देश में पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक विकास हो रहा है। सड़कें बन रही हैं। चकाचक हाईवे बने जा रहे हैं। पुल बन रहे हैं। हवाई अड्डे बन रहे हैं। बंदरगाह विकसित हो रहे हैं। शहर-शहर मेट्रो चलने लगी हैं। जम्मू-कश्मीर में दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे आर्क पुल 22 साल में बनकर चालू हो गया। जो दिखता है वो बिकता है। जो नहीं दिखता, वो गोपनीय है। विकास के ठेकों पर कमीशन बढ़ते-बढ़तेऔरऔर भी

सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन का कहना है कि रुपए को और गिरने से रोकना बेहद ज़रूरी है। लेकिन रुपया डॉलर के मुकाबले बेरोकटोक गिरता ही जा रहा है, भले ही डॉलर सूचकांक बढ़े या गिरे। डॉलर सूचकांक इस साल जनवरी में 98.25 हुआ करता था। मार्च अंत में 100.59 हो गया। अब फिर 98.80 हो गया है। लेकिन रुपया केवल गिरना जानता है। वो जनवरी में औसतन प्रति डॉलर 90.73 का हुआ करताऔरऔर भी

निजी स्वार्थ में डूबा आत्मविभोर व्यक्ति सत्ताशीर्ष पर बैठकर देश-दुनिया का कितना नुकसान कर सकता है, इसे पश्चिम एशिया के वर्तमान संकट ने साबित कर दिया है। प्रधानंमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25-26 फरवरी को जेरूसलम जाकर फर्जी मेडल के चक्कर में ‘फादरलैंड’ कहकर इज़रायल को सिर न चढ़ाया होता तो शायद अमेरिका के साथ मिलकर 28 फरवरी को ईरान पर हमला करने की उसकी हिम्मत ही नहीं पड़ती। इस हमले के बाद ब्रेन्ट कच्चे तेल के दामऔरऔर भी

इधर मोदी का राजनीतिक विजय-रथ आसमान का रुख किए हुए है, उधर भारतीय रुपया रसातल में डूबता बराबर नई-नई तलहटी पकड़ता जा रहा है। आज एक डॉलर 95.91 रुपए और यूरो 112.27 रुपए पर जा पहुंचा। कमाल की बात यह है कि जनवरी 2025 से फरवरी 2026 तक जब रुपया खाक बनता जा रहा था, तब सरकारी और निजी अर्थशास्त्रियों ने कहा था कि भारत ‘गोल्डीलॉक्स’ अवस्था से गुजर रहा है, जहां आगे सब अच्छा ही अच्छाऔरऔर भी

दुनिया में छिड़े युद्ध जैसे बाहरी कारक और देश के भीतर मुद्रास्फीति, चालू खाते व पूंजी खाते जैसे घरेलू कारक यकीनन रुपए के गिरने की वजह बनते हैं। लेकिन हमें इस बार रुपए के लगातार गिरते जाने की वजह को समझने के लिए दूसरे कारकों पर भी गौर करना होगा। ध्यान दें कि जनवरी से दिसंबर 2025 तक दुनिया की छह मुद्राओं की बास्केट के सापेक्ष डॉलर की शक्ति को नापनेवाला डॉलर सूचकांक 108.09 से गिरकर 98.25औरऔर भी

हमारा रुपया हाथ से निकल चुका है। अब इसे भारतीय रिजर्व बैंक का कोई हस्तक्षेप ज्यादा गिरने से नहीं रोक सकता। वैसे रिजर्व बैंक खुद कहता रहा है कि वो विदेशी मुद्रा बाज़ार में तभी हस्तक्षेप करता है, जब रुपया ज्यादा ही चपल व चंचल हो जाता है। वो इसकी इस वोलैटिलिटी को रोकने के लिए विदेशी मुद्रा के स्पॉट और फॉरवर्ड बाज़ार, दोनों में डॉलर बेचता है। लेकिन न तो वो देश से विदेशी निवेशकों केऔरऔर भी

ताजा खबर है कि भारतीय कंपनियां अमेरिका में 20.5 अरब डॉलर का पूंजी निवेश करने जा रही है। असल में देश में पूंजी आने के बजाय इसी तरह लगातार बाहर जा रही है। हमारा शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) वित्त वर्ष 2024-25 में मात्र 35.3 करोड़ डॉलर रहा है, जबकि इससे पहले वित्त वर्ष 2023-24 में यह 1010 करोड़ डॉलर रहा था। साल भर में 96.5% की भारी कमी। इधर दिसंबर 2025 तक लगातार चार महीने शुद्धऔरऔर भी

साल 2013 में जब आईएमएफ ने भारत, इंडोनेशिया, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका और तुर्किए को दुनिया की पांच फ्रेज़ाइल या भंगुर अर्थव्यवस्थाएं कहा था, तब जनवरी से सितंबर के बीच डॉलर के सापेक्ष भारतीय रुपया 12%, इंडोनेशिया का रुपैया 15.4%, दक्षिण अफ्रीका का रैंड 14.4%, तुर्किए का लीरा 9.9% और ब्राज़ील का रियाल 7.6% गिरा है। वहीं, इस बार पिछले 12 महीनों में डॉलर के मुकाबले रुपया 12.09%, तुर्किए का लीरा 17.17% और इंडोनेशिया का रुपैया 4.33% कमज़ोरऔरऔर भी

अर्थव्यवस्था संसद या विधानसभा का चुनाव नहीं, जिसे तंत्र की ताकत और जोड़-तोड़ से जीत लिया जाए। न ही यह किसी जादूगर का सम्मोहन है जिसमें सारी भीड़ को एक साथ मदमस्त कर नचा लिया जाए। लेकिन मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन को लगता है कि उनके पास ऐसी सम्मोहनी शक्ति है जिससे वे भारतीय अवाम की आंखों में धूल झोंक सकते हैं। उन्होंने पिछले ही हफ्ते आईआईटी मद्रास में इंजीनियरिंग के छात्रोंऔरऔर भी

अर्थव्यवस्था का पचका हो जाए तो देश का आम जनजीवन और रोज़ी-रोज़गार थरथरा जाता है। सात साल से यही हो रहा है। वित्त वर्ष 2018-19 से 2025-26 तक के सात सालों में हमारा रीयल जीडीपी मात्र 5.4% की सालाना चक्रवृद्धि दर (सीएजीआर) से बढ़ा है। 2013-14 से 2025-26 तक के 12 साल के मोदीकाल में भी यह दर 6.2% ही रही है। हालांकि सरकार कोरोना की डुबकी के बाद पिछले दो-तीन की विकास दर की चकाचौंध दिखानेऔरऔर भी