ट्रेडर भागते हैं तो निवेशक संभाल लेते हैं और निवेशक भागते हैं तो ट्रेडर आगे आ जाते हैं। शायद यही वजह है कि अपने यहां अक्टूबर 2021 से विदेशी पोर्टपोलियो निवेशकों के बराबर निकलते रहने के बावजूद शेयर बाज़ार धराशाई नहीं हुआ। भारतीय निवेशकों व ट्रेडरों में अभी तक कहीं न कहीं आस बची हुई है। अमूमन, जब हर तरह के निवेशकों व ट्रेडरों पर तेज़ी का सुरूर सवार हो जाता है, तब तेजी का नया दौरऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में कभी-कभी छोटी अवधि के ट्रेडरों के साथ ही लम्बे समय के निवेशक भी खरीद रहे होते हैं। अपने यहां एकाध महीने से शायद कुछ ऐसा ही हो रहा है। लेकिन ऐसा ज्यादा नहीं चल सकता। इसका स्पष्ट संकेत देती है डेरिवेटिव सेगमेंट में इस्तेमाल की जा रही मार्केट वाइड पोजिशन लिमिट (MWPL), जो बराबर स्वीकृत सीमा के 12-15% के बीच ही झूल रही है। यह दिखाती है कि ट्रेडर अब भी पोजिशन लेने याऔरऔर भी

निवेश की दुनिया भांति-भांति के निवेशकों से भरी पड़ी है। निवेशक भी एक तरह के ट्रेडर हैं और ट्रेडर भी एक तरह के निवेशक। केवल साल-महीने और दिनों का ही तो फर्क है। ऊपर से आज समूची दुनिया के शेयर बाज़ार एक ही डोर में बंध चुके हैं। अमेरिका से निकला धन, वहां के शेयर बाज़ार से उठी लहर यूरोप, एशिया और ऑस्ट्रेलिया तक को अपने लपेटे में ले लेती है। अमेरिकी शेयर बाज़ार की गिरावट याऔरऔर भी

भारत में यूरोपीय देशों जैसी सामाजिक सुरक्षा होती तो आम लोगों को बचत के लिए मगज़मारी नहीं करनी पड़ती। ऊपर से वहां की सरकारें टैक्स का धन अवाम को संकट से बचाने के लिए खर्च करती हैं, जबकि अपने यहां सरकार हर आपदा में टैक्स बढ़ाने के अवसर खोजती है। कच्चे तेल के दाम पिछले आठ साल में बराबर घटते रहे। इधर बढ़ने के बावजूद 2014 से कम हैं। फिर भी हमारी सरकार ने पेट्रोल-डीज़ल व रसोईऔरऔर भी

हमारा शेयर बाजार जिस तरह बढ़ते-बढ़ते गिरने लगा है और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक खरीदते-खरीदते बेचने लगे हैं, उसमें ऐसी कोई उम्मीद नहीं बनती कि निफ्टी-50 जल्दी ही नया शिखर बनाने जा रहा है? वैसे भी जब तक रिटेल ट्रेडरों का भरोसा बाज़ार में नहीं बनता और निवेशक मौका पाते ही मुनाफा निकालने लगते हैं, तब तक बाज़ार में कोई भी तेज़ी लम्बी नहीं खिंच सकती। लेकिन बाज़ार में एक सिद्धांत और चलता है कि जब रिटेल ट्रेडरऔरऔर भी

अपने यहां मार्च 2020 में कोरोना के क्रैश के बाद शेयर बाज़ार में तेज़ी का जो दौर शुरू हुआ, उसमें रिटेल निवेशक झूमकर बाज़ार में आए। उन्हें गहरा यकीन था कि बाज़ार को बढ़ना ही बढ़ना है। इस दौरान जब भी बाज़ार गिरा, उन्होंने खरीद बढ़ा दी। उनकी यह पहल मुख्य रूप से म्यूचुअल फंडों की इक्विटी स्कीमों के ज़रिए हुई। इसमें इतना दम था कि विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की बिकवाली को वह पचाती गई। अबऔरऔर भी

शेयर बाज़ार का शीर्ष सूचकांक निफ्टी-50 अक्टूबर 2021 में हासिल शिखर से अभी 7.46% दूर है। असल में वह जब भी चढ़ता है, मुनाफावसूली का दबाव उसे नीचे खींच लेता है। यह कोई असहज या बुरी बात नहीं क्योंकि शेयर बाज़ार में हर कोई कमाने ही आया है और महीनों बाद जब ज्यादा भाव पाने का मौका आया है तो क्यों चूके? ऐसे भी लोग बेच रहे हैं जिन्होंने अक्टूबर 2021 में निफ्टी के शिखर के आसपासऔरऔर भी

देश की सबसे बड़ी व सक्रिय 50 कंपनियों और भारतीय शेयर बाज़ार की नुमाइंदगी करनेवाला निफ्टी-50 सूचकांक इस साल 15 जुलाई के बाद से 26 अगस्त तक 9.41% बढ़ चुका है। यह वही अवधि है जब विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने अक्टूबर 2021 से हमारे शेयर बाज़ार में खरीदने से ज्यादा बेचने का सिलसिला रोककर बेचने से ज्यादा खरीदने का क्रम शुरू किया है। इस दौरान उन्होंने हमारे शेयर बाज़ार के कैश सेगमेंट में 22,312.40 करोड़ रुपएऔरऔर भी

हमारे शेयर बाजार में देशी-विदेशी बड़ा धन कभी ऑटो शेयरों को फर्श से अर्श तक पहुंचा देता है तो कभी आईटी स्टॉक्स की मिट्टी पलीद कर देता है, जमी-जमाई फाइनेंस कंपनियों को ज़मींदोज़ कर देता है तो सरकारी बैंकों को सिर चढ़ा लेता है। लेकिन अंततः उन उद्योग-धंधों के शेयर बढ़ते ज़रूर हैं, जहां संभावनाएं व्यापक होती हैं। ऐसा ही एक क्षेत्र है कृषि। भारत की आबादी दुनिया की लगभग 18% हो चुकी है। संयुक्त राष्ट्र कीऔरऔर भी

जिस तरह हर तरह के बिजनेस या व्यापार की लागत होती है, उसी तरह शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग करने की भी स्पष्ट लागत है जिससे कोई बच नहीं सकता। स्थाई लागत तो हर कोई जानता है जिसमें कंप्यूटर, लैपटॉप या मोबाइल फोन, वाई-फाई या इंटरनेट कनेक्शन, घर-ऑफिस, ब्रोकरेज़ और एसटीटी वगैरह का खर्च शामिल है। लेकिन इसके अलावा पूंजी की लागत से अक्सर लोग आंख मूंद लेते हैं। इसमें एक है मुद्रास्फीति और दूसरी खास लागत हैऔरऔर भी