरोजगार में लगे पुरुष व महिला, दोनों ही श्रमिकों का असल मासिक वेतन कोरोना महामारी के दो साल पहले के वित्त वर्ष 2017-18 के स्तर से भी कम रहा है। असल स्थिति सतही या नॉमिनल स्थिति से मुद्रास्फीति का असर मिटाकर निकाली जाती है। आर्थिक समीक्षा में बताया गया है कि 2017-18 में पुरुष श्रमिक का असल औसत मासिक वेतन ₹12,665औरऔर भी

इस समय केंद्र में सत्तारूढ़ दल पर जनधन को लूटने की अंधी हवस सवार है। वो बड़े राज्यों ही नहीं, छोटे राज्यों व केंद्र-शासित क्षेत्रों तक में येन-केन प्रकारेण सरकार बनाने में लगी रहती है। जहां धार्मिक ध्रुवीकरण या धांधली व गुंडागर्दी से चुनकर सत्ता में नहीं आती, वहां विधायकों की खरीद-फरोख्त से सरकार बना लेती है। लेकिन उसका यह राजनीतिक चरित्र देश की अर्थनीति के लिए घातक बनता जा रहा है। देश की अर्थव्यवस्था इस समयऔरऔर भी