सरकार के लिए थोड़े सुकून की बात की है कि 12 नवंबर को समाप्त सप्ताह में खाद्य मुद्रास्फीति की दर दहाई अंक के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे 9.01 फीसदी पर आ गई। यह पिछले नौ हफ्तों का न्यूनतम स्तर है। वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने इन आंकड़ों के जारी होने के बाद कहा कि अगर खाद्य वस्तुओं के दाम में गिरावट का यही रुख रहा तो मुद्रास्फीति में कमी आ सकती है। वित्त मंत्री के शब्दों में,औरऔर भी

केंद्रीय वित्‍त मंत्री प्रणव मुखर्जी मंगलवार को संसद के शीत सत्र के पहले दिन खुद की पहल पर लोकसभा को मुद्रास्फीति का गणित समझाते नजर आए। उन्होंने सांसदों को समझाया कि मुद्रास्‍फीति मांग और आपूर्ति में असंतुलन के कारण पैदा होती है। तेजी से होने वाली आर्थिक वृद्धि और ढांचागत परिवर्तन के दौर में, जिससे इस समय भारत गुजर रहा है, मुद्रास्‍फीति का बढ़ना स्‍वाभाविक है। उन्‍होंने कहा कि हमने सभी उभरती हुई अर्थव्‍यवस्‍थाओं में इसे होतेऔरऔर भी

इसे बढ़ी हुई ब्याज दरों का असर कहें या औद्योगिक सुस्ती का नतीजा, लेकिन आंकड़े गवाह हैं कि इस साल औद्योगिक क्षेत्र को बैंकों से मिले ऋण में अभी तक पिछले साल के मुकाबले 55,138 करोड़ रुपए कम बढ़त हुई है। चालू वित्त वर्ष 2011-12 में 4 नवंबर तक बैंकों द्वारा दिया गया गैर-खाद्य ऋण या दूसरे शब्दों में मैन्यूफैक्चरिंग व उपभोक्ता क्षेत्र को दिया गया ऋण 2,25,211 करोड़ रुपए बढ़ा है, जबकि बीते वित्त वर्ष 2010-11औरऔर भी

अक्टूबर माह में सकल मुद्रास्फीति की दर उम्मीद से बदतर ही रही है। माना जा रहा था कि शायद इसमें कुछ कमी आएगी। लेकिन सोमवार को केंद्रीय वाणिज्य व उद्योग मंत्रालय की तरफ से जारी आंकड़ों के अनुसार थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति की दर 9.73 फीसदी रही है। यह सितंबर में 9.72 फीसदी थी। नोट करने की बात है कि लगातार पिछले ग्यारह महीनों से मुद्रास्फीति की दर नौ फीसदी से ज्यादा चल रही है।औरऔर भी

पिछले बीस महीनों से कसते ब्याज दर के फंदे ने भले ही मुद्रास्फीति का बालबांका न किया हो, लेकिन औद्योगिक विकास का गला जरूर कस दिया है। खदानों, फैक्टरियों और सेवा क्षेत्र से मिले ताजा आंकड़ों के अनुसार औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) में मात्र 1.81 फीसदी की वृद्धि हुई है, जबकि जानकारों का औसत अनुमान 3.5 फीसदी का था। यह सितंबर 2009 के बाद पिछले दो सालों की न्यूनतम औद्योगिक वृद्धि दर है। सितंबर 2010 में आईआईपीऔरऔर भी

एक हाथ जब दूसरे हाथ की ही फजीहत करने लग जाए तो इसे आप क्या कहेंगे? लेकिन अपनी सरकार का यही हाल है। एक तरफ रिजर्व बैंक महंगाई रोकने के लिए अपनी तरफ से हरसंभव उपाय किए जा रहा है, दूसरी तरफ वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु कह रहे हैं कि रिजर्व बैंक ने महंगाई रोकने के लिए परंपरागत किताबी उपायों को ही आजमाया है। इसलिए ये उपाय काम नहीं आए। मजे की बातऔरऔर भी

वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने शुक्रवार को कहा कि पेट्रोल की कीमतों में हाल की वृद्धि का मुद्रास्फीति पर कुछ असर पड़ेगा। सकल मुद्रास्फीति दहाई अंक के करीब पहंच चुकी है। उन्होंने राजधानी दिल्ली में संवाददाताओं से कहा कि निश्चित रूप से मुद्रास्फीति पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ेगा। लेकिन तेल कीमतें ऊपर जा रही है और पेट्रोल नियंत्रण-मुक्त है। यह पूछे जाने पर कि कीमत वृद्धि को लेकर सरकार की सहयोगी दलों को अंधेरे में क्यों रखाऔरऔर भी

बाजार चूंकि निफ्टी में 200 दिनों के मूविंग औसत (डीएमए) 5408 को नहीं पार कर सका, इसलिए थोड़ा दम मारना लाजिमी था। इसी के अनुरूप बाजार सुबह 5310.85 पर पहुंचने के बाद जो गिरना शुरू हुआ तो यह गिरता ही चला गया। अंत में 1.37 फीसदी की गिरावट के साथ 5253.75 पर बंद हुआ है। यह और कुछ नहीं, बल्कि बाजार का खुद को जमाने का उपक्रम है। इस प्रक्रिया में निफ्टी बहुत नीचे गया तो फिरऔरऔर भी

सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती मुद्रास्‍फीति को काबू में रखकर ऊंची विकास दर को बराबर बनाए रखना है। यह मानना है कि हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का। उन्होंने रविवार को राजधानी दिल्ली में राज्यपालों के सम्मेलन में कहा कि हाल के महीनों में खाद्य वस्‍तुओं की कीमतों का बढ़ना चिंता का मसला है। उन्‍होंने कहा कि‍ सरकार और रि‍जर्व बैंक मुद्रास्‍फीति‍ को कम करने के लि‍ए वि‍त्‍तीय और मौद्रि‍क उपाय जारी रखेंगे। रिजर्व बैंक मार्चऔरऔर भी

रिजर्व बैंक गवर्नर डी सुब्बाराव का मानना है कि मुद्रास्फीति पर काबू पाना न केवल निकट भविष्य में, बल्कि लंबे समय में भी आर्थिक विकास की संभावनाओं को बेहतर बनाने के लिए जरूरी है। इसी सोच के तहत उन्होंने मौद्रिक नीति की दूसरी तिमाही समीक्षा में पंचों की राय के मुताबिक ब्याज दरों को 0.25 फीसदी बढ़ा दिया। अब तत्काल प्रभाव से रेपो दर बढ़कर 8.50 फीसदी हो गई है। इसके अनुरूप रिवर्स रेपो दर 7.50 फीसदीऔरऔर भी