विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद बड़ी आशा व उम्मीद के साथ भारतीय शेयर बाज़ार में वित्त वर्ष 2015-16 से 2023-24 तक शुद्ध रूप से 50.5 अरब डॉलर का निवेश किया। इसमें से अकेले 37.03 अरब डॉलर का शुद्ध निवेश उन्होंने कोरोना महामारी के दौरान वित्त वर्ष 2020-21 में किया। उसके बाद धीरे-धीरे उनकी आशा निराशा में बदलती गई। वो भी तब, जब 2022-23 को आधार वर्ष बनाने के बाद जीडीपी की रीयल विकास दर वित्त वर्ष 2023-24 में 7.2%, वित्त वर्ष 2024-25 में 7.1% और अभी 2025-26 में7.7% निकाली गई है। सरकारी डेटा बताता है कि अप्रैल 2024 से अब तक एफपीआई हमारे बाज़ार से शुद्ध रूप से 48.74 अरब डॉलर निकाल चुके हैं। यानी, आठ साल में उन्होंने जितना लगाया था, करीब-करीब उतना दो साल में निकाल चुके हैं। अब हाथी की पूंछ के रूप में 1.76 अरब डॉलर ही बचे हैं। सरकार को लगता है कि यह तात्कालिक मसला है। ईरान युद्ध खत्म होते ही सब सामान्य हो जाएगा। साथ ही उसने एफपीआई निवेश पर 12.5% लॉन्ग टर्म और 30% शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स खत्म कर दिया है। हम देंगे पूरा टैक्स, विदेशी कुछ नहीं! अब तथास्तु में आज की कंपनी…
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