आज की विडम्बना यह है कि सत्यमेव जयते के देश में सत्य ही निर्वासित हो गया है। सरकार, उसके मंत्री-संत्री, यहां तक कि प्रधानमंत्री तक खुलेआम बेधड़क झूठ बोलते हैं। जो उनके झूठ को पकड़ने की जुर्रत करते हैं, सरकार उन पर शिकंजा कस देती है। जो बहादुर अर्थशास्त्री सरकार से सच कहने का साहस करते हैं, उन्हें भी किसी न किसी रूप में दबा दिया जाता है। बजट के ठीक एक दिन पहले फ्रांस के बैंकिंगऔरऔर भी

शेयर बाज़ार बड़ा समदर्शी होता है। उसे धन के प्रवाह से मतलब है। वो धन काला है या सफेद, उसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उसे इससे भी फर्क नहीं पड़ता कि कुछ लोगों के पास इफरात धन आ रहा है, जबकि ज्यादातर लोग बदहाल होते जा रहे हैं। इधर सरकार जहां कहीं भी गुंजाइश है, वहां से जमकर टैक्स वसूल रही है। साथ ही देश के नाम पर ऋण लेने में कोई कोताही नहीं बरत रही।औरऔर भी

अगर कृषि भारत की आर्थिक नीति के केंद्र में होती तो आज गांव, किसान व खेती की हालत इतनी खराब नहीं होती। सस्टेनेबल फार्मिंग और केमिकल-फ्री नेचुरल खेती के जुमलों के बीच किसान खेती छोड़कर भागने को मजबूर नहीं होते। दिक्कत यह है कि उन्हें भागकर कहीं जाने की कोई ठौर ही नहीं मिल रही। इस सरकार ने पिछले दस साल में कृषि को खैरातखाना बना दिया है। बजट में कृषि व किसान कल्याण विभाग को आवंटितऔरऔर भी

कोई सर्वज्ञ नहीं होता। न ही किसी से सर्वज्ञ होने की उम्मीद की जा सकती है। लेकिन सत्यवादी परम्परा के भारत जैसे देश के प्रधानमंत्री से यह उम्मीद तो की ही जा सकती है कि वे देश से जुड़े मसलों पर झूठ नहीं बोलेंगे। मगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सत्ता का ऐसा नशा चढ़ गया है कि वे कुछ भी अनाप-शनाप बोलते रहते हैं। उन्होंने कुछ दिन पहले कृषि अर्थशास्त्रियों के 32वें अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में दावा किया,औरऔर भी

प्रधानमंत्री मोदी ने शनिवार को दिल्ली में कृषि अर्थशास्त्रियों के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा, “भारत में कृषि से जुड़ी शिक्षा और रिसर्च का एक मजबूत इकोसिस्टम बना हुआ है। इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च (आईसीएआर) के ही सौ से ज्यादा रिसर्च संस्थान हैं। भारत में कृषि और उससे संबंधित विषयों की पढ़ाई के लिए 500 से ज्यादा कॉलेज हैं। 700 से ज्यादा कृषि विज्ञान केंद्र हैं जो किसानों तक नई टेक्नोलॉजी पहुंचाने में मददऔरऔर भी

कृषि ने हर संकट में देश को बचाया है। कोरोनाकाल में जब अर्थव्यवस्था बढ़ने के बजाय 6.6% घट गई थी, तब कृषि ने अपनी 3.3% विकास दर से जीडीपी को ज्यादा डूबने से बचा लिया था। लेकिन पिछले छह सालों में हमारी कृषि की विकास दर कभी भी 5% से ऊपर नहीं गई। खुद सरकारी आंकड़ों की बात करें तो वित्त वर्ष 2018-19 में यह 2.4%, वित्त वर्ष 2019-20 में 4%, कोरोनाकाल में वित्त वर्ष 2020-21 मेंऔरऔर भी

इस समय राजधानी दिल्ली में दुनिया भर के कृषि अर्थशास्त्रियों का सम्मेलन चल रहा है। शुक्रवार, 2 अगस्त से शुरू हुआ यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन बुधवार, 7 अगस्त तक चलेगा। यह सम्मेलन इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ एग्रीकल्चरल इकनॉमिस्ट्स की तरफ से हर तीन साल पर आयोजित किया जाता है। उसका यह 32वां सम्मेलन भारत में 65 साल बाद हो रहा है। इसमें दुनिया के 75 देशों के लगभग एक हज़ार प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं। भारत के लिए यहऔरऔर भी

निफ्टी-50 सूचकांक दो दिन पहले पहली बार 25,000 अंक के पार चला गया। क्या इसका वास्ता जीडीपी के बढ़ते आंकड़ों से है? हो सकता है। लेकिन इसका बड़ा वास्ता बाज़ार में सट्टेबाज़ी की नीयत से आए धन के भारी प्रवाह से भी है। कारण, जीडीपी के बढ़ते आंकडों के पीछे छिपी हकीकत यह है कि आमजन की खपत पर टिकी कंपनियों का धंधा ठहरा पड़ा है। जीडीपी की चमक ऐसी कंपनियों के लिए फीकी है। सरकारी कृपा,औरऔर भी

दावा कुछ और, ज़मीनी सच्चाई कुछ और। आंकड़ों की रंग-बिरंगी चादर लहराकर बदरंग हकीकत को ढंका जा रहा है। सवाल उठा कि 2023-24 में हमारा जीडीपी सचमुच 8.2% बढ़ा है तो रोज़ी-रोज़गार क्यों नहीं बढ़ा? रिजर्व बैंक ने फौरन रिपोर्ट निकाल दी कि बीते साल रोज़गार में 4.67 करोड़ का रिकॉर्ड इज़ाफा हुआ है। अब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण एसबीआई रिसर्च रिपोर्ट का हवाला देते हुए कह रही हैं कि 2014 से 2023 के दौरान देश मेंऔरऔर भी

देशी-विदेशी कॉरपोरेट क्षेत्र का एक ही सूत्र और मंत्र है अपना मुनाफा अधिकतम करते जाना। इसी पर उनका समूचा वजूद टिका है। मुनाफा घटता जाए तो वे एक दिन हाथ खड़ाकर दीवालिया हो जाते हैं। फिर भी वित्त मंत्री उन पर कृपा बरसाने से बाज़ नहीं आ रहीं। साथ ही देश को झांसा देती जा रही हैं कि देशी-विदेशी कंपनियों पर जितनी कृपा बरसेगी, वे उतना ही निवेश करेंगी और रोज़गार के नए अवसर पैदा होंगे। लेकिनऔरऔर भी