पहलगाम के नृशंस आतंकी हमले के बाद देश में राष्ट्रवाद के उन्माद को ऑपरेशन सिंदूर ने चरम पर पहुंचा दिया है। लेकिन राष्ट्रवाद सीमा पर युद्ध लड़कर ही नहीं, सीमा के भीतर रोज़गार जैसी विकट समस्याओं से लड़ने और औद्योगिक विकास को बढ़ाने से भी मजबूत होता है। अगर हम देश में मैन्यूफैक्चरिंग को बढ़ा लें तो चीन को सीमा से लेकर हर स्तर पर तगड़ी चुनौती दे सकते हैं। तब हमें गलवान घाटी में उसकी घुसपैठऔरऔर भी

जिस दिन कश्मीर में मिनी स्विटज़रलैंड कहे जानेवाले पहलगाम की बैसरन घाटी में आतंकी देश के कोने-कोने से आए सैलानियों को गोलियों से भून रहे थे, उसी दिन हमारी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण अमेरिका में कैलिफोर्निया की स्टैंफोर्ड यूनिवर्सिटी के हूवर इंस्टीट्यूशन में भाषण दे रही थीं। उन्होंने कहा कि भारत में युवा कार्यशक्ति को सोखने, आयात निर्भरता कम करने और प्रतिस्पर्धी वैश्विक सप्लाई श्रृंखला बनाने के लिए मैन्यूफैक्चरिंग को स्केल-अप करना ज़रूरी है। उनका कहना थाऔरऔर भी

मोदी सरकार ने 2023-24 की आर्थिक समीक्षा में कहा था कि भारतीय अर्थव्यवस्था को 2030 तक हर साल कृषि क्षेत्र से बाहर 78.5 लाख रोज़गार पैदा करने पड़ेगे। साथ ही 35 लाख लोगों को हर साल कृषि से बाहर निकालकर गैर-कृषि क्षेत्र में रोज़गार देने का इंतज़ाम करना होगा। कुल मिलाकर 113.50 लाख नए रोज़गार हर साल। लेकिन 2024-25 की ताज़ा आर्थिक समीक्षा बताती है कि सरकार कृषि क्षेत्र से निकालकर लोगों को मैन्यूफैक्चरिंग व सेवा क्षेत्रऔरऔर भी

हम आसपास नज़र डालें तो ज्यादातर लोग कृषि या व्यापार में ही लगे हुए हैं। बहुत हुआ तो लोग खेती-किसानी से निकलकर छोटी-मोटी दुकानदारी या ठेला-खोमचा टाइप बिजनेस कर लेते हैं। दिक्कत यह है कि इन सभी क्षेत्रों में कभी इतना वैल्यू एडिशन या मूल्य-वर्धन हो ही नहीं सकता कि वे ज्यादा रोज़गार दे सकें। घर-परिवार के लोगों के साथ दो-चार को काम दे दिया तो बहुत है। सेवा क्षेत्र का केंद्र शहरी इलाके हैं और यहऔरऔर भी

हम-आप जैसे आम निवेशक अपने दम पर सीधे शेयरों में निवेश करके लम्बे समय में म्यूचुअल फंडों की इक्विटी स्कीमों को मात नहीं दे सकते। इसके लिए पोर्टफोलियो को जिस तरह बराबर शफल करते रहने की ज़रूरत है, उसके लिए न तो हमारे पास पर्याप्त समय होता है और न ही ज़रूरी सतर्कता व विशेषज्ञता। इसलिए हमें बचत का एक हिस्सा नियमित रूप से एसआईपी के जरिए म्यूचुअल फंड की इक्विटी स्कीमों से लगाते रहना चाहिए। हमऔरऔर भी

आज़ादी के 78 साल बाद भी भारत कृषिप्रधान देश है तो यह गर्व नहीं, शर्म की बात है। यह भी दुखी होने की बात है कि रोज़गार के लिए कृषि पर निर्भरता घटने के बजाय बढ़ती जा रही है। 2017-18 में रोज़गार में कृषि का योगदान 44.1% था। यह 2023-24 में 46.1% हो गया। इसके बाद का डेटा सरकार के पास नहीं है। अमेरिका की केवल 1.5% श्रम-शक्ति कृषि में लगी है और वो पूरे देश कीऔरऔर भी

देश में विकास की जो चकाचौंध दिखाई जा रही है, उसमें चमचमाते हवाई अड्डे और हाईवे ज़रूर दिख जाते हैं। लेकिन आए-दिन किसी की छत गिर रही होती तो कई कोई पुल टूट या सड़क धंस रही होती है। 10-11 साल में देश के इंफ्रास्ट्रक्चर को चमाचम हो जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा क्यों है कि देश के पास नए संसद भवन के अलावा दिखाने को नया कुछ नहीं है? बड़ा सवाल यह है कि इस विकासऔरऔर भी

विकास के नाम पर कितना भ्रष्टाचार हो रहा है, इसकी खबरें उत्तर प्रदेश से लेकर मध्य प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र तक फैली हैं। कुछ महीने पहले उत्तर प्रदेश से खबर आई थी कि जल जीवन मिशन योजना में ₹31,300 करोड़ का घोटाला हो गया है। भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच जल शक्ति मंत्रालय की ₹2.79 लाख करोड़ की मांग के सामने वित्त मंत्रालय ने केवल ₹1.25 लाख करोड़ देने का फैसला किया है। बिहार में नए-नए पुलोंऔरऔर भी

देश को विकास की चकाचौंध की तरफ दौड़ते एक दशक से ज्यादा हो गए। समय आ गया है कि देखें कि हम किसी मृग मरीचिका में तो फंसकर नहीं रह गए हैं? बढ़ते शेयर बाज़ार और डीमैट खातों को देखकर तो सचमुच लगता है कि विकास हुआ है। लेकिन शेयर बाज़ार तभी बढ़ता है जब वहां लिस्टेड कंपनियों के शेयरों की तरफ धन का प्रवाह बढ़ जाता है। इस धन का बड़ा हिस्सा विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई)औरऔर भी

निवेश में हम अक्सर दो अतियों की तरफ भागते हैं। या तो एकदम आसान और पका-पकाया रास्ता तलाशते हैं जिसमें हमें कुछ न करना पड़े। बस किसी ने बता दिया और हमने खरीद लिया। बतानेवाला कोई दोस्त, वॉट्स-अप ग्रुप, ब्रोकर, बिजनेस चैनल का एनालिस्ट, अखबार या वेबपोर्टल का कॉलम तक हो सकता है। नहीं तो हम निवेश के एल्फा, बीटा, गामा और डेल्टा के चक्कर में ऐसे उलझ जाते हैं कि समय पर कोई फैसला नहीं करऔरऔर भी