हलवाई खुद अपनी मिठाई नहीं खाता। वो ग्राहकों को मिठाई बेचकर कमाता है। लॉटरी का खेल रचानेवाला खुद लॉटरी के टिकट नहीं खरीदता। वह लोगों के लॉटरी खेलने पर ही अपना धंधा करता है। इसी तरह शेयर बाज़ार के कर्ता-धर्ता, बीएसई व एनएसई के सीईओ और अन्य बड़े अधिकारी खुद कभी ट्रेड या निवेश नहीं करते। वे केवल मैनेज करते हैं। दूसरे लोग ट्रेड और निवेश करते हैं, तभी उनका धंधा चमकता है। सरकार उन्हीं के जरिएऔरऔर भी

हम बड़े विचित्र दौर से गुजर रहे हैं। जो जितना ज्यादा झांसा देने में सफल है, वो उतना ही ज्यादा कमा रहा है। कंपनियां विज्ञापनों के जरिए झांसा देती हैं। सेलेब्रिटी कंपनियों के माल बेचकर या सरकारी योजनाओं के विज्ञापन से कमाते हैं। सोचिए कि एक समय अमिताभ बच्चन के सितारे गर्दिश में थे। लेकिन अब तो रिजर्व बैंक से लेकर तेल व भुजिया तक के विज्ञापन से ही वे करोड़ों कमा ले रहे हैं। सचिन सेऔरऔर भी

आर्थिक विकास की ढोल की पोल खोलते कुछ ताज़ातरीन तथ्य। कुछ ही दिन पहले जारी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देश के व्यापार घाटे ने अक्टूबर महीने में सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। व्यापार घाटे का बढ़ना हमारे लिए अच्छा नहीं, वो भी तब कई सालों से आत्मनिर्भर भारत का नारा उछाला जा रहा हो। अक्टूबर में देश का वस्तु निर्यात 33.57 अरब डॉलर रहा, जबकि आयात 65.03 अरब डॉलर का तो व्यापार घाटा 31.46 अरब डॉलर के रिकॉर्डऔरऔर भी

शेयर बाज़ार जिन लिस्टेड कंपनियों के प्रदर्शन पर टिका है, लिस्टेड कंपनियां जिस कॉरपोरेट क्षेत्र क हिस्सा हैं और कॉरपोरेट क्षेत्र जिस व्यापक अर्थव्यवस्था पर टिका है, उसका वास्तविक हाल क्या है? अपने मशहूर शायर अदम गोंडवी की दो लाइनें हैं कि तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है, मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है। थोड़ा-सा गहराई में जाएं तो हमारी अर्थव्यवस्था का भी यही हाल है। दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाऔरऔर भी

नोट करने की बात है कि म्यूचुअल फंड की एसआईपी में छोटे शहरों के निवेशक ज्यादा रफ्तार से बढ़ रहे हैं। वे दस साल पहले तक बैंक खातों में जो रिकरिंग डिपॉजिट किया करते थे, उसकी जगह म्यूचुअल फंड की एसआईपी ने ले ली है। 2013-14 में पूरे साल में एसआईपी से 14,500 करोड़ रुपए आए थे। अब तो हर महीने 15,000 करोड़ रुपए से ज्यादा आ रहे हैं। यह भी खास बात है कि म्यूचुअल फंडऔरऔर भी

अपने शेयर बाज़ार में 3 अक्टूबर से 17 नवंबर के दौरान जब विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने शुद्ध रूप से 37,472.82 करोड़ रुपए निकाले, उसी दौरान देशी संस्थागत निवेशकों (डीआईआई) ने 37,489.85 करोड़ रुपए की शुद्ध खरीद की। एफपीआई से थोड़ी-सी ज्यादा। असल में डीआईआई के भीतर खास भूमिका निभा रहे हैं म्यूचुअल फंड और म्यूचुअल फंडों में नियमित धन का प्रवाह सुनिश्चित कर दिया है आम लोगों द्वारा की जा रही एसआईपी या सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लानऔरऔर भी

शेयर बाज़ार के निवेश में समझदार कौन? विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) या देशी संस्थागत निवेशक (डीआईआई)? इनमें से कौन तय करता है हमारे बाज़ार की दशा-दिशा? आम मान्यता है कि एफपीआई या एफआईआई ही इसे तय करते हैं। लेकिन यह मान्यता अब हकीकत से दूर जाती नज़र आ रही है। पहले विदेशी निवेशकों के बेचने से अपना बाज़ार जितना गिरता था, अब उतना गिर तो नहीं ही रहा, बल्कि बढ़ जा रहा है। मसलन, अगस्त 2011 मेंऔरऔर भी

शेयर बाज़ार दिन, महीने, साल हमेशा लहरों में चलता है। बाज़ार में ऐसा दौर होता है जब बहुत सारे शेयर आकर्षक भावों पर मिल रहे होते हैं। वहीं, ऐसा भी दौर होता है जब बहुत सारे शेयर काफी महंगे भाव पर चल रहे होते हैं। जो निवेशक बाज़ार की लहर के निचले स्तर या शेयरों को आकर्षक भाव पर खरीदते हैं, वे अक्सर दो-तीन साल में अच्छा कमा लेते हैं। वहीं, जो निवेशक बाज़ार की लहर केऔरऔर भी

सरकारी दावों पर यकीन करें तो देश में अब कोई बेहद गरीब नहीं बचा और स्वास्थ्य, शिक्षा व जीवन स्तर जैसे तमाम पहलुओं को मिलाकर देखें तो बहुआयामी गरीब लोगों का आबादी में हिस्सा 2015-18 से 2019-21 के बीच 24.85% से घटकर 14.96% पर आ चुका है। लेकिन देश की लगभग 60% आबादी या 80 करोड़ गरीबों को पांच किलो राशन मुफ्त देने की कोरोनाकाल में साल 2020 में शुरू की गई योजना पांच साल और बढ़ाऔरऔर भी

मोदी सरकार को दो काम बखूबी आते हैं। एक मीडिया व हेडलाइंस को मैनेज करते हुए जमकर हल्ला मचाना और दूसरा टैक्स बढ़ाना। उसने इन दोनों ही कामों को अभीष्टतम स्तर तक पहुंचा दिया है। बहुत सारा अनाप-शनाप सरकारी खर्च उसने जमकर बढ़ा दिया। लेकिन अर्थव्यवस्था के स्वस्थ व संतुलित विकास के लिए निजी निवेश, निजी खपत और निर्यात को भी बढ़ाना पड़ता है। सरकारी खर्च के रूप में अर्थव्यवस्था को बढ़ाने का केवल एक इंजिन चलऔरऔर भी