हम सभी खुद को सबसे बुद्धिमान और तार्किक समझते हैं। दूसरों की बात या तो खारिज कर देते हैं या तभी मानते हैं, जब वो हमारी राय को पुष्ट करती है। शेयर बाज़ार में भी यही चलता है। तेज़ी की सोचवाले तेज़ी और मंदी की सोचवाले मंदी को तरजीह देते हैं। सावन के अंधे को सब हरा ही हरा दिखता है। लेकिन याद रखें कि हम जैसा सोचते हैं, वैसा दूसरे भी सोचें, यह कतई ज़रूरी नहीं।औरऔर भी

चीन में टेक्नोल़ॉज़ी कंपनियों के शेयर पिटते रहे। हमें लगा कि भारत में कुछ नहीं होगा। लेकिन पहले ज़ोमैटो, पेटीएम व नाइका जैसी कंपनियों के आईपीओ में और उसके बाद भी निवेशकों को तगड़ी मार लगी। अब भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) के सबसे बड़े आईपीओ ने लिस्टिंग पर लाखों निवेशकों व कंपनी कर्मचारियों का नुकसान कराया है। इसने एक तो पुष्ट कर दिया कि आज के दौर में आम निवेशकों को किसी कंपनी का शेयर आईपीओऔरऔर भी

अक्टूबर में शेयर बाज़ार जब बम-बम कर रहा था, तब किसी को ज़रा-सा भी अदेशा नहीं था कि कुछ महीने बाद ही अच्छी-अच्छी कंपनियों का कचूमर निकलने जा रहा है। लेकिन विदेशी संस्थागत निवेशकों को कहीं न कहीं से आभास हो गया था कि आगे बाज़ार इतना सुनहरा व सुहावना नहीं रहेगा। उन्होंने तभी से मुनाफावसूली कर दी। फिर भी हमारे एक्सपर्ट भविष्यवाणी करते रहे कि निफ्टी और सेंसेक्स नई रिकॉर्ड ऊंचाई पकड़ने जा रहे हैं। क्याऔरऔर भी

जिन विदेशी निवेशकों (एफआईआई) को भारतीय शेयर बाजार का मूलाधार माना गया है, वे ही भाग रहे हैं तो बाज़ार को बचाएगा कौन? यकीनन, म्यूचुअल फंड, एलआईसी, बीमा कंपनियां और बैंक जैसी देशी निवेशक संस्थाएं (डीआईआई) अपनी खरीद से विदेशी बिकवाली को बेअसर करने की कोशिश करती हैं। लेकिन विदेशी संस्थाओं के आगे उनकी साझा ताकत भी कहीं नहीं टिकती। इधर डॉलर के मुकाबले गिरते जा रहे रुपए ने विदेशी निवेशकों की घबराहट और बढ़ा दी हैऔरऔर भी

भारतीय शेयर बाज़ार की नब्ज़ बतानेवाला निफ्टी-50 सूचकांक 19 अक्टूबर 2021 को 18,604.45 का ऐतिहासिक शिखर पकड़ने के बाद अब तक 2864 अंक या 15.39% लुढ़क चुका है। इसी दौरान विदेशी संस्थागत या पोर्टफोलियो निवेशकों (एफआईआई/ एफपीआई) ने बाज़ार के कैश सेगमेंट से शुद्ध रूप से 2,51,839 करोड़ रुपए निकाल चुके हैं। सेबी की तरफ से एनएसडीएल चूंकि एक दिन पहले का ही डेटा लेती है, इसलिए 13 मई का कच्चा डेटा जोड़ लें तो बीते हफ्तेऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में निवेश व ट्रेडिग के रिस्क को जड़ से नहीं मिटाया जा सकता। मिट गया तो यहां निवेश करना सरकारी बॉन्डों में धन लगाने जैसा हो जाएगा। लेकिन रिस्क कम हो जाने से रिटर्न भी कम हो जाएगा। हां, शेयर बाज़ार के रिस्क को कम से कम ज़रूर किया जा सकता है। साफ समझ बना लें कि रिस्क ऐसा दुश्मन है जो कभी सामने से नहीं, हमेशा पीछे से वार करता है। वो खुलकर नहीं,औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग में हमेशा सामनेवाले का स्वभाव, उसके एक्शन का पैटर्न समझना ज़रूरी है। लेकिन रिस्क को न्यूनतम करना है तो सबसे पहले अपने स्वभाव व पैटर्न की कमियां खत्म करनी होंगी। रिटेल निवेशकों व ट्रेडरों में अक्सर एक आदत यह देखी गई है कि वे बड़ी नहीं, छोटी कंपनियों के पीछे भागते हैं। दूसरे, उन्हें कैश काटता है। उन्हें किसी लती जुआरी की तरह ट्रेडिंग का नशा होता है। वे हर दिन कोई नऔरऔर भी

रिस्क को कैसे समझें और कैसे उसे न्यूनतम करें? यह निवेश और ट्रेड करनेवालों के लिए पहली और सबसे बड़ी चुनौती है। इससे निपट लेने के बाद दूसरी चुनौती यह आती है कि न्यूनतमं रिस्क उठाते हुए शेयर बाज़ार से अधिकतम रिटर्न कैसे हासिल करें? सबसे पहले, पहली चुनौती। रिस्क शेयर बाज़ार के सौदों मे नहीं होता, बल्कि इसमें जो लोग भाग ले रहे हैं उनके बर्ताव, उनके व्यवहार, उनके स्वभाव में होता है। माइक्रोस्कोप लेकर भीऔरऔर भी

तमाम एनालिस्ट सारी सलाहों के बाद डिस्क्लेमर लगाते हैं कि उन्होंने जिन स्टॉक्स की चर्चा की, उनमें उनका कोई एक्सपोज़र या निवेश नहीं है। दरअसल, वे शेयर बाज़ार के रिस्क से घबराकर किसी स्टॉक में धन लगाने का जोखिम ही नहीं उठाते। उसी तरह जैसे हलवाई अपनी बनाई मिठाई चखता है, लेकिन खाता नहीं और रेस्टोरेंट वाला रेस्टोरेंट से नहीं, घर से खाना मंगाकर खाता है। दूसरों को कहते फिरते हैं कि चढ़ जा बेटा शूली पर,औरऔर भी

यूं तो पूरा जीवन ही रिस्क से भरा पड़ा है। लेकिन शेयर बाज़ार एक ऐसी जगह है जहां रिस्क ही रिस्क है। किसी को नहीं पता कि आगे क्या हो सकता है। फिर भी कयासबाज़ी चलती है। इतनी ज्यादा कि कयासबाज़ी अपने-आप में शेयर बाज़ार से जुड़ा धंधा बन गई है। बिजनेस न्यूज़ चैनलों पर आनेवाले एनालिस्ट, अखबारों में निवेश पर कॉलम लिखनेवाले विशेषज्ञ और ब्लॉग से लेकर वेबसाइट चलानेवाले रिसर्च एनालिस्ट, सभी के सभी मूलतः कयासबाज़ीऔरऔर भी