समय की रिले रेस जारी है। साल 2022 बैटन साल 2023 के हाथों में सौंपकर कट लिया। पूरे साल के दौरान 3 जनवरी से 30 दिसंबर तक निफ्टी मात्र 2.72% और सेंसेक्स 2.80% बढ़ा है। वैसे, भारतीय शेयर बाज़ार के इतिहास में दूसरी बार शीर्ष सूचकांक लगातार सात साल बढ़े हैं। पहली बार ऐसा 1988 से 1994 तक हुआ था। लेकिन अगले ही साल 1995 में सेंसेक्स 20.79% टूट गया था। साल 2008 की वैश्विक मंदी सेऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में साल 2022 की ट्रेडिंग का अंतिम दिन। वैसे यह साल ऐतिहासिक चुनौतियों से भरा साल रहा। विश्व स्तर पर 50 सालों की सबसे ज्यादा मुद्रास्फीति। लगभग 40 सालों में ब्याज दरें बढ़ाने का सबसे ज्यादा कठिन कठोर सिलसिला। 20 सालों में अमेरिकी डॉलर की सबसे ज्यादा मजबूती और दुनिया की तमाम मुद्राओं की हालत उसके आगे खराब होते जाना। साथ ही दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन में 45 सालों से ज्यादा अवधिऔरऔर भी

साल के अंत में फुरसत से समीक्षा करने की ज़रूरत है कि ट्रेडिंग में क्या पाया और क्यों गंवाया। साथ ही सतर्कता भी चाहिए कि शेयर बाज़ार के प्रमुख खिलाड़ी क्या कर रहे हैं, खासकर विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) और म्यूचुअल फंडों की सक्रियता क्या है? ताज़ा जानकारी के मुताबिक म्यूचुअल फंडों में एसआईपी के जरिए नियमित धन करनेवाले निवेशकों ने सितबंर से नवंबर तक के तीन महीनों में 22,110 करोड़ रुपए निकाले हैं। दूसरी तरफ एफपीआईऔरऔर भी

शेयर बाज़ार समेत समूचे वित्तीय बाज़ार में सक्रिय ट्रेडर के लिए सबसे अहम है उसकी सतर्कता। लम्बे निवेश में तो एक बार ठोंक-बजाकर कंपनी के शेयर खरीद लिए और फिर सालों के लिए सो गए तो कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में तो सावधानी हटी, दुर्घटना घटी की स्थिति हमेशा बनी रहती है। ट्रेडर को बराबर देखते रहना पड़ता है कि दूसरे खिलाड़ी क्या कर रहे हैं। खासकर, म्यूचुअल फंडों और विदेशी पोर्टफोलियोऔरऔर भी

साल का आखिरी हफ्ता काम-धंधे और व्यस्तता का नहीं, बल्कि फुरसत का होता है। आमतौर पर कॉरपोरेट क्षेत्र से लेकर मीडिया के सीनियर लोग और तमाम प्रोफेशनल क्रिसमस से लेकर नया साल तक 10-12 दिन की छुट्टियां बाहर ही मनाते हैं। रिटेल ट्रेडर को भी इस वक्त का इस्तेमाल शांति से गुजरते साल की समीक्षा करते हुए बिताना चाहिए ताकि साफ हो सके कि साल के दौरान उसने क्या-क्या गलतियां कीं और क्या-क्या सबक सीखे। उसे समझनाऔरऔर भी

पता ही नहीं चला। देखते ही देखते साल बीतने को आ गया। साल 2022 का आखिरी सप्ताह। हिसाब-किताब लगाने का समय कि इस साल कितना पाया, कितना गंवाया। भारी उतार-चढ़ाव से गुजरे इस साल में निफ्टी-50 सोमवार, 3 जनवरी से शुक्रवार, 23 दिसंबर तक मात्र 1.03% बढ़ा है। यह साल भर में शेयर बाज़ार का बेहद निराशाजनक प्रदर्शन माना माना जाएगा। क्या आपने शेयर बाज़ार में निवेश से कम से कम इतना और ट्रेडिंग से इसका पांच-दसऔरऔर भी

शेयर डीमैट हो चुके हैं, अमूर्त हैं। उनके भाव धन, खासकर डॉलर के प्रवाह पर निर्भर हैं। इसलिए जानना होगा कि डॉलर के रूप में बह रहा धन किस पर निर्भर है। साल 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट से ही डॉलर ने अपने यहां गदर काट रखी है। अभी तो अपना रिजर्व बैंक ब्याज दर बढ़ाए, इससे कहीं ज्यादा असर शेयर बाज़ार में अमेरिका के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के ब्याज दरें बढ़ाने से होता है। अपनेऔरऔर भी

व्यापारी वस्तुओं में ट्रेड करता है। माल खरीदता और बेचता है। लेकिन शेयर बाज़ार का ट्रेडर ऐसे किसी माल या वस्तु में नहीं, बल्कि लिस्टेड कंपनियों के स्टॉक्स को ट्रेड करता है जो पूरी तरह डीमैट हो चुके हैं जिन्हें महसूस किया जा सकता है, हाथ में पकड़कर दिया या लिया नहीं जा सकता। वह कंपनियों के स्वामित्व के अंश में ट्रेड करता है, जिसका भाव हर पल परसेप्शन के आधार पर बदलता रहता है। लेकिन आजकलऔरऔर भी

व्यापारी कभी मगजमारी नहीं करता कि किसी चीज के दाम क्यों बढ़े या घट गए। उसे तो अपने मार्जिन से मतलब है। बाज़ार में है तो इतना जागरूक जरूर रहता है कि दाम घट-बढ़ क्यों रहे हैं। लेकिन इससे ज्यादा नहीं। दाम बढ़े तो उसका असर उत्पादक और ग्राहक पर पड़ेगा। व्यापारी को तो एक निश्चित प्रतिशत ही कमीशन या मार्जिन मिलेगा। शेयर बाजार के ट्रेडर को भी अपने पेशे की इस हकीकत को जज़्ब कर लेनाऔरऔर भी

किराने के बगल में किराने की दूसरी दुकान, ज्वैलर के बगल में कई ज्वैलर, हार्डवेयर व पेंट की एक नहीं, अनेक दुकानें। आसपास दवा की दुकानों की भरमार। आखिर इतनी सारी दुकानों को इतने सारे ग्राहक कहां से मिल जाते हैं कि सब का धंधा चौकस चलता रहता है? इस सवाल का ठोस जवाब भले ही न मिल पाए, लेकिन हकीकत यही है कि सभी दुकानदार मजे में धंधे के दम पर घर-परिवार चलाते हैं। यही शांतिऔरऔर भी