शेयरों में निवेश कोई सीधी-साधी राह नहीं कि मुंह उठाकर चल पड़े। जिस भी कंपनी के शेयरों में निवेश कर रहे हैं, उसका बिजनेस ठोंक-बजाकर समझना होता है। अगर बिजनेस को नहीं समझा तो गलत दवा की तरह उसके बड़े खतरनाक साइड-इफेक्ट होते हैं। वैसे भी हमारा शेयर बाज़ार अब ग्लोबल हो चुका है। बहुत सारी बहुराष्ट्रीय कंपनियां यहां लिस्टेड हैं। इसलिए बाहर की ऊंच-नीच भी कंपनियों को प्रभावित करती है। बड़े नाम व स्थापित धंधे केऔरऔर भी

कृषि पस्त, सेवाएं सुस्त। विकास के आंकड़े बेमानी है। राष्ट्रीय राजमार्गों से नीचे उतरकर गांवों की तरफ बढ़ते ही चमामक सड़कें खड्ढों से भर जाती हैं। डायरेक्ट बैंक ट्रांसफर की हकीकत असली लाभार्थियों से बात करने पर साफ हो जाती है कि प्रधान की कृपा से ही उनके बैंक खाते में धन आता है, जहां से निकालते ही प्रधान से लेकर ग्राम सचिव और ठेकेदार तक अपना हिस्सा खाने के लिए घेर लेते हैं। फिर भी सरकारीऔरऔर भी

सरकार का खजाना लबालब है। प्रत्य़क्ष और परोक्ष टैक्स जमकर बढ़ रहे हैं। 9 अक्टूबर तक केंद्र सरकार को रिफंड वगैरह घटाने के बाद शुद्ध रूप से 9.57 लाख करोड़ रुपए का प्रत्यक्ष टैक्स (कॉरपोरेट टैक्स, इनकम टैक्स + सिक्यूरिटीज़ ट्रांजैक्शन टैक्स) मिल चुका है जो साल भर पहले की समान अवधि की तुलना में 21.8% ज्यादा है। सितंबर 2023 तक की छमाही में सरकार का एडवांस टैक्स संग्रह 20% बढ़कर 3.54 लाख करोड़ रुपए हो चुकाऔरऔर भी

जिस कृषि ने कोरोनाकाल तक में देश की अर्थव्यवस्था को बचा लिया और जिस पर अब भी हमारी लगभग 60% आबादी निर्भर है, उसकी विकास दर सितंबर 2023 की तिमाही में घटकर 1.2% पर आ गई है। यह 18 तिमाहियों यानी साढ़े चार साल की न्यूनतम दर है। इससे देश की कृषि और किसानों के ताज़ा हाल का पता चलता है। स्पष्ट तौर पर इससे ग्रामीण इलाकों में मांग पर नकारात्मक असर पड़ेगा जो अभी से हिंदुस्तानऔरऔर भी

देश में कॉरपोरेट क्षेत्र का पूंजी निवेश अभी तक ठंडा पड़ा हुआ है। रिजर्व बैंक के मुताबिक निजी उद्योगों में क्षमता इस्तेमाल का स्तर 73.6% पर अटका हुआ है। कॉरपोरेट क्षेत्र ने सितंबर तक पिछले साल से कम 8.26 लाख करोड़ रुपए के नए निवेश की घोषणा की है। इसमें से भी 4.74 लाख करोड़ रुपए ट्रांसपोर्ट सेक्टर से आए हैं। जाहिर है कि निजी निवेश बहुत सतर्क व चौकन्ना है। केवल सरकारी पूंजी निवेश के बलऔरऔर भी

सरकार का कहना है कि इस बार सितंबर तिमाही में देश का जीडीपी 7.6% बढा है। यह जून तिमाही के 7.8% से कम है। लेकिन तमाम अर्थशास्त्रियों की साझा राय 6.8% और यहां तक कि रिजर्व बैंक के 6.5% के अनुमान से अच्छा-खासा ज्यादा है। हर तरफ बल्ले-बल्ले। लेकिन सतह के नीचे ही नहीं, ऊपर से भी देखें तो तस्वीर में काफी झोल दिखता है। इस बार वर्तमान मूल्यों पर जीडीपी साल भर पहले से 9.1% बढ़ाऔरऔर भी

लॉटरी की तरह आईपीओ में भी किस्मत का खेल चलता है। जिन लोगों मे हाल ही में इरेडा के आईपीओ में आवेदन डाला होगा, वे इस बात की तस्दीक करेंगे। यह आईपीओ कुल 38.80 गुना और रिटेल यानी दो लाख रुपए तक निवेश करनेवालों की श्रेणी में 7.73 गुना सब्सक्राइब हुआ। ऐसे में करीब आठ में से एक निवेशक को ही शेयर आंवटित होने थे तो इसका फैसला लॉटरी से हुआ। जिनको शेयर मिले, उनका धन कुछऔरऔर भी

निवेशक संरक्षण फंड में 2001-02 से 2021-22 तक के बीस साल में कंपनियां 29,383.39 करोड़ रुपए डाल चुकी हैं। यह धन हर साल बढ़ता रहता है क्योंकि शेयरधारकों द्वारा न लिया लाभांश वगैरह जुड़ता रहता है। सरकार ने इस फंड की देखरेख के लिए सितंबर 2016 से एक विचित्र प्राधिकरण बना दिया। अगस्त 2022 में आरटीआई आवेदन से जवाब मिला कि वित्त वर्ष 2020-21 के अंत तक इस फंड में 18,433 करोड़ रुपए के साथ ही कंपनियोंऔरऔर भी

निवेशकों की शिक्षा व जागरूकता के अधिकांश कार्यक्रम पांच सितारा होटलों और अंग्रेज़ी में ही होते हैं। स्थानीय भाषाओं में जो कुछ भी होता है, वह महज खानापूर्ति है। वो भी इसलिए ताकि निवेशकों के धन से बने फंड से बिचौलियों की कमाई हो सके। कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय, सेबी, बीएसई व एनएसई ने हिंदी में जो सामग्री पेश कर रखी है, उसमें पंचतंत्र में लिखी लोमड़ी और सारस की कहानी जैसी फांस है। शिक्षित व जागरूक होनेऔरऔर भी

आजकल सरकार की छोटी से छोटी आलोचना करना भी बड़ा गुनाह हो गया है। लेकिन सच कहने के लिए झूठ व गलत की आलोचना तो करनी ही पड़ती है। वैसे भी देश सबसे बड़ा है और सरकारें तो आती-जाती रहती हैं। अभी हम यह सच सामने लाना चाहते हैं कि समूचा सरकारी तंत्र निवेशकों की शिक्षा व सुरक्षा के नाम पर उन्हें वित्तीय रूप से अशिक्षित और असुरक्षित ही रहना चाहता है ताकि वित्तीय बाज़ार के शातिरऔरऔर भी